सेंसरशिप से जलवायु परिवर्तन पर सच्चाई खतरे में
सेंसरशिप को हमेशा ही कथित रूप से जनता की भलाई में लागू किया जाता है ताकि लोगों की सोच को बेफजूल के विचारों से प्रभावित होने से बचाया जा सके। वास्तविकता में तो सेंसरशिप विरोधियों के मुंह पर ताला जड़कर एक कृत्रिम सच को तैयार करने की ताकतवर लोगों की एक चाल है।
जलवायु परिवर्तन पर अंतरराष्ट्रीय पैनल (आईपीसीसी) के एक सदस्य पैट्रिक माइकल्स का आरोप है कि जलवायु प्रतिष्ठान (climate establishment) भी एक ऐसी कृत्रिम सहमति बनाने का प्रयास कर रहा है। इसके तहत शैक्षिक पत्रिकाओं से बड़ी सफाई से लेखों को सेंसर या खारिज किया जा रहा है, विरोध के स्वरों को दबाया जा रहा है। उनकी जानकारी दुरुस्त होनी चाहिए क्योंकि वह इस प्रयास के शिकार हुए हैं। नोबल शांति पुरस्कार जीतने वाले आईपीसीसी वैज्ञानिक जलवायु परिवर्तन के मसले पर एकमत नहीं हैं। पैट्रिक माइकल्स और जॉन क्रिस्टी जैसे कुछ विद्वानों का कहना है कि ग्लोबल वार्मिंग को लेकर डर कुछ ज्यादा ही बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जा रहा है। जलवायु प्रतिष्ठान विरोध के अधिकांश स्वरों की तुलना नरसंहार (holocaust) से इनकार करने वाले लोगों से कर रहा है। नोबल शांति पुरस्कार जीतने वाली टीम के सदस्यों माइकल या क्रिस्टी को इतनी आसानी से खारिज नहीं किया जा सकता।
क्लाइमेटगेट, जलवायु प्रतिष्ठान का वह ताजातरीन घोटाला है जिसके अनुसार ईस्ट एंजेलिया यूनिवर्सिटी की क्लाइमेट रिसर्च यूनिट (सीआरयू) में विरोध के स्वरों को दबाने के लिए फिल जोंस और माइकल मान जैसे वैज्ञानिकों ने ईमेल नष्ट करने, आंकड़े छिपाने की कोशिश की और यहां तक कि सूचना की आजादी के तहत आए जानकारी मांगने वाले खतों की अनदेखी की गई। मान और जोंस का कहना है कि सेंसरशिप के उनके प्रयास सीमित थे और इसका जलवायु परिवर्तन की सच्चाई पर कोई असर नहीं पड़ेगा। क्या वाकई? फिर आखिर सेंसरशिप के इस सीमित प्रयास की जरूरत ही क्यों पड़ी? ये काबिल लोग क्या करेंगे अगर कोई ऐसी बात उनके सामने आती जो उनके प्रतिष्ठान के विचारों के लिए खतरा होती?
वाल स्ट्रीट जर्नल ओप-एड में माइकल्स लिखते हैं कि सेंसरशिप का यह बेहूदा प्रयास किसी आइसबर्ग की टिप की तरह छलावे से भरा है। विशेषज्ञों की समीक्षा वाली शैक्षिक पत्रिकाएं वैज्ञानिकों के लिए बाइबल की तरह होते हैं। प्रतिष्ठानों के वैज्ञानिक अब इन पत्रिकाओं से विरोधियों को निकाल बाहर करने का प्रयास कर रहे हैं और उन पत्रिकाओं को बंद कराने पर आमादा हैं जो उनकी मर्जी के मुताबिक नहीं चलतीं। शैक्षिक साहित्य में मतों की स्थापना को लेकर यह घालमेल और फर्जी "वैज्ञानिक सहमति" बनाने की कोशिश इस बात का संकेत देती है कि दाल में कुछ काला है।
आईपीसीसी के दस्तावेजों सहित जलवायु पर उपलब्ध शैक्षिक साहित्य ने 1990 में बताया था कि मध्ययुगीन गर्म काल, यानी लगभग ईसवी सन् 1100 का काल 20वीं सदी से ज्यादा गर्म था। फिर 1999 में मान ने "हॉकी स्टिक की परिकल्पना" पेश की। बहुआयामी आंकड़ों और संदिग्ध आंकड़ों के समर्थन मध्ययुगीन गर्म काल और इसके बाद के "संक्षिप्त शीत युग" (16वीं सदी के उत्तरार्द्ध से लेकर 19वीं सदी के मध्य तक का ठंडा युग) को ही खारिज करके 20वीं सदी के तापमान में इजाफे को ही तापमान का बड़ा परिवर्तन करार दे दिया। आईपीसीसी प्रतिष्ठान ने जलवायु परिवर्तन के समूचे इतिहास के नये लेखन को तुरंत स्वीकार लिया। किसी अन्य शास्त्र में हॉकी स्टिक शोध प्रबंध सच का आभास देने वाली परिकल्पना के तौर पर दर्ज किया जाता, लेकिन आईपीसीसी ने तो सारे पूर्व साहित्य को एक झटके में सिरे से खारिज कर दिया था।
फिर एक प्रतिष्ठित पत्रिका क्लाइमेट रिसर्च ने प्रतिष्ठान की सोच को चुनौती देने वाले दो लेख प्रकाशित किए। एक 2003 में विली सून और सेली बेलिनॉक (हारवर्ड-स्मिथसोनियन सेंटर फॉर एस्ट्रोफिजिक्स के) का, जिसमें जलवायु पर दर्जनों पुराकालीन साहित्य का विश्लेषण करके यह दावा किया गया कि 20वीं सदी का तापमान किसी भी सूरत में एक हजार साल पहले मौजूद तापमान से ज्यादा नहीं कहा जा सकता। इसने मध्ययुगीन गर्म युग की पुष्टि ही की। प्रतिष्ठान को इसके अलावा 2002 में माइकल्स का क्लाइमेट रिसर्च में ही प्रकाशित लेख भी रास नहीं आया। इस लेख में बताया गया था कि सीआरयू के अपने आंकड़ों के मुताबिक तापमान में बढ़ोत्तरी आईपीसीसी के मॉडल के पूर्वानुमानों जितनी ज्यादा नहीं है। इस लेख से यह संकेत मिला कि आईपीसीसी के मॉडल वातावरण में मौजूद कार्बन डायऑक्साइड के प्रभाव को संभवतया कुछ ज्यादा ही बढ़ा-चढ़ाकर पेश कर रहे हैं। सामान्य शैक्षिक प्रक्रिया में प्रतिष्ठान इसके खंडन की कोशिश करता, लेकिन मान ने तो क्लाइमेट रिसर्च को ही बंद करने का सुझाव दे डाला या कम से कम इसे जानकारी से वंचित करने की वकालत कर डाली। उसने अपनी एक ईमेल में लिखा, "हमें शायद जलवायु पर शोध कर रहे अपने साथियों को इस पत्रिका में योगदान देने या रिसर्च पेपर समीक्षा के लिए देने से बचना चाहिए। साथ ही हमें इस बात पर भी सोचना चाहिए कि संपादकीय बोर्ड में शामिल अपने विवेकपूर्ण मित्रों से हम क्या गुजारिश करें या क्या कहें।"
प्रतिष्ठान से जुड़े वैज्ञानिकों की प्रकाशन और समीक्षा के बहिष्कार की धमकी के बाद क्लाइमेट रिसर्च के आधे संपादकीय बोर्ड ने इस्तीफा दे दिया। माइकल्स जैसे वैज्ञानिकों के लिए इसमें छपना और अधिक मुश्किल होता चला गया। सेली बेलीनॉस जैसों ने तो इसकी कोशिश ही छोड़ दी, "भीड़ से डरे संपादकों से लेखों की अस्वीकृति से थककर।"
जियोफिजिक्स रिसर्च लेटर्स (जीआरएल) एक अन्य प्रतिष्ठित और लोकप्रिय पत्रिका है। क्लाइमेटगेट घोटाले ने इस बात का खुलासा कर दिया कि प्रतिष्ठान के वैज्ञानिकों द्वारा लिखी गईं ई-मेल में जलवायु को लेकर संदेह करने वाले एक संपादक की छुट्टी करने की मांग की गई थी। "क्लाइमेट रिसर्च को गंवाना एक बात थी लेकिन अब जीआरएल को गंवाना गवारा नहीं कर सकते।" प्रतिष्ठान उस संपादक को निकाल बाहर करने में कामयाब रहा, उसके बाद खुशियों से भरी एक ई-मेल में कहा गया, "जीआरएल में नये संपादकीय नेतृत्व से सुधार आएगा।"
अफसोस की बात है कि अब खुद आईपीसीसी पर शैक्षिक पत्रिकाओं पर कब्जे की कोशिशों और विरोध के स्वरों को सेंसर करने के प्रयासों के दाग लगने लगे हैं। कुछ विरोधी स्वरों को लेकर मान ने कथित तौर पर कहा है, "मुझे नहीं लगता कि इस तरह के पेपर का आईपीसीसी की अगली रिपोर्ट में कोई जिक्र होगा। केविन और मैं मिलकर इसे किसी तरह से बाहर रखेंगे-फिर भले ही हमें समीक्षा को लेकर स्वीकारे जाने वाले साहित्य को नये सिरे से परिभाषित करना पड़े।" संयुक्त राष्ट्र का एक धड़ा होने के कारण आईपीसीसी को किसी एक या दूसरे वैज्ञानिक धड़े के कब्जे की अनुमति नहीं देना चाहिए। इसे तो सभी विचारों को पर्याप्त मौका देना चाहिए। वास्तविकता में तो आईपीसीसी को विरोधी मत सहित समीक्षा के लिए हर तरह का साहित्य स्वीकारना चाहिए।
क्या ऐसा हो रहा है? माइकल्स का कहना है, नहीं, "जलवायु परिवर्तन पर आईपीसीसी के पिछले सार प्रकाशन, 2007, में ऐसे ढेर सारे साहित्य को बाहर ही रखा गया था जो इसके विचारों से सहमति नहीं जताता था। इसमें आर्कटिक, बुलेटिन ऑफ द अमेरिकन मीटियरोलॉजिकल सोसायटी, अर्थ इंटरएक्शंस, जियोफिजिकल रिसर्च लेटर्स, इंटरनेशनल जर्नल ऑफ क्लाइमेटालॉजी, जर्नल ऑफ क्लाइमेट, जर्नल ऑफ जियोफिजिकल रिसर्च, नेचर, प्रोसीडिंग ऑफ द नेशनल एकाडमी ऑफ साइंसेज, क्वार्टरनेरी रिसर्च के लेख भी शामिल हैं।"
यह एक गंभीर तोहमत है। माइकल्स महज शक्की किस्म के शख्स नहीं हैं- वह तापमान में बढ़ोत्तरी का प्रमाण देखते हैं, लेकिन उनका कहना केवल इतना है कि इसे बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जा रहा है। तो यह प्रतिष्ठान द्वारा एक शक्की व्यक्ति को चुप कराने की कोशिश नहीं है- यह तो एक गैर संदेहवादी, जिसमें अपर्याप्त धार्मिक उत्साह है, को चुप कराने का प्रयास है। वैज्ञानिक कार्यप्रणाली आमतौर पर छलावे की कोशिशों की कलई खोलकर रख देती है। यहां समस्या यह है कि आईपीसीसी ने नोबल पुरस्कार जीत लिया है। प्रतिष्ठान के वैज्ञानिक भी इनसान हैं और उनसे खुद को अवार्ड के लायक साबित करने के लिए तथ्यों से छेड़छाड़ की उम्मीद की जा सकती है। वैज्ञानिक सच की बजाय उनके लिए वह ज्यादा उचित लक्ष्य हो सकता है। खतरा यहीं छिपा है।
- स्वामीनाथन एस. ए. अय्यर द्वारा लिखे लेख शीर्ष बिजनेस अखबारों में स्वामीनॉमिक्स कॉलम में प्रकाशित
होते हैं। अधिक जानकारी के लिये देखें: http://swaminomics.org
