प्राइवेट स्कूलों में पढ़ाई की कीमत (1)

भारत में फीस लेने वाले प्राइवेट स्कूलों को स्नेह और नापसंदगी दोनों समान रूप से प्राप्त है। बच्चों की शिक्षा के लिए एक तरफ तो ये स्कूल अभिभावकों के लिए काफी मूल्यवान हैं, वहीं दूसरी तरफ इन्हें या तो 'बच्चों के जीवन के साथ खेलने वाली शिक्षा की दुकानों (टीचिंग शॉप्स)' अथवा ऊंची फीस वसूलने वाले मुनाफाखोर संस्थाओं के तौर पर नापसंद भी किया जाता है। प्राइवेट स्कूलों की नैतिकता का प्रश्नचिन्ह होने के बावजूद देश में सभी प्रकार की प्राइवेट शिक्षा जैसे कि झुग्गी झोपड़ियों में चलने वाले प्राइवेट स्कूलों से लेकर कुलीन प्राइवेट स्कूलों के विस्तार के साथ एक ख़ामोश प्राइवेट स्कूल क्रांति (साइलेंट प्राइवेट स्कूल रिवोल्यूशन) जारी है। वर्ष 2011 से 2015 के बीच सरकारी स्कूलों में जानें वाले बच्चों की संख्या में 11 मिलियन की गिरावट आयी जबकि सरकारी डीआईएसई (डिस्ट्रिक्ट इंफोर्मेशन सिस्टम फॉर एजुकेशन) द्वारा इसी दरम्यान किए गए स्कूल जनसंख्या गणना (स्कूल सेंसस डेटा) के मुताबिक प्राइवेट स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों की संख्या में 16 मिलियन की वृद्धि दर्ज की गयी। अभिभावकों ने फ्री ट्यूशन, टेक्सटबुक्स, यूनिफॉर्म्स, स्कूल बैग और भोजन प्रदान किए जाने के बावजूद सरकारी स्कूलों की उपेक्षा करते हुए निजी शिक्षा को आत्मसात किया।

यह बदलाव क्यों?
इस तेज बदलाव की व्याख्या आमतौर पर हल्के फुल्के ढंग से जैसे कि अभिभावकों के बीच बच्चों को इंग्लिश पढ़ाने की बढ़ती चाहत अथवा देश में बढ़ती संपन्नता के तौर पर कर दी गयी है। जबकि अभिभावक सरकार द्वारा संचालित स्कूलों की तुलना में कम फीस वाले गैर-मान्यता प्राप्त छोटे स्कूलों में भी शिक्षा के उच्च स्तर को देख रहे हैं। चूंकि वार्षिक एएसईआर (एनुअल स्टेटस ऑफ एजुकेशन रिपोर्ट) के पिछले लगातार 10 वर्षों के आंकड़ें यह दर्शातें हैं कि ग्रामीण प्राइवेट स्कूलों में शिक्षा का स्तर सरकारी स्कूलों की तुलना में काफी बढ़िया रहा है इसलिए विरोधी मत वाले लोगों के लिए अब इससे इन्कार करना मुश्किल हो गया है। उदाहरण के लिए, स्कूल-टीईएलएलएस सर्वेक्षण और सैन डिएगो, यूएस स्थित यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया में इकोनॉमिक्स के एसोसिएट प्रोफेसर कार्तिक मुरलीधरन द्वारा किए गए हालिया अध्ययन के मुताबिक प्राइवेट स्कूलों के अध्यापकों द्वारा छात्रों को सिखाने के लिए किये जाने वाले प्रयास व स्कूलों मे उपस्थिति सरकारी स्कूलों की तुलना में अधिक होती है। देशव्यापी और बढ़ती उपलब्धता के बावजूद निजी स्कूलों की वास्तविकता के बारे में लोगों को कम ही जानकारी प्राप्त हो पाती है। इसका बड़ा कारण एनसीईआरटी द्वारा छात्रों के सीखने के स्तर के बाबत किए जाने वाले राष्ट्रीय उपलब्धि सर्वेक्षण (नेशनल अचीवमेंट सर्वे) और न्यूपा (नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ एजुकेशनल प्लानिंग एंड एडमिनिस्ट्रेशन) द्वारा नौ राज्यों में अध्यापकों पर किये गए हालिया अध्ययन व अध्यापकों की अनुपस्थिति दर जैसी सरकारी गणनाओं के तहत डेटा संग्रहण प्रक्रिया से उन्हें बाहर रखना है।

क्या प्राइवेट स्कूल बेहतर हैं?
देश में निजी व सरकारी दोनों स्कूली शिक्षा की समग्रता का ध्यान रखना अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। वास्तविकता की अनदेखी करने से प्रमाणिकता की बजाए झुकाव, विचारधारा अथवा हित आधारित बेकार नीतियों/कानूनों के बनने का खतरा होता है। शिक्षा का अधिकार (आरटीई एक्ट) कानून 2009 का आदेश है कि ऐसे प्राइवेट स्कूल जो 'सरकारी मान्यता' हासिल करने के लिए आवश्यक आधारभूत संरचना (इंफ्रास्ट्रक्चर) वाले नियमों का पालन नहीं करते हैं, बंद होंगे। जबकि एनएसएस 2014 के आंकड़ों को प्रदर्शित करता हालिया बजट प्राइवेट स्कूल रिपोर्ट यह प्रदर्शित करता है कि भारत के 80 प्रतिशत से अधिक प्राइवेट स्कूलों में फी लेवल सरकारी स्कूलों में खर्च होने वाले प्रति छात्र खर्च से कम है। चूंकि सरकार स्वयं यह स्वीकार करती है कि महज़ 6.4 प्रतिशत सरकारी स्कूल ही आरटीई एक्ट के आधारभूत संरचना वाले मानकों को पूरा करते हैं तब सरकारी स्कूलों पर खर्च होने वाली राशि के छोटे से हिस्से के बराबर की लागत में संचालित होने वाले प्राइवेट स्कूल मानकों का अनुपालन कैसे कर सकते हैं? सूचना के अधिकार (आरटीआई) व सरकारी रिपोर्टों से प्राप्त जानकारियों के आधार पर नेशनल इंडिपेंडेंट स्कूल्स अलायंस (निसा) द्वारा वर्ष 2014-16 के बीच 10 राज्यों से जुटाए गए छिटपुट आंकड़ों के मुताबिक कुल 6,489 गैर मान्यता प्राप्त प्राइवेट स्कूल बंद हो गए, 7,898 स्कूलों को बंद करने अथवा कारण बताओ नोटिस जारी किए गए व 14,911 स्कूलों को बंद करने की चेतावनी मिली। कानून निर्माताओं ने यदि प्राइवेट और सरकारी स्कूलों के संबंध में जमीनी हकीकत का पता लगा लिया होता तो आरटीई एक्ट के कारण गैर इरादतन प्राप्त होने वाले ऐसे अवांछनीय परिणामों को टाला जा सकता था।

जारी है..

- गीता गांधी किंगडन
अध्यक्ष, एजुकेशन इकोनॉमिक्स एंड इंटरनेशनल डेवलपमेंट, यूनिवर्सिटी कॉलेज, लंदन

साभारः http://m.indiatoday.in/story/private-schools-price-studying/1/992849.html

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