एयर इंडिया विनिवेशः सरकारी एयरलाइंस का मोह त्यागना ही बेहतर

ब्रिटिश एयरवेज और लुफ्तहांसा। एयरलाइंस की दुनिया में चमकते ऐसे नाम हैं जिनके विमानों में हर शख्स एक ना एक बार यात्रा जरूर करना चाहता है। इनकी बेहतरीन सर्विस और शानदार मेहमाननवाजी का हर कोई कायल है लेकिन शुरुआत में ऐसा नहीं था। 1987 में ब्रिटेन की सरकारी एयरलाइंस ब्रिटिश एयरवेज में घाटा जब लगातार बढ़ता गया और कंपनी दिवालिया होने के कगार पर पहुंच गई तो वहां की सरकार ने एविएशन सेक्टर से निकलने का फैसला कर लिया। कुछ ऐसा ही 1994 में जर्मनी की लुफ्तहांसा के साथ हुआ। भारी घाटे और कर्ज के बोझ से लुफ्तहांसा दब चुकी थी। जर्मन सरकार ने समय रहते उसे निजी क्षेत्र को बेच दिया। आज यूरोप की इन दोनों एयरलाइंस को दुनिया की दस बेहतरीन एयरलाइंस में शुमार किया जाता है। निजी क्षेत्र मे जाने के बाद इन एयरलाइंस की कामयाबी एक मिसाल बन गई है।

ज्यादातर देश अब एयरलाइन्स का बिजनेस छोड़ चुके हैं क्योंकि विमान संचालन के कार्य से किसी तरह की संप्रभुता का मसला जुड़ा नहीं है। कुछ देशों की एयरलाइंस बिजनेस में हिस्सेदारी तो है लेकिन वो उसे चलाते नहीं हैं। मसलन सिंगापुर की सिंगापुर एयरलाइन और संयुक्त अरब अमीरात की एमिरेट्स। इन एयरलाइंस में सरकार की हिस्सेदारी तो है लेकिन इन्हें प्राइवेट कंपनियां चलाती हैं जिससे दुनिया में इनकी साख तो है ही ये मुनाफा भी जबरदस्त कमा रही हैं।

भारी घाटे में चल रहे एविएशन सेक्टर से निकलने में भले ही केन्द्र सरकार ने देर कर दी हो लेकिन अब भी ये फैसला देर आए, दुरुस्त आए सरीखा है। वो बिजनेस जिसमें सरकार को लगातार नुकसान हो रहा है उसे जारी रखने के लिए लोगों से टैक्स के रूप में जमा पूंजी को स्वाहा करना कहां की समझदारी है ये बात अब सरकार के समझ में आई है।

देश की सरकारी एयरलाइंस एयर इंडिया पर करीब 52,000 करोड़ रुपये का कर्जा है। ये राशि इतनी ज्यादा है कि इसमें 100 नई एयरलाइंस शुरू की जा सकती हैं मिसाल के तौर पर टाटा ने कुछ साल पहले एयरएशिया में जो 49 फीसदी हिस्सेदारी खरीदी है उसके लिए उसने करीब 500 करोड़ रुपये चुकाए हैं। एयर इंडिया अकेले ब्याज के मद में 4,000 करोड़ रुपये सालाना चुकाती है यानि 335 करोड़ रुपये हर महीने।

देश में विमान से यात्रा करने वालें मुसाफिरों की संख्या बहुत कम है। ये कुल जनसंख्या का महज ढाई फीसदी है। यानि सालाना तीन करोड़ लोग विमान से सफर करते हैं जबकि इतने यात्री महज एक दिन में देशभर में ट्रेन की यात्रा कर रहे होते हैं। जबकि देश से उड़ान भरने वाली और विदेश से देश में आने वाली भारतीय एयरलाइंस में देश दुनिया के करीब 10 करोड़ लोग सालाना यात्रा करते हैं।

प्राइवेट एयरलाइंस इंडिगो में एक एयरक्राफ्ट पर कर्मचारियों की संख्या 70 है जबकि एयर इंडिया में एक विमान पर 475 कर्मचारी हैं। यानि इंडिगो के मुकाबले तीन सौ फीसदी ज्यादा। एयर इंडिया में चालीस हजार कर्मचारी हैं और उसके पास 142 विमानों की फ्लीट है इसमें पचास फीसदी विमान उसके अपने हैं जबकि बाकी सेल एंड लीज बैक आधार पर लिए गए हैं। लीज पर लिए गए विमानों में भी ड्राई और वेट लीज, दो श्रेणी के विमान एयर इंडिया के पास हैं। ड्राई लीज पर लिए गए विमानों में स्टाफ नही होता जबकि वेट लीज पर लिए गए विमानों के साथ कॉकपिट और केबिन क्रू यानि पायलट-एयर होस्टेस साथ आते हैं। ऐसे विमान एयर लाइंस को मिलते ही तुरंत फ्लाई करने के लिए तैयार हो जाते हैं क्योंकि इनके लिए कर्मचारी नियुक्त और ट्रेंड नहीं करने पड़ते। दुनिया की ज्यादातर एयरलाइंस वेट लीज पर लिए गए विमानों को प्राथमिकता देती हैं लेकिन एयर इंडिया में ऐसे विमानों की संख्या कम है क्योंकि उसके अपने ही कर्मचारियों की संख्या औसत से ज्यादा है।

दिक्कत ये भी है कि एयर इंडिया के कुल विमानों से औसतन तीस फीसदी रिपेयरिंग के लिए हमेशा जमीन पर खड़े रहते हैं। सीएजी की रिपोर्ट के मुताबिक एयर इंडिया के 22 विमान मरम्मत के इंतजार में 6 महीने तक जमीन पर खडे रहे। हवाई जहाज की संरचना हवा में उड़ने के लिहाज से होती है यानि जिस एयर लाइंस के जितने विमान जितनी देर के लिए जमीन पर खडे होंगे उसे उतना ही नुकसान होगा। किंगफिशर एयरलाइंस उसकी मिसाल है। उसके विमान खराब होते इंजनों के कारण ज्यादातर जमीन पर खडे रहे और कंपनी डूब गई। एयर इंडिया में भी कुछ ऐसा ही चल रहा है लेकिन सरकार का हाथ सिर पर होने के कारण कंपनी डूब तो नहीं रही लेकिन सरकारी मददनुमा कर्ज का पहाड़ बढ़ता ही जा रहा है। गलाकाट प्रतियोगिता के कारण जहां प्राइवेट विमान कंपनियां मुनाफे के लिए तरस रही हैं वहीं एयर इंडिया के लिए मुनाफा कमाना दूर की कौडी है।

एयरलाइंस जगत की हर साल रैंकिग करने वाली एविएशन इनसाइट्स कंपनी ने एयर इंडिया को दुनिया की तीसरी सबसे खराब एयरलाइंस माना है। खर्च के अनुपात में यात्री प्रतिशत एयर इंडिया का सब एयरलाइंस में सबसे ज्यादा है। इंडिगो के मुकाबले ये चार और जेट एयरवेज के मुकाबले पांच गुना ज्यादा है। ऐसे में मुनाफा कमाना तो दूर लागत निकालना भी एयर इडिया के टेड़ी खीर है।

ऐसा नही कि कर्मचारियों की बढ़ती संख्या को कम करने के लिए सरकार ने सोचा नहीं। सरकार ने जब भी इस ओर पहल की वहां की सात कर्मचारी यूनियन झंडा लेकर मैदान में आ गई। इन कर्मचारी यूनियन को महाराष्ट्र की शिवसेना से लेकर लेफ्ट की कई पार्टियों का आशीर्वाद प्राप्त है लिहाजा ऐसे में कोई भी बर्रे के छत्ते में हाथ नहीं डालना चाहता। ये भी किसी से छिपा नहीं है कि इन कर्मचारी यूनियन के कर्ताधर्ता नेता मोटी तनख्वाह तो एयर इंडिया से लेते हैं लेकिन जमे यूनिय़न के दफ्तर में रहते हैं। 

ताज्जुब इस बात का है कि प्राइवेट कंपनियां जहां अपने बेहतरीन काम से अपना मार्केट शेयर बढ़ाती जा रही हैं वहीं महाराजा के मस्केट वाली एयर इंडिया दिन पर दिन अपनी धार खोती जा रही है नतीजा उसका कर्जा बढ़ता जा रहा है। सात साल पहले तक एयर इंडिया का मार्केट शेयर करीब बीस फीसदी था जो अब घटकर तेरह फीसदी तक आ गया है। तभी तो वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा कि  जेट एयरवेज, इंडिगो, गोएयर जैसी कई निजी एयरलाइंस अगर 87 फीसदी बाजार संभाल सकती हैं तो 100 फीसदी भी निजी क्षेत्र की कंपनियां संभाल सकती है। यानि सरकार अब एविएशन सेक्टर से निकलने के लिए पूरी तरह तैयार है।

आला अधिकारियों का मानना है कि कंपनी की मौजूदा हालत के लिए एयर इंडिया-इंडियन एयरलाइंस का विलय भी जिम्मेदार है। उल्लेखनीय है कि इन कंपनियों के विलय की प्रक्रिया तत्कालीन नागर विमानन मंत्री प्रफुल्ल पटेल ने 16 मार्च 2006 को शुरू की थी। मार्च 2007 में तत्कालीन यूपीए सरकार ने सरकारी विमानन कंपनी एयर इंडिया और इंडियन एयरलाइन्स के विलय को फाइनल मंजूरी दे दी। बड़ी गलती यहीं से हुई। ये एक बेमेल विलय था। दोनों एयरलाइंस के विमानों का बेड़ा, कर्मचारी, कल्चर और यात्री अलग अलग थे। विलय से दोनों एयर लाइंस के करीब 120 विमान और 30 हजार से ज्यादा कर्मचारी एक हो गए। हालांकि एयरलाइन के सरकारी स्वरूप में बदलाव नहीं हुआ। उस पर एयर इंडिया के मुनाफे वालें रूटों को मिलीभगत कर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय एयरलाइंसों को दे दिया गया। इस मामले की जांच सीबीआई कर रही है।

मर्जर के बाद एयर इंडिया को दस सालों में औसतन हर साल पांच हजार करोड़ का घाटा हुआ है। बीते पांच सालों में सरकार ने सार्वजनिक क्षेत्र की इस एयरलाइन को 25,000 करोड़ रुपये दिए हैं और सन 2032 तक इतनी ही रकम और दिए जाने की बात है। केन्द्र में सरकार बदलने के बाद एयर इंडिया को 2015-16 में अरसे बाद 105 करोड़ रुपये का ऑपरेटिंग प्रॉफिट हुआ लेकिन करीब 4,000 करोड़ रुपये के सालाना ब्याज के मद्देनजर ये कुछ खास नहीं है। सरकार पिछले पांच सालों में एयर इंडिया में 25,000 करोड़ रुपये डुबा चुकी है।

एयर इंडिया की स्थापना 1932 में टाटा संस लिमिटेड की इकाई के रूप में हुई। 1946 में पब्लिक लिमिटेड कंपनी बनाकर इसका नाम एयर इंडिया कर दिया गया। 1953 में केन्द्र सरकार ने इसे अपने हाथों में लेकर 49 फीसदी हिस्सेदारी ले ली। इसी साल एयर कॉरपोरेशन एक्ट पारित कर सरकार ने एयर इंडिया के ज्यादातर शेयर ले लिए। उसी साल इसी एक्ट के तहत इंडियन एयरलाइंस का गठन किया। उस समय तय हुआ कि एयर इंडिया अन्तरराष्ट्रीय और इंडियन एयरलाइंस घरेलू और क्षेत्रीय मार्गों पर उड़ान भरेगी। आजादी के बाद एयर इंडिया ही अकेली एयरलाइंस नहीं थी बल्कि डेकन एयरवेज और कलिंगा एयरलाइंस समेत सात और विमानन कंपनियां थी। बाद में इनका विलय इंडियन एयरलाइंस में कर दिया गया। इसमें डेकन एयरवेज हैदराबाद के निजाम और टाटा स्टील का साझा उपक्रम था जबकि कलिंगा एयरलाइंस की स्थापना पायलट और बाद में राजनेता बने बीजू पटनायक ने की। बीजू पटनायक ओडिशा के मौजूदा मुख्यमंत्री नवीन पटनायक के पिता और राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री थे।

नौवें दशक के शुरुआती वर्ष एयर इंडिया के लिए बेहतरीन साल थे। 1991 से 1994 के बीच इसकी बागडोर वाई सी देवेश्वर के हाथों में थी जो आईटीसी के आग्रह पर आए थे। 1992-93 में एयर इंडिया ने 333 करोड़ का रिकॉर्ड मुनाफा कमाया। इसके बाद कुछ सालों तक ये मुनाफे में रही। इस दौरान सेवा मानकों पर इसका रिकॉर्ड बेहतरीन रहा पर यहां ध्यान देने वाली बात ये है कि इस समय आसमान पर एयर इंडिया का खुला राज था क्योंकि तब प्राइवेट एयरलाइंस के लिए भारतीय आसमान खुला नही था और एयर इंडिया को चुनौती देने के लिए आज की तरह प्राइवेट एयरलाइंस नहीं थी। आज हालात पूरी तरह बदले हुए हैं। प्रतियोगिया के युग में वो ही बचा रहेगा जिसकी सर्विस अच्छी होगी और किराया कम।   

नीति आयोग ने घाटे में चल रही विमानन कंपनी एयर इंडिया में सरकार का मालिकाना हक बेचने की सिफारिश की ताकि केंद्र को इसमें और ज्यादा पैसे नहीं डुबाने पड़ें। इससे सरकार स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे क्षेत्रों के लिए आवंटन बढ़ा पाएगी। सरकार की कोशिश है कि एयर इंडिया का 51 फीसदी से ज्यादा हिस्सा बेच दिया जाए लेकिन दिक्कत ये है कि एयर इंडिया के इतने कर्ज को देखते हुए उसे कौन खरीदना चाहेगा? इसके लिए सरकार करीब तीस हजार करोड़ रुपये के कर्ज को माफ कर सकती है। बाकी बचे 22 हजार करोड़, जो उसके विमानों के मूल्यांकन से निकल सकते हैं। एयर इंडिया अपने 40,000 कर्मचारियों में से एक तिहाई से ज्यादा करीब 15,000 को वीआरएस या स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति देने का प्रस्ताव तैयार कर रही है। ये सब नागरिक विमानन मंत्रालय को भरोसे में लेकर किया जा रहा है

अमेरिका, चीन, ब्रिटेन के बाद भारत दुनिया में एविएशन वर्ल्ड में चौथी सबसे बड़ी मार्किट है। एशिया में चीन के बाद भारत अगले बीस सालों में भारी प्रगति दर्ज करेगा। विमान बनाने वाली कंपनी एयरबस के आकलन के अनुसार 2017 और 2036 के बीच पैंतीस हजार प्लेन दुनिया में खपेंगे और इसमें 41 फीसदी एशिया में होंगे। यानि देश में उड़ रही प्राइवेट कंपनियों के वारे न्यारे तो हैं ही एयर इंडिया भी प्राइवेट हाथों में जाकर अपना आने वाला कल संवार सकती है। 

- नवीन पाल (लेखक वरीष्ठ पत्रकार हैं)