फेल करने की नीति से बढ़ेगी स्कूल छोड़ने की प्रवृत्ति

आठवीं कक्षा तक छात्रों को फेल न करने की नीति को सैद्धांतिक मंजूरी पर विवाद शुरू हो गए हैं। जिन कारणों के चलते आठवीं तक छात्रों को फेल ना करने की नीति 1986 की नई शिक्षा नीति में स्वीकार की गई थी, उसमें सबसे प्रमुख कारण था स्कूलों से असमय ही बच्चों का पढ़ाई छोड़ देना। निश्चित तौर पर आठवीं तक छात्रों को फेल न करने की नीति से स्कूली शिक्षा बीच में ही छोड़ देने की प्रवृत्ति पर रोक लगी। लेकिन अब इस नीति को सिर्फ पांचवीं कक्षा तक ही सीमित करने के प्रावधान के बाद एक बार फिर यह सवाल उठ खड़ा हुआ है कि भारत जैसे देश में, जहां शिक्षा को मौलिक अधिकार में शामिल किया जा चुका है, वहां यह नीति एक बार फिर स्कूली पढ़ाई बीच में ही छोड़ देने की प्रवृत्ति को बढ़ावा देगी।

आठवीं तक फेल न करने की नीति पर पहली बार जोरदार सवाल 2012 में केंद्रीय शिक्षा सलाहकार समिति की बैठक में उठा था। तब दिल्ली, बिहार, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और राजस्थान जैसे राज्यों ने इस नीति पर पुनर्विचार की जोरदार मांग की थी। इस मांग के बाद तत्कालीन मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल ने उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्य सचिव टीएसआर सुब्रमण्यम की अध्यक्षता में इस नीति पर पुनर्विचार करने के लिए एक समिति गठित की थी। तब केंद्र सरकार ने 22 राज्यों से इस बारे में राय मांगी थी। जिसमें महाराष्ट्र, तेलंगाना और कर्नाटक ने जहां इस नीति को लागू रखने पर जोर दिया था, वहीं बाकी 18 राज्यों ने इसे खत्म करने पर जोर दिया था। बहरहाल सुब्रमण्यम समिति की सिफारिश के बाद पिछले साल अगस्त में इस नीति को लागू करने को लेकर मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने स्वीकृति दी थी। जिसे 25 दिसंबर 2016 को विधि मंत्रालय ने भी मंजूरी दे दी है।

आठवीं तक छात्रों को फेल ना करने की नीति के विरोध में खड़े राज्यों का आरोप है कि इससे छात्रों का शैक्षिक स्तर गिर रहा है। उनका कहना है कि इससे अध्यापकों द्वारा पढ़ाने में भी कम दिलचस्पी ली जा रही है। इसका असर दसवीं और बारहवीं की परीक्षा के नतीजों पर तो पड़ ही रहा है, छात्रों का शैक्षिक और ज्ञान का स्तर भी लगातार कम हो रहा है। अगस्त 2015 में आठवीं तक छात्रों को न फेल करने की नीति हटाने की मांग करते हुए दिल्ली के उप मुख्यमंत्री ने जोरदार तर्क दिया था। उन्होंने आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा था कि अकेले दिल्ली में ही साल 2015-16 के सत्र में छठवीं कक्षा में 36.68 प्रतिशत बच्चे फेल हुए थे, लेकिन उन्हें सातवीं में दाखिला दे दिया गया। मनीष के मुताबिक ये बच्चे न्यूनतम 33 फीसद अंक भी नहीं हासिल कर पाए थे। तब उनके तर्क का समर्थन करते हुए आम आदमी पार्टी की प्रवक्ता आतिशी मर्लिना ने कहा था कि फेल न करने की नीति अध्यापकों को ही नहीं, छात्रों को भी जिम्मेदारी से मुक्ति की राह दिखाती है। 

एक हद तक यह तर्क सही हो सकता है। लेकिन भारत जैसे देश में इस तर्क की भी सीमाएं हैं। जहां स्कूली शिक्षा के लिए जरूरी माहौल अब भी पूरी तरह उपलब्ध नहीं हों, वहां इस नीति के अपने नुकसान भी होंगे। मैसाचुसेस्ट इंस्टीट्यूट के निदेशक अभिजीत बनर्जी ने स्कूली शिक्षा पर बहुत काम किया है। उनका कहना है कि फेल न करने की नीति छात्रों के लिए बेहतर हो सकती है। लेकिन यह तभी बेहतर होगी, जब उन्हें पढ़ाई के लिए बेहतर माहौल दिया जाए। उन्हें सीखने के लिए बेहतर सुविधाएं मिलें। उनका विभिन्न स्तरों पर मूल्यांकन हो और अध्यापकों को जवाबदेह बनाया जाए। फेल न करने की नीति के विरोध में महाराष्ट्र राज्य का तर्क भी कुछ ऐसा ही है। उसका कहना है कि स्कूलों को पढ़ाई के लिए नियम बनाने की आजादी होनी चाहिए। महाराष्ट्र का भी कहना है कि फेल करने की नीति से फिर छात्र निराश होंगे और वे स्कूली पढ़ाई बीच में ही छोड़ने को मजबूर होंगे। तेलंगाना का भी तर्क है कि छात्रों को सीखने के लिए भयमुक्त वातावरण चाहिए। फेल करने की नीति से उनमें भय व्याप्त होगा और वे पढ़ाई पर ध्यान नहीं दे पाएंगे। कर्नाटक सरकार का भी तर्क है कि फेल करने की नीति लागू करने की बजाय छात्रों की सहूलियत के मुताबिक पढ़ाई का माहौल मुहैया कराने पर जोर दिया जाना चाहिए। 

हालांकि शिक्षा का अधिकार कानून (आरटीई) में इस समस्या का समाधान भी सुझाया गया है। आरटीई स्पष्ट रूप से सतत एवं समग्र मूल्यांकन (सीसीई) अर्थात समय समय पर छात्रों के सीखने की क्षमता का मूल्यांकन करना और उनकी कमजोरियों को दूर करने के प्रयास का प्रावधान है। लेकिन सरकारी स्कूलों में नो-डिटेंशन प्रणाली को आवश्यक तौर पर उतीर्ण करना मान लिया गया और अध्यापकों को लापरवाही करने का एक और मौका प्रदान कर दिया गया। अच्छा होता यदि छात्रों को फेल करने की बजाए उनका समय समय पर मूल्यांकन करने के प्रावधान को लागू कराया जाता और अध्यापकों की जवाबदेही भी तय की जाती। 

निश्चित तौर पर पक्ष और विपक्ष, दोनों के ही तर्कों में दम है। भारत में जहां अब भी खासकर सरकारी स्कूलों में बेहतर पढ़ाई सपना है, वहां फेल करने की नीति जहां छात्रों के लिए घातक होगी, वहीं अध्यापकों पर बेहतर नतीजे देने का दबाव होगा। क्योंकि ज्यादातर सरकारें अब परीक्षा नतीजों को अध्यापकों के प्रदर्शन से जोड़ने की हिमायती हैं। लेकिन अव्वल तो होना ही चाहिए कि पढ़ाई के लिए बेहतर माहौल मुहैया कराने पर जोर होता, जहां अध्यापकों को जवाबदेह बनाया जाता। सिर्फ छात्रों के पास होने पर ही अध्यापकों के प्रदर्शन का मूल्यांकन ना हो, बल्कि हर स्तर पर छात्रों का मूल्यांकन हो और उन मूल्यांकन के आधार पर अध्यापकों को जवाबदेह बनाया जाए। अगर सालाना परीक्षा के बजाय मासिक टेस्ट या पढ़ाई के माहौल को मूल्यांकन बनाया जाय, स्कूलों के वातावरण को देखा-परखा जाय तो निश्चित तौर पर भारत जैसे देश में यह फेल न करने की नीति से कहीं ज्यादा प्रभावी होगा। नगालैंड में स्थानीय निकायों के हाथों प्राथमिक शिक्षा को सौंपने के बाद बढ़ी जवाबदेही ने वहां की प्राथमिक शिक्षा व्यवस्था के माहौल को ही बदल कर रख दिया है। बेहतर होता कि राज्य सरकारें उस मॉडल पर भी गौर फरमातीं।

- उमेश चतुर्वेदी (लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं)