क्लासिक्स

रॉबर्ट हिग्स

रॉबर्ट हिग्स राजनीतिक अर्थशास्त्र में द इंडिपेंडेंट इंस्टीट्यूट के सीनियर फेलो हैं। इंस्टीट्यूट की त्रैमासिक जर्नल द इंडिपेंडेंट रिव्यू के संपादक भी हैं। उन्होंने जॉन हॉपकिंस यूनिवर्सिटी से अर्थशास्त्र में पीएचडी की। वह यूनिवर्सिटी ऑफ वाशिंगटन, लाफायेत कॉलेज, सीएटल यूनिवर्सिटी और प्राग की यूनिवर्सिटी ऑफ इकानॉमिक्स में पढ़ा चुके हैं। वे ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी और स्टेनफोर्ड यूनिवर्सिटी में विजिटिंग स्कॉलर हैं। वे हूवर यूनिवर्सिटी और नेशनल साइंस फाउंडेशन के फेलो हैं। वह कई किताबें भी लिख चुके हैं, डिप्रेशन, वार एंड कोल्ड वार सहित।

संकट, बड़ी सरकारें और वैचारिक परिवर्तन

रॉबर्ट हिग्स राजनीतिक अर्थशास्त्र में द इंडिपेंडेंट इंस्टीट्यूट के सीनियर फेलो हैं। इंस्टीट्यूट की त्रैमासिक जर्नल द इंडिपेंडेंट रिव्यू के संपादक भी हैं। उन्होंने जॉन हॉपकिंस यूनिवर्सिटी से अर्थशास्त्र में पीएचडी की। वह यूनिवर्सिटी ऑफ वाशिंगटन, लाफायेत कॉलेज, सीएटल यूनिवर्सिटी और प्राग की यूनिवर्सिटी ऑफ इकानॉमिक्स में पढ़ा चुके हैं। वे ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी और स्टेनफोर्ड यूनिवर्सिटी में विजिटिंग स्कॉलर हैं। वे हूवर यूनिवर्सिटी और नेशनल साइंस फाउंडेशन के फेलो हैं। वह कई किताबें भी लिख चुके हैं, डिप्रेशन, वार एंड कोल्ड वार सहित।

अपने बुतपरस्त दुश्मन का खुलकर जिक्र करो
क्योंकि रोम खतरे में है
अगर तुमने इस चिंघाड़ते हिंसक जानवर को खुला छोड़ा तो;
चार सादे से शब्दों में बयान करो
इस दैत्य का जो उस पर मंडरा रहा है
लेकिन अगर हमारे भिखारी इसकी कीमत मांगें तो
उनको किसी पंछी की तरह झिड़ककर दुत्कार दो;
दुस्साहस दिखाओ, पोप और सीजर भी जानते हैं
भरोसे और सम्मान की कीमत?
- डब्ल्यू. एच. ऑडेन

आधुनिक मिश्रित अर्थव्यवस्था 20वीं सदी के अमेरिका के जबर्दस्त रुपांतरण का प्रतीक है। आर्थिक इतिहासकार इस महान घटनाक्रम की अनदेखी नहीं कर सकते। हालांकि इस दिशा में हाल तक के विश्लेषणात्मक प्रयास सामान्य से रहे हैं। सभी बेझिझक यह मानकर ही चलते थे कि एक तेजी से उभरती "पूंजीवादी," शहरी-औद्योगिक अर्थव्यवस्था अंततः एक बड़ी और हस्तक्षेप करने वाली सरकार को ही जन्म देती है। हाल ही में, सरकार के विकास के कुछ विश्लेषकों ने कुछ और ज्यादा स्पष्ट परिकल्पना पेश की है, कुछ ने तो अपने तर्कों को पहले से मौजूद आंकड़ों (बोरशेरिडंग 1977, मेल्टजर और रिचर्ड 1978, पेल्ट्जमैन 1980, वेट्टर 1979)2 के तराजू में आंकने की कोशिश की है। इस बारे में उपलब्ध अधिकांश सामग्री मशीनी किस्म की है और यह मिश्रित अर्थव्यवस्था के एक वास्तविक ऐतिहासिक प्रक्रिया होने को लेकर भी कोई स्पष्टता नहीं दे पाती। इस प्रक्रिया की वास्तविक ऐतिहासिक घटनाओं का अध्ययन करने वाले-पहले से मौजूद चंद आधी-अधूरी बातों के विपरीत-तीन महत्वपूर्ण पहलुओं का जिक्र करते हैं-पहला, इसमें केवल ज्यादा खर्च, कर और सरकार से रोजगार ही शामिल नहीं है, बल्कि आर्थिक मामलों के फैसले यह ज्यादा आधारभूत तरीके से यह सरकार के हाथों में देती है। दूसरा, अधिकारों में इजाफे का यह सिलसिला सामाजिक संकटों के चंद प्रसंगों के कारण पेश आया था, खासतौर पर दूसरे महायुद्ध और व्यापक मंदी के दिनों में। तीसरा सरकारी हस्तक्षेप बढ़ने के साथ ही मौजूदा विचारधारा में भी बदलाव आया। आधुनिक राजनीतिक अर्थशास्त्र में विचारधारा की भूमिका में आर्थिक इतिहासकार ज्यादा रुचि लेने लगे। (ओमस्टीड और गोल्डबर्ग, 1975, पेज 197-199, वेट्टर, 1979, पेज 306-309, नॉर्थ, 1979, पेज 250-251, 259, 1981, पेज 45-48, डेविस, 1980, पेज 9, 12, वीवर, 1983, पेज 295, 296, 322)। जहां तक कारगर परिकल्पना की बात है, उनका अकाल है।

मैं प्रस्ताव करता हूं कि हम सरकार के अधिकार क्षेत्र के विस्तार को परिस्थितियों पर निर्भर मान लें। यानि इस लिहाज से ऐतिहासिक कि जो लोग इसे लाए थे वो उस पल विशेष में मौजूदा परिस्थितियों से प्रभावित थे, उसके खतरों को लेकर सजग। उन्होंने जो किया वह उनके पूर्व अनुभवों पर आधारित था। इस वजह से संकट के कारण सरकार के अधिकार क्षेत्र में इजाफा किया गया तो एक वास्तविक "सामान्य स्थिति पर वापसी" लगभग नामुमकिन ही थी। यह अपरिवर्तनीय स्थिति न केवल आपदाग्रस्त संस्थाओं (उदाहरण के लिए प्रशासकीय संस्थाएं और पहले के कानूनी पेंच) के कारण जिनमें से कुछ अर्थशास्त्रियों द्वारा सरकार के आकार को लेकर उठाए जाने वाले कदमों में दिखाई भी देती है। खास बात यह है कि व्यवहार का यह जो अंतर्निहित ढांचा है यह पूर्ववत यथास्थिति पर नहीं लौट सकता। कारण जाहिर सा है, संकट की स्थिति ने संभावनाओं, कामकाज के तरीके, खतरों और जरूरतों को लेकर समझ और सोच को ही बदल डाला। यानी हर संकट ने तत्कालीन वैचारिक माहौल को ही बदल डाला। सतही तौर पर भले ही संकट के बाद की अर्थव्यवस्था व समाज और संकट के पहले की अर्थव्यवस्था-समाज में साम्य दिखता हो लेकिन यह वास्तविकता के लिहाज से छलावे भरा है।

संकटों का सामना कर चुके और सरकार के बढे़ हुए अधिकारो का अनुभव ले चुके लोगो के दिलो-दिमाग यानी उनके भविष्य के व्यवहार और प्रतिक्रिया के मूल केंद्र में आधारभूत ढांचा वाकई बदल गया हैं। पूर्व में आजमाए गए रास्ते पर ही निर्भरता की विचारधारा को लेकर आर्थिक इतिहासकारों ने अन्य संदर्भो में भी चर्चा कर रखी है। उदाहरण के लिए पॉल डेविड ने इसे प्रौद्योगिकी में परिवर्तन के लिए इस्तेमाल किया है। भविष्य के कदमों में निर्धारण में मशीनी दृष्टिकोण  के जरिये भूतकाल के महज क्षणिक दृष्टिकोण के तौर पर इस्तेमाल की डेविड (1975, पेज 11, 15) आलोचना करते  हैं। वह उस पुरानी अपरिवर्तनियता का जिक्र करते हैं, जिसमें पुराने आर्थिक ढांचा गुम हो जाता है। जोसेफ शूम्पटर (1950, पेज 72) ने काफी पहले इसे आर्थिक अपराध की संज्ञा देते हुए कहा था कि जब इतिहास के घटनाक्रम की बात होती है तो ऐतिहासिक घटनाक्रम ही आर्थिक ढांचे में अपरिवर्तनीय स्थिति का संकेत होते हैं, जो किसी भी अर्थतंत्र के सिद्धांतों को प्रभावित कर सकते हैं।3 आर्थिक इतिहासकार सरकार के विकास के अध्ययन के लिए इस वास्तविक गतिशील दृष्टिकोण को अपना सकते हैं, ताजा आलेख में मेरा काम इस बात का संकेत देना है कि ऐसा किस तरह से किया जा सकता है। इसमें मैं अर्थशास्त्रियों को ज्ञान कुछ योजनागत विश्लेषण और तय प्रारूप वाली कुछ सदृश्यता (analogies) के इस्तेमाल के बारे में बताऊंगा।

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