व्यंग्यः आया आया तूफान..

साल 1989 में अमिताभ बच्चन की एक फिल्म आई थी- 'तूफान'। इस फिल्म में एक गाना था- 'आया आया तूफान, भागा भागा शैतान'। फिल्म में अमिताभ बच्चन ने 'तूफान' का किरदार अदा किया था। बॉक्स ऑफिस पर दर्शकों की उपेक्षा की आँधी ने इस 'तूफान' को ऐसा उड़ाया कि निर्माता मनमोहन देसाई की जिंदगी में भूचाल आ गया। लेकिन इस दिनों असल तूफान का बड़ा हल्ला है। पिछले दिनों कई राज्यों में छोटा-बड़ा तूफान आया। कहीं पेड़ गिरे, कहीं ओले पड़े। गाने के हिसाब से चलें तो शैतानों का नामों निशान मिट जाना चाहिए, लेकिन ऐसा होगा नहीं। शैतान अब बहुत शातिर हो गए हैं। पांच बरस गायब रहते हैं लेकिन ऐन चुनाव के वक्त रुप बदल बदलकर जनता के सामने आ खड़े होते हैं। मासूम-भोली सूरत लिए। इन चुनावी 'शैतानों' के पास भेष बदलने का अद्भुत हुनर होता है। इनके पैर दिखते सीधे हैं, लेकिन होते उल्टे हैं। चुनाव खत्म होते ही ये ऐसी रहस्यमयी गुफाओं में छिप जाते हैं, जहां सिर्फ ठेकेदार, रिश्वतखोर, बिल्डर वगैरह ही पहुंच पाते हैं। चुनाव के वक्त उल्टे पैर ये फिर समाज में आ पहुंचते हैं। नोट-शराब-वादे-दावे-सपने बांटते हैं। भिखारियों की तरह झोली फैलाते हैं-एक वोट दे दे बाबा। जनता मासूम। वोट दे देती है। शैतान छूमंतर हो जाते हैं। तूफान भी अब छूमंतर हो गया है।  

तूफान का इस बार बड़ा हल्ला रहा। बहुत डर लगा। टेलीविजन चैनलों ने हल्ले में गुल्ला मिलाकर तूफान को मारक बना दिया। कई बार ऐसा लगा कि तूफान घर में घुसकर मारेगा। और नहीं मारेगा तो मोदी-राहुल से ज्यादा साख पर दांव तूफान की ही होगी।

असल तूफान अपनी जगह है लेकिन सच यह है कि लोगों के अपने अपने तूफान हैं। नौजवान लड़कों की जिंदगी में तूफान तब आता है, जब गर्लफ्रेंड झटके में कट लेती है और फाइनल ब्रेकअप होने से ऐन पहले तक इसके कोई संकेत भी नहीं देती। वरना लड़के कम शातिर नहीं, वो विकेट गिरने से पहले नयी क्रीज पर बैटिंग की तैयारियां शुरु कर दें। युवा लड़कियों की जिंदगी में तूफान तब आता है, जब फेसबुक पर उनकी खास सहेली की तस्वीर को रोजाना उनका ही बॉयफ्रेंड लाइक करना शुरु कर देता है। शादी शुदा मर्दों की जिंदगी तूफानों से भरी होती है। मसलन दावों के विपरीत जब पत्नी को पति के सही वेतन का पता लगता है तो तूफान आता है। एक महीने का वादा कर घर आई सास जाने का नाम न ले तो तूफान आता है। व्हाट्सएप पर एक ही दिन में पति की महिला मित्र के गुडमॉर्निंग और गुडनाइट मैसेज पर पत्नी की नजर पड़ जाए तो तूफान आता है। शादी शुदा मर्दों की जिंदगी में तूफान कब कैसे किस बात पर और कितने वेग का आएगा, इसकी भविष्यवाणी दुनिया का कोई मौसम विभाग आज तक नहीं कर पाया। ऐसा नहीं है कि शादीशुदा महिलाओं की जिंदगी में भी तूफान नहीं आते लेकिन ये प्राय: मर्दों की तुलना में कम होते हैं।  

राजनेताओं को घरेलू मोर्चों पर छोड़ दें तो ईश्वर प्रदत्त वरदान है कि वो सिर्फ तूफान लाने के लिए बने हैं, झेलने के लिए नहीं। अलबत्ता उनकी जिंदगी में भी दो बार तूफान आता है। एक, जब आलाकमान बेरहमी से टिकट काट देता है और दूसरा, जब चुनाव में हारने की घोषणा के साथ ही घर में लगने वाली कार्यकर्ताओं की भीड़ कट लेती है।

अंग्रेजी साहित्यकार की जिंदगी में तूफान तब आता है जब रॉयल्टी का चेक बाउंस हो जाए जबकि हिन्दी साहित्यकार को चेक मिल जाए तो इसी खुशी में वो तूफान सिर पर उठा लेता है।

टीवी चैनलों के दफ्तर में जब टीआरपी नहीं आती तो तूफान आता है। दुनिया में कहीं तूफान आए, अगर चैनलों को टीआरपी मिल रही है तो उनके दफ्तर तक तूफान का असर नहीं होता। लेकिन टीआरपी नहीं आए तो दुनिया में भले परम शांति हो, दफ्तर में तूफान मचा रहता है। ऐसे में मनोरंजक चैनल पुनर्जन्म की किसी कहानी को नए कलेवर में ले आते हैं तो न्यूज चैनल किसी हनीप्रीत को खोज लाते हैं। कुछ नहीं मिलता तो भानगढ़ के किले पर दांव लगाते हैं।

कुछ तूफानों की प्रवृति जोर का झटका धीरे से देने वाली होती है। इन तूफानों के आने की भविष्यवाणी मौसम विभाग तो क्या 'महाकवि घाघ' यदि जिंदा होते तो वे भी नहीं कर पाते। ऐसे तूफान शैतानों को उड़ाने की बजाए लोगों की अंटी से बचे खुचे माल उड़ाने में माहिर होते हैं। इन तूफानों के नाम और उनकी प्रवृति बिल्कुल उलट होती है। जैसे कि बड़ी तबाही मचाने वाले तूफानों के नाम नर्गिस, लैला, कैटरीना, नीलम, फैलीन, हेलन, नीलोफर आदि हसिनाओं के नाम पर रखने का प्रचलन है। इसी प्रकार, भोजन छीनने, शिक्षा से वंचित करने, सूचना छिपाने, वाक एवं अभिव्यक्ति पर सेंसर लगाने वाले तूफानों के नाम भी 'भोजन का अधिकार', 'शिक्षा का अधिकार', 'सूचना का अधिकार', 'वाक एवं अभिव्यक्ति का अधिकार' सरीखे आकर्षक होते हैं। पता ही नहीं चलता कि कब भूखी जनता को भोजन देने के नाम पर सत्तासीन हुई सरकारें उनकी थाली के बचे खुचे निवाले भी लेकर उड़नछू हो जाती हैं। किसानों को राहत देने के नाम पर मिल मालिकों के कर्जे माफ कर देती हैं, सस्ती बिजली देने के नाम पर बिजली कंपनियों को सब्सिडी के नाम पर भारी मुनाफा प्रदान कर जाती हैं और बाद में इसकी भरपाई टैक्स की दर में वृद्धि कर और नए सेस भी लगा जाती हैं।

दरअसल, दुनिया में भांति भांति के तूफान हैं, और सभी तूफानों के अपने अलग तूफान हैं। बॉक्स ऑफिस पर हर शुक्रवार को तूफान आता है, जिसमें दो चार फिल्में टीन टप्पर के साथ उड़ जाती हैं। उनका नामलेवा नहीं बचता। किसान की जिंदगी में तूफान तब आता है, जब कर्ज लेकर बोई फसल बेमौसम बारिश या ओले से खराब हो जाती है। किसानों के परिवार में तूफान तब आता है, जब महज 40-50 रुपए कर्ज न चुका पाने की मजबूरी में किसान खुदकुशी कर लेता है।

दरअसल, तूफान का स्वरूप भौतिक कम मानसिक ज्यादा होता है और असल मुद्दा मानसिक तूफान को ही काबू में करने का है। वरना सच यही है कि आम गरीब की जिंदगी में जितने तूफान एक साथ आते हैं उसका एक फीसदी भी मध्यवर्ग की जिंदगी में आ जाता है तो लोगों को मौत के अलावा कोई चारा नहीं दिखता। गरीब तूफान झेलने का अभ्यस्त होता है। वो तूफानों से घबराता नहीं उसका सामना करता है। तूफानों को झेलने के उसके जज्बे को सलाम !!

- पीयूष पांडे (लेखक, वरिष्ठ टीवी पत्रकार और व्यंग्यकार हैं। उनके दो व्यंग्य संग्रह-छिछोरेबाजी का रिजोल्यूशन और धंधे मातरम प्रकाशित हो चुके हैं)

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