प्राकृतिक संसाधनों की कमी का हौव्वा

जब हम जैसे लोग यह कहते हैं कि - जनसंख्या समष्द्धि का कारण है, केवल मनुष्य ही ऐसी प्रजाति है जो धन पैदा कर सकती है और नक्शे पर  अंकित प्रत्येक बिन्दु,  जनसंख्या की दृष्टि से सघन है और ज्यादा सम्पन्न है,  तो उनके जैसे (तथाकथित समाजवादी) लोग प्राकृतिक संसाधन की कमी की बात करते हैं। उनका तर्क है कि पृथ्वी पर संसाधन सीमित हैं तथा यदि ज्यादा लोग होंगे, तो ये जल्दी समाप्त हो जायेंगे। प्राकृतिक संसाधनों की कमी की समस्या का जूलियन साइमन ने गहनतापूर्वक अध्ययन किया। उसने दीर्घकालिक मूल्य सम्बन्धी प्रवृत्तियों का अध्ययन किया और इससे बड़े रोचक परिणाम निकलकर आये कि वेतन एवं मुद्रास्फीति की तुलना में सभी प्राकृतिक संसाधनों की कीमत पिछले दो सौ सालों में लगातार गिरी है, जबकि इस दौरान पृथ्वी पर मनुष्यों की जनसंख्या बढ़ कर चार गुनी हो गई है।

यह सचमुच एक रोचक बात है। जो लोग ज़्यादा जनसंख्या का मतलब प्राकृतिक संसाधनों पर बोझ बताते हैं, यदि उनकी बात सही होती तो इस दौरान सभी प्राकृतिक संसाधनों की कीमत घटने की बजाय बढ़नी चाहिए थी, लेकिन कीमतें सचमुच गिर रही थी और वे भी अविश्वसनीय तरीके से। उदाहरण के लिए पिछले 200 वर्षों में तांबे की कीमतें देखें। ताँबा बहुतायत में प्रयोग होने वाली धातु है। यह प्रकृति में एक निश्चित मात्रा में ही उपलब्ध है। मनुष्यों की जनसंख्या चौगुनी हो चुकी है। तो फिर तांबे की कीमतों में गिरावट का क्या स्पष्टीकरण है? अनेकों अध्ययन करके जूलियन साइमन ने अद्भुत निष्कर्ष निकाला कि “ज्यादा मनुष्यों का अर्थ है ज्यादा संसाधन, न कि कम।”

इसी आधार पर 1980 में जूलियन साइमन ने एक ऐसा कार्य किया जो अध्यवेत्ता के लिए नई बात थी – उसने अपने इस निष्कर्ष के आधार एक शर्त रखी। जिसके अनुसार - कोई 5 प्राकृतिक संसाधन चुनिए व 200 डॉलर का प्रत्येक संसाधन खरीदकर एक हजार डालर की एक टोकरी बनाइये। तथा फिर 1990 में यानि दस साल बाद उस टोकरी की कीमत पुनः पता कीजिए। यदि टोकरी का मूल्य बढ़ा, तो आप जीते और यदि कम हुआ, तो जूलियन साइमन विजयी होंगे।

’’द पॉपुलेशन बॉम्ब’’ नामक पुस्तक के लेखक पॉल अरलिच ने जूलियन की शर्त स्वीकार की और 576.07 डालर गँवाए। वह संयुक्त टोकरी जो 1980 में 1000 डालर की थी, 1990 में मात्र 423.93 डॉलर की रह गई। अरलिचने जो पाँच प्राकृतिक संसाधन चुने थे, वे थे - तांबा, टंगस्टन, क्रोम, निकिल एवं टिन। ये सभी अत्यधिक मात्रा में प्रयोग होते हैं। फिर इनकी कीमतें इतनी कैसे गिरीं?

पुनः, कारण है - वैचारिक मतभेद। अरलिच एक जीव विज्ञानी हैं, जिनका सीधा सा सिद्धान्त है कि संसार में सीमित संसाधन हैं और यदि मनुष्यों की संख्या ज्यादा बढ़ेगी तो संसाधन कम होते जायेंगे। जबकि जूलियन साइमन एक अर्थशास्त्री थे। उन्होंने दीर्घकालिक मूल्य - प्रवृत्तियों का अध्ययन किया। उनकी दष्ष्टि में पृथ्वी अथाह संसाधनों से युक्त एक विशाल ग्रह है। और संसाधन तभी अस्तित्व में आते हैं, जब मनुष्य उन्हें प्रयोग करते हैं। इस प्रकार यदि मनुष्य ज़्यादा हैं तो संसाधन भी ज़्यादा होंगे। मनुष्य ही शाश्वत संसाधन हैं।

वास्तव में, यह भी सत्य है कि बेशक पिछले 200 वर्षों में मनुष्यों की जनंसख्या चार गनुी हो गयी है परन्तु उनकी आय का मूल्य भी बढ़ा है। सभी प्राकृतिक संसाधनों की कीमतों में गिरावट हुई है परन्तु मनुष्य का मूल्य बढ़ा है। प्राकृतिक संसाधनों की कमी के सन्दर्भ में दिये जाने वाले तर्क की भीषण गलतियों को समझने के लिए आइये ऊर्जा के एक स्रोत तेल का उदाहरण देखते हैं।

तेल की कीमतें कृत्रिम तरीके से बढ़ी हैं क्योंकि एक उत्पादक संघ इसकी आपूर्ति में कटौती करता है। अन्यथा इसकी कीमतें भी कम हुई होतीं। क्या यह ’ओपेक’ (OPEC) के लिए बुद्धिमत्तापूर्ण है? फिर भी इस सबके बावजूद भी, जबकि तेल की कीमतें बढ़ रही हैं तो जो लोग विकल्प की खोज करते हैं, अर्थशास्त्र उनके साथ है जेनेवा मोटर शो के दौरान फ्यूल सैल (Fuel-cell) कार का प्रदर्शन किया गया। यह प्रौद्योगिकी एक दशक में ही अपनी उपस्थिति दर्ज करा देगी। जनरल मोटर्स तो घोषणा कर चुकी है कि सन् 2006 तक वह कार्यालयों एवं घरों में प्रयोग के लिए फ्यूल सैल का उत्पादन शुरू कर देगी। तेल की समाप्ति से काफी पहले ही मानव सभ्यता इसके सस्ते विकल्प को तलाश लेगी।

“मनुष्य की संख्या समस्या नहीं है। मनुष्य तो संसाधन युक्त है।”

जैसा कि जूलियन साइमन कहते हैं कि मनुष्य का मस्तिष्क शाश्वत संसाधन है। यह मस्तिष्क ही पृथ्वी के गर्भ से ज़्यादा-से-ज़्यादा संसाधनों को अस्तित्व में लाता है। जरा ऊर्जा का इतिहास देखिए - जब इंग्लैण्ड में औद्योगिकीकरण शुरू हुआ, तो इस्पात बनाने में चारकोल (काठकोयला) का प्रयोग होता था। इससे ब्रिटिश वनों में कमी आई। मनुष्य के मस्तिष्क ने इस चुनौती को स्वीकार किया और कोयले की खदानों से कोयला निकालना शुरू किया। चारकोल की कमी के चलते यह बहुत ही फायदेमंद था। समय के साथ कोयला ऊर्जा का मुख्य स्रोत हो गया तथा ब्रिटेन के जंगल पुनः हरे-भरे हो गये। फिर लैम्पों में रोशनी के लिए व्हेल के तेल का प्रयोग किया जाता था।

विलुप्त-प्राय होने तक व्हेलों का शिकार किया गया और स्वाभाविक तरीके से व्हेल के तेल की कीमत बढ़ी। मनुष्य के मस्तिष्क ने इस चुनौती को जमीन के अंदर तेल खोजकर हल किया। इसके बाद बिजली आई। आज आप कोयले का विशाल ढेर खरीद सकते है। अब कोयले की खुदाई नहीं के बराबर है परन्तु, अभी भी जमीन के अन्दर कोयला है। यह समाप्त नहीं हुआ है।

ठीक इसी प्रकार तेल एंव प्राकृतिक गैस भी हमेशा रहेंगे क्योंकि मानव मस्तिष्क इनके विकल्प तलाश लेगा। यहां तक कि ऊर्जा के ये अपूर्य (non-renewable) स्रोत भी कभी पूर्णतः समाप्त नहीं होंगे। ऊर्जा की कीमत इसके विकल्पों को तलाशने के लिए तत्पर करेगी।

- सेंटर फॉर सिविल सोसायटी द्वारा प्रकाशित उदारवाद (राज, समाज और बाजार का नया पाठ) पुस्तक से साभार
लेखक परिचयः
सौविक चक्रवर्ती (पूर्व आई.पी.एस. अधिकारी) दी इकोनॉमिक टाइम्स के वरिष्ठ सहायक सम्पादक रह चुके हैं। इन्होंने बिजनेस इकोनॉमिक्स में एम.ए. दिल्ली वि.वि. से, लोक प्रशासन एवं जननीति में एम.एस.सी., लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स एण्ड पॉलिटिकल साइंस से तथा न्यू पब्लिक मैनेजमेन्ट में डिप्लोमा इण्टरनेशनल एकेडमी फॉर लीडरशीप, जर्मनी से किया है। उन्हें इण्टरनेशनल पॉलिसी नेटवर्क, लंदन द्वारा पत्रकारिता में स्वतंत्रता को प्रोत्साहन देने हेतु प्रथम फ्रेडरिक बास्तिया पुरस्कार प्रदान किया गया है। उनके व्याख्यान देश विदेश के संस्थानों यथा आई.आई.एम. कोलकाता, आई.आई.एमलखनऊ, सिम्बायोसिस, जेवियर इन्स्टीट्यूट आदि में हो चुके हैं।

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