हमारी फिल्मों में सताना भी अच्छा माना जाता है और पीछा करना भी

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दिल्ली में पैरामेडिक लड़की पर हुए हमले और बलात्कार के खिलाफ बड़े पैमाने विरोध प्रदर्शन हुए और इस बात की आलोटना भी की गईं कि हम महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार क्यों करते हैं। इस व्यवहार की एक प्रमुख वजह है फिल्म उद्योग जिसका कम ही जिक्र हुआ है। वह बेहद प्रतिगामी पुरूष व्यवहार को जन्म देता है इस कारण आंशिक रूप से दुर्व्यवहार के लिए  जिम्मेदार है।

कुछ नारीवादी बालीवुड में महिलाओं को ईशा कोप्पिकर ,मलिका शेरावत और अन्य अबिनेत्रियों के सेक्सी डांसों जिन्हें आइटम नंबर कहा जाता है में महिलाओं को उपभोक्ता वस्तु के तौरपर पेश किए जाने मुद्दा उठाती हैं। कुछ दर्शकों को गुदगुदानेवाले बलात्कार दृश्यों की  लोकप्रियता पर सवाल खड़े करते हैं। पुराने जमाने के खलनायक रंजित ने लगभग सौ बलात्कार दृश्य किए जिनको दर्शकों की काफी दाद मिलती थी।

इसके बावजूद आइटम नंबर और बल्त्कार के दृश्य मुख्य समस्या नहीं हैं।क्योंकि कैबरे डांसर और खलनायक दर्शकों के रोल मांडल नहीं होते। लेकिन असल में डरावनी बात यह है कि  फिल्मी हीरो जिसतरह हजारों फिल्मों में हीरोइनों को सताते ,पीछा करते या  अवांछित रूप से ध्यान देते हैं । इसके बाद लड़की को पाने में कामयाब हो जाते हैं। इससे लोगों में बहुत भडकाऊ संदेश जाता है-हीरो असल में लडकियों का सताते हैं और लडकियों की ना का मतलब हां होता है।

सताने और पीछा करने को महिमामंढित करनेवाले लोकप्रिय फिल्मी  गीतों ने समस्या को गंभीर बना दिया है। उन्हें बार बार गुनगुनाने और उनके वीडियो क्लीप देखने से से वे स्मृतियों पर छा जाते हैं और सामाजिक व्यवहार को प्रभावित करते हैं।

मेरी युवावस्था में देवानंद महान रोमांटिक हीरो था।हमने उन्हें फिल्म मुनीमजी में (जीवन के सफर में राही) हीरोइन नलीनी जयवंत को सताते हुए देखा। वे नूतन के साथ फिल्म पेइंग गेस्ट में भी वे हिट गीत “ माना जनाब ने पुकारा नहीं “ के साथ उतना ही हल्लागुल्ला करते नजर आते हैं।गाने के शब्दों में वे बेबाकी से स्वीकार करते हैं कि उन्हें पसंद नहीं किया जा रहा है फिर वे जबरन उस पर अपना ध्यान केंद्रीत किए हुए हैं। दर्शक कई दशक गुजर जाने के बावजूद इस गीत को गाते हैं बिना इस बात की परवाह किए कि उसका अर्थ कितना खतरनाक है।

राजकपूर भला कैसे पीछे रहते। फिल्म संगम में बेहद लोकप्रिय गीत “ तेरे मन की गंगा और मेरी मन की गंगा का बोल राधा बोल संगम होगा कि नहीं”  में वे नहाती हुई वैजयंतीमाला को सताते हैं। अपनी इस करतूत का औचित्य साबित करने के लिए  नहाती हुई गोपियों को सतानेवाले भगवान कृष्ण की नकल करते हुए  बालों में मोरपंख भी लगा लेते हैं। कृष्ण बंसी बजाते थे राजकपूर स्काटीश बैगपाइप बजाते हैं। यह परिवर्तन क्यों किया गया इसकी सिवाय इसके कोई सफाई नहीं हो सकती कि यह उनके स्काच व्हीस्की के प्रति प्रेम का साइड इफेक्ट था।

अमिताभ बच्चन बालीवुड के परिदृश्य पर महानायक के रूप में उभरे। महिलाओं के  सम्मान को ठेस पहुंचाने के मामले में उनका सबसे बड़ा योगदान रहा फिल्म हम में। इस फिल्म में वे और 300 पुरूषों का गिरोह हीरोइन कीमि काटकर से  लोकप्रिय गीत “जुम्मा चुम्मा दे दे ” गाते हुए चुंबन की मांग करता है। किमी काटकर गाकर जवाब देती है कि वह चुंबन नहीं देगी। पुरूष दल चुंबन की मांग जारी रखता है। आखिर में कई बार मना करने के बाद बच्चन द्वारा चुंबन लिए जाने के बाद गीत खत्म होता है। हाथापाई के बाद वे मुस्कारते हुए निकलते हैं उनके चेहरे पर लिपस्टीक के निशान होते हैं। इसका संदेश स्पष्ट है – यदि आप किसी महिला को  बहुत परेशान करें तो वह कितने ही बार ना क्यों न कहे वह आखिरकार हां कह देती है।

शायद सबसे हिट हिन्दी फिल्म शोले है। इसमें लड़की को कैसे जीता जाता है इस बारे में  धर्मेंद्र का नजरिया बताया गया । वह तांगेवाली हेमा मालिनी के तांगे  में उछलकर चढ़ जाता है ,उसे पीछे से पकड़ लेता है। वह गुस्सा करती है और उसे तांगे से धकेल देती है लेकिन वह फिर से तांगे पर चढ़ जाता है और अपना संगीतमय सताना जारी रखता है। यह गीत चलता रहता है – कोई हसीना जब रूठ जाती है तो और भी हसीन हो जाती है। क्या अपनी इस हरकत के लिए उसे जेल जाना पड़ता है। जी नहीं । हेमा मालिनी उसकी बांहों में आ जाती है । इस तरह उसे सताने के लिए पुरस्कार मिलता है।

मैं और भारतीय भाषाओं की फिल्में नहीं देखता । कुछ लोग कहते हैं कि वे और भी ज्यादा फूहड़ होती हैं। इसलिए हम केवल बालीवुड को ही दोषी न मानें।

मुझे बताया गया कि बड़ी बालीवुड फिल्मों में अब ऐसा फूहड़पन नहीं होता। लेकिन क्या सचमुच ऐसा है। मैंने राकस्टार देखी। जिसमें रणबीर कपूर एक लड़की को पटाने की कोशिश करता है वह शुरूआत में मना करती है लेकिन बाद में उसे कहती है कि उसे फिल्म दिखाने ले चले।

आखिर में फिल्म उद्योग के आदमी की टिप्पणी सुन-ऐसी फिल्में हैं जिनमें प्रैम का इजहार एक तरह से हीरोइन को सताना बन जाता है। इन फिल्मों के नायकों को कुछ सभ्य समाजों में तो पीछा करनेवाला माना जा सकता है। अब कल्पना कीजिए कि यह हीरो लाखों लोगों के रोल माडल हैं। क्या उसके प्रशंसक उसके इस व्यवहार को सही नहीं मानेंगे? अब कल्पना कीजिए कि ये हीरोइनें लाखों लोगों की रोल माडल है –इससे लोगों में क्या संदेश जाएगा? ये शब्द अभिनेता और दिग्दर्शक फरहान खान के हैं। जब वह कहते हैं कि हालात बदतर होते जा रहे हैं तो उनकी बात पर गौर कीजिए।

स्वामीनाथन अंकलेसरिया अय्यर
(टाइम्स आफ इंडिया से साभार और अनुवादित)