झारखंड अगला करिश्माई राज्य बनने वाला है

माओवादी हिंसा से जुड़ी खबरों को लेकर बहुत चिंतित ना हों। झारखंड सरकार और वहां के लोग आगे बढ़ने को तत्पर हैं और पूरी संभावना है कि राज्य 10 फीसदी की विकास दर हासिल कर ले।

पिछले कुछ महीनों के दौरान मैंने अपना काफी समय झारखंड में बिताया है। इस दौरान मैं वहां नए साल के जश्न में भी शरीक हुआ। झारखंड का मतलब रांची, धनबाद, बोकारो या जमशेदपुर ही नहीं है। मैंने सड़क और रेल मार्ग के जरिए खूंटी, गुमला, लोहरदग्गा, लातेहर, पलामू, पश्चिमी सिंहभूम, देवघर, दुमका और पाकुर की यात्रा की। जो लोग झारखंड से भली-भांति परिचित नहीं है उनके लिए इनमें से कुछ नाम अनजाने लग सकते हैं। ये झारखंड के 24 जिलों में से कुछ के नाम हैं। यहां के 18 जिले वामपंथी उग्रवाद या माओवाद के गढ़ के तौर पर देखे जाते हैं।

नए साल का उत्सव मैंने नेतरहाट और बेतला में घूमकर मनाया। बेतला में हम हाथी पर सवार होकर निर्जन इलाकों में इस उम्मीद के साथ निकले कि यहां बचे हुए एक मात्र बाघ के दर्शन हो जाए। उसे पहले एक बाघिन माना जा रहा था - "रानी"। हालांकि उसकी लीद के परीक्षण (डंग एनालिसिस) से बाद में पता चला कि वो एक बाघ था। जानकार महावत ने कहा था कि किसी नेशनल पार्क में आपको बाघ देखने के लिए एक हाथी (हमारे हाथी का नाम जूही था) की सवारी करनी होगी। आपको जंगल में कई घंटों तक धीरज के साथ भटकने के लिए तैयार रहना होगा और बाघ के अपनी मांद में लौटने का इंतजार करना होगा। हमने बाघ की मांद देखी और वो पत्थर भी देखा, जहां बाघ धूप सेंका करता है, इसके बाद हम लौट आए।

मैं हुण्ड्रू और हिरणी जलप्रपात भी देखने गया। मैंने राजरप्पा और बैद्यनाथ मंदिर (देवघर) के भी दर्शन किये। मौसम के लिहाज से ये हालांकि सर्वश्रेष्ठ समय नहीं था। नदियां अपेक्षाकृत सूखी हुई थीं। मैंने दामोदर, मयूराक्षी, कोएल और कारो नदियों का पानी हाथ में लेकर देखा। मैंने अलग-अलग खदानें देखीं और उन लोगों से भी मिला जो विस्थापित कर दिए गए हैं।

ज्यादातर लोग, आम तौर पर वो जिनका झारखंड से कोई वास्ता नहीं रहा है, उन्हें लगा कि मेरा सिर फिर गया है। उनमें से कईयों ने कहा, ‘‘झारखंड? वो सुरक्षित नहीं है। इसके अलावा कहीं और घूमने जाना चाहिए। वहां तो माओवादियों ने उत्पात मचा रखा है। क्या आपने अपना बीमा करवा रखा है?’’ वामपंथी अतिवाद एक भ्रामक शब्द है। इस शब्द के नाम पर कुछ लोग विचारधारा की बात करते हैं तो कुछ लोग विचारधारा से हटकर कुछ और करने में लगे हुए हैं। कुछ छिटपुट गुट हैं। कुछ पार्टी कैडर हैं और उनमें राज्य विरोधी भावनाएं व्यापक तौर पर भरी हुई हैं। माओ त्से तुंग की शब्दावली में कहें तो यहां मछलियां हैं और उनके जिंदा रहने के लिए पानी भी है।

इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि राज्य विरोधी भावनाओं के पीछे वाजिब कारण हैं। राज्य ने अपनी भूमिका का निर्वहन नहीं किया है। पंचायती राज कानून और वन अधिकार कानून अभी तक लागू नहीं किए गए हैं। वन अधिकारी और एक्साइज इंस्पेक्टर्स आदिवासियों का इस बहाने उत्पीड़न करते हैं कि देसी दारू व्यावसायिक तौर पर बेची जा रही है। बिना पुनर्वास के ही यहां लोगों को विस्थापित किया जा रहा है।

लेकिन आम धारणा के विपरीत इन विस्थापनों का हाल के दिनों में बिजली, इस्पात और कोयला उद्योगों में हुए निजी क्षेत्र के निवेश से कोई लेना देना नहीं है। इसका ताल्लुक काफी पहले के सरकारी निवेश से है और कोल इंडिया इसका मुख्य गुनहगार है। खनन के बाद जिन खदानों को पूरी तरह भरा जाना चाहिए था, उन्हें यहां यूं ही खुला छोड़ दिया गया है। राहत और पुनर्वास का कोई रिकार्ड उपलब्ध नहीं है।

वहां न तो कोई कानून दिखता है और न ही किसी के खिलाफ कार्रवाई की परंपरा। अगर खदान चालू अवस्था में होते हैं, तो मुआवजा केवल उन्हीं लोगों को मिलता है, जो परियोजना स्थल के दायरे में आते हैं। लेकिन खनन क्षेत्र के 10 किलोमीटर के दायरे से बाहर आपको सिर्फ मिलती है राख और कृषि का नुकसान। झारखंड में एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में जमीन संबंधी कानून अलग-अलग हैं। जब तक राज्य सरकार खुद जमीन का अधिग्रहण और उसका हस्तांतरण नहीं करती, आदिवासी इलाकों में जमीन अधिग्रहण पर प्रतिबंध है। हालांकि इन कानूनों के अनुपालन से कहीं ज्यादा इसका बेजा इस्तेमाल हो रहा है।

देश के इस हिस्से में ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ विद्रोह का पुराना इतिहास रहा है, और ये विद्रोह ज्यादातर जमीन संबंधी मुद्दे को लेकर हुए हैं। अगर वामपंथी विचारधारा को जमीन संबंधी मुद्दों में सामंतवाद के संदर्भ में पारिभाषित किया जाए, तो ये विचारधारा झारखंड में पूरी तरह अनुपयुक्त है। यहां जमीन के मामले में कोई सामंतवाद नहीं है। हां एक दमनकारी राज्य के खिलाफ नाराजगी है और विदेशी ब्रिटिश शासन के भूमि संबंधी मुद्दों पर नाराजगी किसी न किसी रूप में अभी जारी है। राज्य विकास के मामले में अपनी भूमिका सही ढंग से नहीं निभा सका है। यह कानून व्यवस्था बनाने में भी नाकाम रहा है।

मुझे बताई गई एक घटना इस बात को पुष्ट करती है। एक गांव में दो भाइयों के बीच जमीन को लेकर झगड़ा हुआ और बड़े भाई ने इसकी शिकायत स्थानीय माओवादी नेता से कर दी। आधी रात को माओवादी कार्यकर्ता आ धमके और गांव वालों से पूछा कि उनके बीच सबसे ज्यादा पढ़ा लिखा व्यक्ति कौन है। एक स्कूल शिक्षक का नाम सामने आया और उसे जबरदस्ती बाहर निकाला गया, वो डर के मारे कांप रहा था। ‘‘तुम सबसे ज्यादा शिक्षित हो। तुम ही विवादों के निपटारे के लिए सबसे योग्य हो। और एक बार तुम जो फैसला दे दोगे, उसे हर किसी को मानना पड़ेगा।’’ माओवादियों के विवाद निपटारे का ये तरीका बेकार है, इसमें अपील की कोई गुंजाइश नहीं होती। ये काफी स्वेच्छाचारी है। हालांकि इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि इसने सरकारी तंत्र के शून्य को भरने का काम किया है।

विकास क्या है? इसका मकसद लोगों के लिए स्वास्थ्य और शिक्षा सुनिश्चित करना है। इसका मकसद लोगों तक साधन और सुविधाएं पहुंचाना है। वामपंथी अतिवादी संगठन इस बात की कोई गारंटी नहीं देते। ज्यादा से ज्यादा वो उन अधिकारों को दिलवाने की बात करते हैं जो आम लोगों को मिलने चाहिएं। माओवादी विचारों से सहानुभूति रखने वाले लोग भी यही कहते हैं कि कोई भी विकास के विरोध में नहीं है। लेकिन विकास के मायनों को लेकर मतभेद और नाराजगी जरूर है।

झारखंड में चार ऐसी बातें हुई हैं, जिसके आधार पर आप बदलाव महसूस कर सकते हैं। पहला, लंबे समय के बाद पंचायत चुनाव हुए, जिससे ये उम्मीद जगी है कि सरकार मे जनता की भागीदारी बढ़ेगी। कई स्रोतों से मिली जानकारी के मुताबिक कुछ वामपंथी अतिवादी संगठन भी चुनावों में शामिल हुए हैं। दूसरा, बिहार में हासिल की गई विकास दर ने लोगों को एक प्रेरणा दी है। अगर बिहार ऐसा कर सकता है तो झारखंड क्यों नहीं? तीसरा, पुलिस को आधुनिक हथियारों से लैस किया गया और माओवादी सीधे हमलों की बजाय लैंड माइन हमलों की रणनीति के लिए बाध्य हुए। चौथा, विचारधारा से इतर, माओवादी संगठनों को जबरन वसूली करने वाले संगठन के तौर पर जाना जाता है।

ठेकेदारों से 15 फीसदी तक जबरन वसूली हो रही है और इसे लेकर कोई हाय-तौबा नहीं मचाई जा रही है। ठेकेदार इसे अपनी लागत में शामिल कर लेते हैं। समस्या तब खड़ी होती है जब एक ही क्षेत्र में एक से ज्यादा वामपंथी अतिवादी संगठन उग आते हैं। अब लोग किसे पैसा दें? अलग होकर नया बना समूह लोगों के बीच वसूली के लिए कैसे अपनी धाक जमाता है? ये संगठन लोगों का अपहरण करता है, उनकी हत्या करता है और खुलकर इसका श्रेय लेता है, ताकि इलाके में उसकी दहशत बन जाए।

इतना कुछ होने के बावजूद हिंसा और उससे जुड़ी वारदात कम हुई है। आपकी सुरक्षा में सशस्त्र बल हमेशा मौजूद रहता है। आपको शाम के 6 बजे से सुबह के 5 बजे तक बाहर निकलने की सलाह नहीं दी जाती। लेकिन इनका संबंध वास्तविक खतरे से कम और सुरक्षात्मक एहतियात से ज्यादा है। 

पलामू का डाल्टनगंज (अब मेदिनीनगर) लातेहर के अशांत क्षेत्र से बहुत ज्यादा दूर नहीं है। मुझे लगा था कि शाम के बाद वहां सड़कों पर लोग नजर नहीं आएंगे। लेकिन ऐसा नहीं था, वहां जनजीवन बिलकुल सामान्य नजर आया। लातेहर में मैंने जब अत्यधिक अशांत माणिक ब्लॉक जाने की इच्छा जाहिर की तो मुझे किसी तरह के प्रतिरोध का सामना नहीं करना पड़ा। नेतरहाट के करीब घागरी जलप्रपात काफी सुंदर है। मैं घागरी के ऊपरी इलाके तक गया, लेकिन घागरी के निचले तट तक नहीं जा सका, क्योंकि वो अब भी असुरक्षित माना जाता है। चूंकि झारखंड बदल रहा, मुझे अनुमान है कि वो समय जल्द ही आने वाला है जब घागरी के निचले इलाके तक जाने से भी नहीं रोका जाएगा।

मैं बिना किसी झिझक के ये कह सकता हूं कि बिहार के बाद अब पूर्वी भारत में झारखंड में तेज विकास दिखाई पड़ने वाला है। झारखंड की जीएसडीपी (सकल राज्य घरेलू उत्पाद) की विकास दर 10 फीसदी से कहीं ज्यादा होगी। मैंने इस बात पर बाजी लगाने का भी प्रस्ताव रखा है, लेकिन तमाम संशयों के बावजूद कोई मुझसे बाजी लगाने के लिए अब तक सामने नहीं आया। मेरे खयाल से यह मेरे दृष्टिकोण को सही ठहराने के लिए काफी है।

- बिबेक देबरॉय

बिबेक देबरॉय

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