बर्लिन की दीवार के नेस्तनाबूत होने के 27 वर्ष पूरे होने पर विशेष

9 नवंबर को पूर्वी व पश्चिमी जर्मनी को बांटने वाली बर्लिन की दीवार को वहां के नागरिकों के द्वारा ढहाए जाने की घटना के 27 वर्ष पूरे हो गए। वर्ष 1989 में इसी दिन दो भागों में बंटा जर्मनी देश फिर से एक हो गया था। मार्क्सवादियों द्वारा साम्यवाद के जरिए स्वर्ग हासिल करने और पूंजीवादियों के चंगुल से श्रमिकों को आजादी दिलाने का सब्ज़बाग लोगों को ज्यादा दिनों तक फुसलाकर रखने में सफल नहीं रहा। बंदूक की नोंक पर थोपी गई स्वर्ग की इस परिकल्पना से ऊबरते हुए नागरिकों ने जो भी औजार दिखा उसी से न केवल दीवार ढहाई बल्कि साम्यवाद की नींव भी हिलाकर रख दी। प्रस्तुत है इसी मुद्दे पर वर्ष 2009 में प्रकाशित स्वामीनाथन अय्यर का एक लेख..

20 साल बाद क्यों ढही बर्लिन की दीवारः स्वामी
हम साम्यवाद के धराशायी होने की बीसवीं सालगिरह की ओर अग्रसर हैं. यह घटना जनता की नुमाइंदगी के साम्यवादी दावे को व्यापक रूप से नकार देती है. फिर भी, ऐसे साम्यवादी दावे अब भी बरकरार हैं जो कभी-कभार युवाओं की नई पीढ़ी को चौंकाते हैं जिन्हें यह मालूम ही नहीं है कि 9 नवंबर 1989 के दिन बर्लिन की दिवार क्यों गिरी.

कार्ल मार्क्स का कहना था, लोकतांत्रिक पूंजीवाद में अमीर अधिक अमीर हो जाते हैं और गरीब ज्यादा गरीब. मार्क्सवाद ने युवा आदर्शवादियों को करीब एक शताब्दि तक प्रेरित किया. रूस में 1918 में हुई लेनिन की क्रांति का नई सुबह के रूप में जयजयकार किया गया. स्टालीन के आक्रमणों के जरिए साम्यवाद पूर्वी यूरोप जा पहुंचा. वहां कम्युनिस्ट सरकारों ने श्रमिकों के लिए स्वर्ग की रचना की मंशा के साथ यह कसम खाई कि शोषणकारी पूंजीवादियों के चंगुल से श्रमिक आजाद होंगे और वे राज्य के लिए काम करेंगे. राज्य उन्हें पूर्ण रोजगार प्रदान करेगा और उनके हितों का ध्यान रखेगा.

चेकोस्लावाकिया के लेखक मिलान कुंदेरा साम्यवादियों के बारे में कहते हैं, “उनके पास एक भव्य योजना थी, एक योजना ऐसी नई दुनिया की जिसमें हरेक व्यक्ति अपने लिए जगह हासिल कर सकेगा. इस नए विश्व में सबको न्याय मिलेगा. लोगों ने हमेशा एक शांतिपूर्ण वातावरण में ग्राम्य संगीत की कामना की है. एक ऐसी बगिया की इच्छा की है जहां बुलबुल गाती है, लोगों में आपसी तालमेल दिखाई देता है और जहां दुनिया इंसान के सामने एक अजनबी के रूप में खड़ी नहीं दिखाई देती और न ही एक इंसान दूसरे इंसानों के खिलाफ खड़ा होता है.”

लेकिन यहां समस्या यह थी कि स्वर्ग की यह परिकल्पना बंदुक की नोंक पर थोंपी गई थी. इसके बावजूद वामपंथी उत्साहित थे और इसके खिलाफ आपत्ति करने वालों को पूंजीवादी उच्छिष्टवर्गवादी (इलीटिस्ट्स) कह कर खारिज कर दिया गया. ये उच्छिष्टवर्गवादी खात्मे के पात्र थे, लेकिन आम लोगों को समानता के साथ ही स्वर्ग में शानदार फायदे नसीब होने थे.

अफसोस, यह समानता छलावा साबित हुई. नियम-कायदे लागू करने वालों और जिन्हें इनका पालन करना है, के बीच समानता संभव नहीं है. पूर्वी यूरोप के नागरिकों को यह पता चल गया कि जिस व्यवस्था को वे स्वर्ग मान रहे थे, वास्तव में वह एक पिंजरा थी जिसमें उन्हें खाना-पीना तो मिल जाता था लेकिन उन्हें बोलने, काम करने या घूमने-फिरने की बुनियादी आज़ादी नसीब नहीं थी. बड़ी संख्या में युवा ‘साम्यवादी स्वर्ग’ के ठिकानों से निकल कर पश्चिम के कथित ‘नर्क के सुराखों’ में जा बसे.

पूर्वी जर्मनी से पश्चिमी जर्मनी में माइग्रेशन (देशपरिवर्तन) सबसे ज्यादा आसान था. आधिकारिक माइग्रेशन 1950 में 197,000, 1951 में 165,000, 1953 में 182,000 और 1953 में 331,000 तक जा पहुंचा. यह मान लेना असंभव था कि ये नौजवान महज स्वार्थी पूंजीवादी प्रतिक्रियावादी थे.

इस माइग्रेशन की वजह से साम्यवादी देशों ने अपनी सीमाओं को बंद कर दिया और जो लोग देश छोड़ कर भागना चाहते थे उन्हें जेलों में बंद कर दिया. कुंदेरा कहते हैं, साम्यवादी स्वर्ग एक ऐसा स्थान होता जहां, “इंसान किसी मधुर संगीत रचना में एक स्वर के समान था, लेकिन यदि कोई स्वर की अपनी जिम्मेदारी से नहीं निभाता तो वह पूरी तरह अनुपयोगी और अर्थहीन हो जाता. फिर यह आसानी से पकड़ा और खत्म किया जा सकता था. चूंकि साम्यवादी परिभाषा के मुताबिक सब लोग एक दुनिया का हिस्सा थे और इसमें से निकलना अवैध था. अगर वे इससे छोड़ कर जाना चाहेंगे तो उन्हें जेल में डाल दिया जाता.” ऐसी स्थिति में साम्यवादी स्वर्ग से निकलना प्रतिबंधित थाः इसी कारण यह असंभव लगने वाली मान्यता पनपी होगी कि साम्यवाद किसी भी रूप में स्वर्ग नहीं था.

साम्यवादी संबंधी दुविधा अपने सबसे खराब स्वरूप में बर्लिन शहर में थी. यह शहर एक साम्यवादी पूर्व और लोकतांत्रिक पश्चिम में बंटा हुआ था. यहां लोगों का पलायन बेहद आसानी से और सबसे ज्यादा संख्या में होता था. इसलिए 1961 में कम्युनिस्टों ने बर्लिन की सम्पूर्ण सीमा पर बर्लिन वॉल (दीवार) का निर्माण कर दिया. अन्य सभी सुरक्षा दीवारों की तर्ज पर इस दीवार का मकसद बाहर से आने वालों को रोकना न होकर, भीतर से बाहर जाने वालों को कैद करके रखना था. फिर भी हजारों पूर्वी बर्लिनवासी इसे फांद कर जाना चाहते थे. इनमें से सैकड़ों मौत के घाट उतार दिए गए.

सोवियत संघ के पूर्व राष्ट्रपति ब्रेजनेव के नाम पर मशहूर मत के मुताबिक जब कोई देश कम्युनिस्ट बन जाता था तो सोवियत सेना के टैंक उसका कम्युनिस्ट बने रहना सुनिश्चित करते थे. सोवियत सेना ने 1956 में हंगरी में और 1968 में चेकोस्लावाकिया में हुई बगावतों को दबा दिया. इसी ब्रेजनेव मत के तहत सोवियत टैंक 1979 में अफगानिस्तान में दाखिल हुए, लेकिन उन्हें इसके बेहद शर्मनाक नतीजे भुगतने पड़े.

जब मिखाइल गॉर्बाचेव सोवियत राष्ट्रपति बने तो उन्होंने अफगानिस्तान से अपनी सेना वापस बुलाते हुए ब्रेजनेव मत का अंत कर दिया. 1989 में उन्होंने पूर्वी यूरोप के साम्यवादी शासकों से कह दिया कि वे अब जनता की बगावत को कुचलने के लिए सोवियत टैंकों के भरोसे नहीं रह सकते. महज तीन माह के भीतर, सुप्रसिद्ध जन-विद्रोहों ने समूचे पूर्वी यूरोप से कम्युनिस्ट सत्ताओं को उखाड़ फेंका.

अगस्त 1989 में हंगरी ने आस्ट्रिया के साथ सीमा पर लगे अवरोधों को खत्म कर दिया. कुछ ही दिनों में 13,000 पूर्वी जर्मनवासियों सहित पूर्वी यूरोप के कई लोग ऑस्ट्रिया चले गए. समूचे पूर्वी यूरोप में साम्यवादी सत्ता के विरुद्ध जनमानस के प्रदर्शन हुए. जनता के गुस्से को शांत करने के लिए कम्युनिस्टों ने 9 नवंबर के दिन बर्लिन दीवार के दरवाजे खोल दिए. चंद दिनों में बर्लिनवासियों ने दीवार को जबरदस्त जयघोष के बीच ध्वस्त कर दिया. इसके तुरंत बाद कम्युनिस्ट शासन का अंत हो गया.

सभी जगह, जिसमें भारत भी शामिल है, साम्यवादी और समाजवादी निराश हो गए. वे यह समझ ही नहीं पाए कि आमदनी की समानता, मुफ्त जन कल्याण और पूर्ण रोजगार जैसी नेमतों को छोड़ कर आखिर क्यों भला पूर्वी जर्मनवासी उच्चस्तरीय विषमता वाले पश्चिम की ओर रुख कर गए जहां बेरोजगारी और सामाजिक जोखिम बड़े पैमाने पर थी? इसका जवाब एक अखबार के संपादक के नाम लिखे गए एक पत्र के जरिए आया- “मेरी बेटी के पास सफेद रंग का पालतू चूहा (हैमस्टर) है. उसके पिंजरे में भरपूर खाना, पानी, रहने का अच्छा इंतजाम और मनोरंजन के लिए ढेर सारे खिलौने हैं. लेकिन यह हैमस्टर आज़ाद होने के लिए हरदम पिंजरे की दीवारों को दांतों से कुतरता रहता है. मेरे ख्याल से हम सब यह समझते हैं कि आज़ादी के क्या मायने हैं, और सोने की परत चढ़ा पिंजरा कतई इससे बेहतर नहीं है.”

पूर्व प्रकाशितः 25 अक्टूबर 2009
- स्वामीनाथन एस. ए. अय्यर द्वारा लिखे लेख शीर्ष बिजनेस अखबारों में स्वामीनॉमिक्स कॉलम में प्रकाशित होते हैं। अधिक जानकारी के लिये देखें: http://swaminomics.org

स्वामीनाथन अय्यर