नाकामी व कामयाबी की दास्तां

वॉशिंगटन डीसी में भारत सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार कौशिक बसु एक सच बात कह गए। उन्होंने वहां उपस्थित अपने श्रोताओं से कहा कि उनकी सरकार की निर्णय क्षमता पंगु हो चुकी है और २०१४ के चुनावों तक किसी तरह के सुधारों की उम्मीद नहीं की जानी चाहिए। अलबत्ता, बाद में उन्होंने इस बयान का खंडन किया, क्योंकि इससे उन्हीं की सरकार की फजीहत हो रही थी, लेकिन सच्चाई तो यही है कि उन्होंने ऐसा कुछ नहीं कहा, जो भारत में पिछले दो सालों से नहीं कहा जा रहा था। वॉशिंगटन में बसु के श्रोता हैरान थे कि भारत जैसा जीवंत लोकतंत्र, जो एक उभरती हुई आर्थिक ताकत है और जिसकी सिविल सोसायटी ऊर्जावान है, की सरकार पंगु कैसे हो सकती है? अपने ही गठबंधन के सहयोगियों द्वारा प्रताडि़त किए जा रहे सरकार के मुखिया की अशक्त छवि से बहुतेरे भारतीय व्यथित हैं। गठबंधन के क्षेत्रीय घटक लगातार केंद्र सरकार के उन फैसलों के विरुद्ध आवाज बुलंद करते रहे हैं, जो मूलत: सुधारवादी और देशहित में थे और सरकार उनके प्रतिरोधों के सामने घुटने टेकती रही। अशक्त केंद्रीय सत्ता वास्तव में भारतीय राज्य व्यवस्था की बदहाली की ओर इशारा करती है। कानून-व्यवस्था, शिक्षा, स्वास्थ्य जैसे मसले, जहां सरकार के सशक्त हस्तक्षेप की सख्त जरूरत थी, वहां उसका रुख निरंतर चिंतनीय रहा है। वहीं नागरिकों पर लालफीताशाही के बंधन मजबूत बनाने में वह अधिक सचेत नजर आई है। आर्थिक विकास की अगुवाई करने के बजाय वह स्वयं विकास की राह में बाधा बनती जा रही है और उसके मुख्य अंग भ्रष्टाचार के रोग से ग्रस्त और पतनशील हैं।

यह इसलिए भी दुखद लगता है, क्योंकि भारत के उत्थान की गाथा कोई कम रोमांचकारी नहीं रही है। दिल्ली मेट्रोपोलिटन क्षेत्र में बसे दो शहरों फरीदाबाद और गुडग़ांव की कहानी से भारत के विकास की इस दास्तान को समझा जा सकता है। १९७९ में फरीदाबाद में एक सक्रिय नगर पालिका थी, उसकी कृषि भूमि उर्वर थी और वह देश की राजधानी से रेलमार्ग के जरिए सीधे जुड़ा हुआ था। यहां कई उद्योग-धंधे भी पनप रहे थे। सबसे बड़ी बात यह कि राज्य सरकार फरीदाबाद को आने वाले कल के लिए एक मिसाल बनाने को तत्पर थी। दूसरी तरफ गुडग़ांव एक उनींदा-सा कस्बा था, जिसकी कृषि भूमि पथरीली होने के कारण वहां खेती-किसानी की स्थिति बहुत अच्छी नहीं थी। यहां कोई स्थानीय नगरीय प्रशासन नहीं था, रेलवे संपर्क नहीं था, उद्योग-धंधे नहीं थे। फरीदाबाद की तुलना में गुडग़ांव की स्थिति दयनीय थी। १९७९ में हरियाणा राज्य ने दिल्ली से सटे इस पुराने राजनीतिक जिले को विभाजित कर दिया। जिले का बेहतर हिस्सा फरीदाबाद को मिला और दूसरा बदहाल हिस्सा गुडग़ांव बन गया। १९८० के दशक के प्रारंभ में जब हरियाणा सरकार के एक अधिकारी ने निवेशकों के समक्ष यह प्रस्ताव रखा कि गुडग़ांव को भविष्य की एक संभावना के रूप में विकसित किया जाए तो उनके इस प्रस्ताव का मखौल उड़ाया गया था। दिल्ली का कोई भी व्यक्ति, जो उद्योग या रियल एस्टेट में निवेश करना चाहता था, उसे मित्रों द्वारा यही सुझाव दिया जाता था कि वह फरीदाबाद का चयन करे।

आज चौथाई सदी बाद गुडग़ांव उभरते हुए भारत का प्रतीक बन गया है। गुडग़ांव अब 'मिलेनियम सिटी' कहलाता है। यहां दर्जनों चमचमाते स्कायस्क्रैपर्स, छब्बीस शॉपिंग मॉल्स, सात गोल्फ कोर्सेस, अनगिनत लग्जरी दुकानें और ऑटोमोबाइल शोरूम हैं। यहां तीन करोड़ स्क्वेयर फीट व्यावसायिक क्षेत्र है, जहां दुनिया की सबसे बड़ी कॉर्पोरेशंस में से एक के भारतीय मुख्यालय हैं। स्विमिंग पूल्स, स्पा, सॉनास से सुसज्जित यहां के मशहूर अपार्टमेंट कॉम्प्लेक्सों में गुडग़ांव की उभरती हुई अर्थव्यवस्था की रौनक झलकती है। दूसरी तरफ फरीदाबाद आज भी १९९१ के बाद भारत में आई आधुनिकीकरण की लहर के साथ कदमताल करने के लिए संघर्ष कर रहा है। गुडग़ांव की सबसे बड़ी कमजोरी ही उसकी सबसे बड़ी ताकत बन गई। वहां कोई स्थानीय प्रशासन या योजना प्राधिकरण नहीं था। वह राज्य सरकार द्वारा लंबे समय तक उपेक्षित रहा। विकास के पर कतर देने वाली लालफीताशाही का यहां कोई अस्तित्व न था।

गुडग़ांव को वर्ष २००८ में ही नगर निगम का दर्जा मिल पाया है और उसने राज्य सरकार की मदद के बिना विकास किया है। निजी डेवलपर्स के सामने स्थानीय विकास ्राधिकरण की रफ्तार हमेशा मद्धम साबित हुई। प्राधिकरण की योजनाएं देखकर लगता था, जैसे वह भविष्य के बजाय अतीत की योजनाएं बना रहा हो। लेकिन राज्य की सहायता के बिना हुए इस विकास का एक अन्य पहलू यह भी है कि गुडग़ांव में कोई सीवर या ड्रेनेज सिस्टम नहीं है, बिजली-पानी का भरोसेमंद बंदोबस्त नहीं है, अच्छी सड़कें या पब्लिक साइडवॉक्स नहीं हैं और न ही सुव्यवस्थित सार्वजनिक परिवहन है। सुचारु सफाई व्यवस्था तक न होने के कारण गुडग़ांव का कचरा खाली प्लॉटों की जमीन पर या सड़कों के किनारे फेंका जाता रहा। तो सवाल यह है कि न्यूनतम प्रशासनिक हस्तक्षेप के बावजूद यह आर्थिक विकास का अंतरराष्ट्रीय इंजिन कैसे बन गया? कुछ भारतीय व्यंग्य भरे स्वर में अक्सर कहते हैं कि 'भारत का विकास रात के अंधेरे में होता है, जब सरकार सो रही होती है।' यह बात इस जनभावना को प्रदर्शित करती है कि देश सरकार की मदद के बिना भी आगे बढ़ सकता है। सार्वजनिक जीवन में प्रशासनिक विफलताओं के बावजूद देश में समृद्धि बढ़ रही है। भारत की कहानी निजी क्षेत्र की सफलता और सार्वजनिक क्षेत्र की विफलता की दास्तान है। लेकिन सवाल यही है कि भारत दिन के उजाले में तरक्की क्यों नहीं कर सकता?

निजी क्षेत्र की कामयाबी और सार्वजनिक क्षेत्र की नाकामी ने इस धारणा को भी जन्म दिया है कि कमजोर राज्यसत्ता के बावजूद देश विकास कर सकता है। यह एक गलत धारणा है। बाजार को सख्त नियमों और उन्हें लागू करवाने वाले नियामकों के नेटवर्क की जरूरत होती है। भारत में लोकतंत्र के ६५ वर्षों से अधिक समय के अनुभव ने हमें यह सबक सिखाया है कि निर्णायक हस्तक्षेप करने के लिए राज्यसत्ता का सशक्त होना बहुत जरूरी है, नियमों की प्रणाली पारदर्शितापूर्ण और भ्रष्टाचार से मुक्त होनी चाहिए और समूची प्रणाली जनभावनाओं के अनुरूप होनी चाहिए। यदि भारत को एक सफल राष्ट्र बनना है तो उसके पास एक ऐसी राजनीतिक व्यवस्था होनी चाहिए, जो इन बिंदुओं के बीच संतुलन बना सके। लेकिन आज के हालात देखकर तो यही लगता है कि हमें अभी एक लंबी दूरी तय करनी है।

सार्वजनिक बनाम निजी

भारत की कहानी निजी क्षेत्र की सफलता और सार्वजनिक क्षेत्र की विफलता की दास्तान है। लेकिन सवाल यही है भारत दिन के उजाले में तरक्की क्यों नहीं कर सकता, जब सरकार जाग रही होती है?

- गुरचरन दास (सभारः दैनिक भास्कर)
लेखक जाने-माने स्तंभकार और साहित्यकार हैं। 
 

गुरचरण दास

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