'डिटेंशन', 'नो-डिटेंशन' और सरकारी अदूरदर्शिता

बीते दिनों केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने 10वीं कक्षा में बोर्ड की परीक्षा को पुनः अनिवार्य बनाने पर अपनी सहमति दे दी। इसके साथ ही राज्यों को पांचवी कक्षा के बाद परीक्षा कराने की भी दे दी गई। राजस्थान सहित कई राज्यों ने छठीं व आगे की कक्षा में परीक्षा कराने की गैर आधिकारिक घोषणा भी कर दी। 10वीं में बोर्ड की परीक्षा व छठीं तथा आगे की कक्षा में वार्षिक परीक्षा पद्धति वापस लाने के पीछे छात्रों द्वारा लापरवाही करने और पढ़ाई पर ध्यान न देने को प्रमुख वजह बताया गया है। इसे तर्कसंगत साबित करने के लिए राज्यों द्वारा तमाम सरकारी, गैर सरकारी सर्वेक्षणों व नौवीं कक्षा की वार्षिक परीक्षा के खराब परिणामों का हवाला भी दिया गया। हालांकि ऐसे ही तर्क व देश-विदेश में हुए शोध एवं सर्वेक्षणों का हवाला पूर्व केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री कपिल सिब्बल की टीम द्वारा शिक्षा के अधिकार कानून (आरटीई) में 'नो-डिटेंशन' का प्रावधान जोड़ने के समय भी दिया गया था। तब यह कहा गया था कि स्कूली शिक्षा में फेल पास के प्रावधान का बच्चों के मानसिक विकास पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। साथ ही डिटेंशन के कारण स्कूल छोड़ने वाले छात्रों की संख्या में वृद्धि होने की प्रवृति की बात कही गई थी।

पांचवीं के बाद परीक्षा कराने का विकल्प राज्यों को देने व 10वीं कक्षा में बोर्ड परीक्षा को पुनः अनिवार्य किए जाने के फैसले ने एक बार फिर से यह साबित कर दिया है कि सरकारी फैसलों में दूरदर्शिता की कितनी कमी होती है। इसके अलावा शिक्षा व्यवस्था में लालफीता शाही कितनी हावी है यह बात भी साबित हो जाती है। आरटीई में नो-डिटेंशन के साथ ही साथ सीसीई (सतत समग्र मूल्यांकन) का भी प्रावधान किया गया था। सीसीई के तहत स्कूलों को कक्षा के आधार पर न्यूनतम सीखने के स्तर को निर्धारित करना और उस स्तर के आधार पर समय समय पर छात्रों का मूल्यांकन करने को आवश्यक बनाया गया था। मूल्यांकन के आधार पर छात्रों को आवश्यक सहायता भी उपलब्ध कराने का प्रावधान किया गया था। किंतु टीचर्स लॉबी व ब्यूरोक्रेसी ने नो-डिंटेशन को आवश्यक रूप से अगली कक्षा में प्रोन्नत करने की स्कीम में तब्दील कर दिया। परिणामस्वरूप जवाबदेही पूरी तरह से अध्यापकों पर से स्थानांतरित होकर छात्रों के उपर आ गई। इस प्रकार एक अच्छी योजना को टीचर्स लॉबी व ब्यूरोक्रेसी ने फ्लॉप शो में तब्दील कर दिया। बाद में इसे इस प्रकार प्रचारित किया गया जैसे परीक्षा व पास-फेल प्रणाली के अभाव के कारण ही छात्रों का प्रदर्शन खराब हुआ हो।

दुनिया भर के शोध और उदाहरण यह बताने के लिए काफी है कि फेल पास की व्यवस्था किसी के लिए लाभकारी नहीं है। भारत जैसे देश में जहां लड़कियों को स्कूल भेजने के प्रति पहले से ही जागरुकता का अभाव है, उनके फेल होने पर स्कूल ड्रॉप आउट की समस्या में वृद्धि की आशंका बढ़ जाती है। वैसे भी वर्ष भर की पढ़ाई का आंकलन दो या तीन घंटे में करना छात्रों के लिए ज्यादती ही है। पास-फेल का नया फैसला स्कूलों के लिए भी बड़ी समस्या बनकर आएगी। बेहतर हो कि सरकार, आरटीई के सीसीई अर्थात सतत एवं समग्र मूल्यांकन प्रावधान को पांचवी कक्षा तक सीमित करने की बजाए न केवल आठवीं कक्षा तक बल्कि उच्चतर कक्षाओं जैसे की 10वीं और 12वीं में लागू करे और उसका अनुपालन कराए। यदि वर्ष भर छात्रों के सीखने की क्षमता का मूल्यांकन और उसके आधार पर असिस्टेंस प्रदान किया जाता तो यह समस्या पैदा नहीं होती और छात्रों का लर्निंग आउटकम भी पहले से बेहतर होता।

- अविनाश चंद्र; लेखक आजादी.मी के संपादक हैं।