स्वस्थ समाज के लिए नैतिक आधार जरूरी - पामर

डा.टॉम जी पॉमर पूंजीवादी दर्शन और नैतिकता के मुखर प्रवक्ता के रूप में जाने जाते हैं। वे जितने अच्छे लेखक है उतने ही प्रभावशाली वक्ता भी। उनकी पुस्तक –रियलाइजिंग फ्रीडम : लिबरेशन थ्योरी,हिस्ट्री एंड प्रैक्टिस – उनके  स्वतंत्रता संबंधी विचारों का सशक्त प्रतिपादन है।पामर आक्सफोर्ड विश्वविद्यालय से राजनीति शासत्र में डाक्टरेट की है  और वाशिंगटन स्थित कैटो इंस्टीटयूट में सीनियर फैलो हैं। इसके अलावा वे एटलस नेटवर्क के अंतर्राष्ट्रीय प्रोग्राम के कार्यकारी उपाध्यक्ष है। हाल ही में वे अपनी नई पुस्तक -मारलिटी आफ कैपिटलिज्म – (पूंजीवाद की नैतिकता ) के प्रचार के सिलसिले में भारत और पाकिस्तान का यात्रा पर आए थे। इस दौरान उनके साथ हुई बातचीत के कुछ अंश यहां पिरस्तुत हैं -

हाल ही में पूंजीवाद की काफी आलोचना हुई है ऐसे में आपकी पुस्तक की पाठकों के लिए क्या प्रासंगिकता है?

मुझे लगता है कि समय –समय पर बुनियादी मुद्दों की तरफ लौटना चाहिए। अच्छे समाज के लिए मजबूत नैतिक आधार जरूरी है। इस पुस्तक के लेखक चीन,भारत ,रूस,लैटिन अमेरिका ,और यूरोप के हैं उन्होंने बुनियादी नैतिक मुद्दों की चर्चा की है। मैंने पाया कि दुनियाभर में युवाओं ने हमारी आर्थिक व्यवस्था के नैतिक पुनर्नवीनीकरण की अपील  में दिलचस्पी दिखाई। पुस्तक पहले ही  कई भाषाओं में आ चुकी है। और उसकी वैशिवक दृष्टि लोगों को प्रभावित कर रही है।

अपनी पुस्तकों और अपने भाषणों मे आप मुक्त बाजार के पूंजीवाद और याराना पूंजीवाद के बीच फर्क करने की अपील करते हैं। दोनों में क्या फर्क हैं?

याराना पूंजीवाद के साथ राजनीतिक सत्ता और हस्तक्षेप आते हैं। जब राजनीतिक वर्ग के पास देने और संपदा को पुरर्वितरित करने की क्षमता होती है तो  तब उनका मित्र होने का लाभ मिलता है और तब संपदा हासिल करने के लिए आर्थिक के बजाय राजनीतिक साधनों में निवेश किया जाता है । मुक्त बाजार कानून के शासन और और समान अधिकार पर निर्भर करता है तो याराना पूंजीवाद कानूनी असमानताओं पर । हस्तक्षेपवाद में याराना पूंजीवाद से बचा नहीं जा सकता। लेकिन मुक्त बाजार की तरफ बढ़कर उसे खत्म जरूर किया जा सकता है। जब आप नौकरशाहों के लोगों को व्यापार करने की अनुमति देने के अधिकार को खत्म कर देते हैं  या आप उनकी ऱिश्वत मांगने शक्ति को खत्म कर देते हैं । और तब आप व्यापार के लिए उत्पादकता के बजाय सत्ता में निवेश के लिए मिलनेवाले प्रोत्साहन को खत्म कर देते हैं।

आपकी पुस्तक का शीर्षक है –पूंजीवाद की नैतिकता – लेकिन ज्यादातर लोग इसे इस आर्थिक व्यवस्था को सकल घरेलू उत्पाद और और कार्यक्षमता के साथ जोड़ते हैं।

आपके पास जो है उसे मैं पाना चाहता हूं तो उसे पाने के कम से कम तीन रास्ते हैं। मैं आप पर हावी हो जाऊं और और उसे ले लूं।या मैं किसी और से कहूं कि आप पर हावी हो जाए और उसे ले ले  और बाद में मुझे दे दे या मैं आपको कुछ ऐसी चीज दूं जिसका आपके लिए ज्यादा मूल्य है। पहली लूट है। दूसरा हस्तक्षेपवादी याराना पूंजीवाद है। तीसरा मुक्त विनिमय है। पूंजीवाद का आधार यह है कि हर व्यक्ति के  अपने जीवन,स्वतंत्रताओं और चीजों का आनंद लेने के अधिकार को मान्य किया जाए। इसमें बाजार पर सेवाएं देने का अधिकार भी शामिल है। इसके अलावा पूंजीवाद हमें ज्यादा सम्मानपूर्ण और नैतिक प्राणी बनाता है। जानेमाने अर्थशस्त्री जगदीश भगवती ने इस पुस्तक में लिखे अपने लिखे लेख में दलील दी है मुक्त बाजार न केवल नैतिक नतीजों की तरफ ले जाता है वरन इसमें भाग लेनेवालों को बेहतर नैतिक चरित्र की ओर  ले जाता है।

वर्ष 1991 के बाद के उदारवाद ने मध्यम वर्ग को बढ़ाने में मदद की  लेकिन उस बहुसंख्या का क्या जो गरीबी के दलदल में फंसी हुई है?

आर्थिक विकास में नाटकीय वृद्धि  लाखों भारतीयों को गरीबी से मध्यम वर्ग की समृद्धि में ले गई इससे भारत की गरीबी की दर में कमी आई। उन्हें उदारवाद का लाभ मिला। दूसरी तरफ बड़ी संख्या में कृषि पर निर्भर भारतीयों को इसका लाभ नहीं मिल पाया क्योंकि कृषि का क्षेत्र सुधारों से अछूता है। वितरण क्षेत्र में छोटे क्रोनीज की भरमार है जो उदारवाद को रोकते हैं जो किसानों और उपभोक्ताओं के बीच बाधा बनकर खड़े हो जाते हैं और दोनों को नुक्सान पहुंचाते हैं। लेकिन किसानों को गंभीर रूप से नुक्सान  पहुंचाते हैं। शहरी क्षेत्रों में  उदारवाद के अभाव के कारण अवैध और अनौपचारिक क्षेत्र बरकरार है इसकारण रेहडीवाले आदि हाशिये के व्यवसायी कानून का शासन न होने के कारण परेशानी झेलते हैं। वे पुलिस और नौकरशाहों के छापे ,ज्यादा निवेश करने और दीर्घकालिक योजना बनाने  में अक्षमता, आदि उनकी जिंदगी को बेहतर बनाने में अन्य बाधाओं का शिकार बनते हैं। उदारवाद को उन तक पहुंचना चाहिए ताकि वे कानून और मार्केट पूंजीवाद का लाभ उठा सकें।

आप जानते हैं कि भारत में भ्रष्टाचार पर काफी बहस हो रही है। मुक्त व्यापार के पूंजीवाद का भ्रष्टाचार पर क्या असर होगा?

विश्व में आर्थिक स्वतंत्रता के बारे में किए गए  अध्ययन के आंकड़ो जिन्हें  सेंटर फार सिविल सोसाइटी द्वारा प्रकाशित किया गया है ,से स्पष्ट है  कि जहां आर्थिक स्वतंत्रता ज्यादा होती है वहां भ्रष्टाचार कम होता है। यह पता चलता है कि श्रेष्ठ भ्रष्टाचार विरोधी अङियान केवल बयानबाजी या कठोर दंड़ों पर आधरित नहीं होते वरन खरीदने और बेचने के आर्थिक एजंटों को मिलनेवाले प्रोत्साहन को कम करने और ऐसे फेवर करने के  अधिकार को खत्म करने पर निर्भर करते हैं।

समाजवादी कहते है कि पूंजीवाद स्वार्थीपने को प्रोत्साहन देता है। क्या उनकी बात सही है?

जैसा कि कड़वा अनुभव हमें बताता है समाजवाद में भी स्वार्धीपन काफी होता है।अपने स्वहितों को स्वार्थीपन ,अपने हितों को  हितो  के दुरुपयोग और दूसरों के अधिकारों  साथ जोड़ना गलत होगा। पूंजीवाद लोगों को  शातिपूर्वक अपने हितों को साधने की इजाजत देता है। इसमें अपनी मदद करने के अलावा दूसरों, अपने परिवारवालों ,अपने पड़ोसियों और अपने समुदायों और उससे परे के लोग भी शामिल हैं। ज्यादातर दानधर्म समाजवादी देशों द्वारा नहीं वरन उन देशों द्वारा किया जाता है जहां मुक्त व्यापार के कारण पैदा  हुई समृद्धि है।

क्या पूंजीवाद के भारतीय  चीनी या और अमेरिकी रूप हैं या पूंजीवाद संस्कृति को एकरूप बना देता है। हमें एक दूसरे की कार्भन कापी बना देता है।?

अध्ययन बताते हैं कि व्यापारिक व्यवहार में सांस्कृतिक भिन्नताएं नजर आती हैं।चीनी कंपनियां,जापानी कंपनियां ,कोरियाई कंपनियां और भारतीय कंपनियां उसीतरह से अलग है और अपनी सांस्कृतिक पृष्ठभूमि को अभिव्यक्त करती हैं जिस तरह इटालियन,ज्रमन और अमेरिकी कंपनियां। लेकिन एक बात जो उनमें समान है जब वे मुक्त बाजार पूंजीवाद के जरिये शासित होता हैं तो  तो उनका जोर ग्राहकों को ज्यादा मूल्य देने और संतुष्ट करने पर होता है।जब कानून के शासन द्वारा नियंत्रित किया जाए तब उन्हें दूसरों के अधिकारों का सम्मान करने की मांग की जाती है।

विश्व वित्तीय संकट ने पूंजीवाद की चमक को फीका कर दिया है। क्या उसे फिर से लौटाया जा सकता है।

हम हस्तक्षेपवाद के संकट से गुजर रहे हैं। हमें सरकार द्वारा पैदा किया गया हाऊसिंग बबल और वित्तीय संकट मिला है। और उसका नतीजा है बेल आउट ।यह हस्क्षेपवाद और याराना पूंजीवाद है। एक अच्छा डाक्टर इलाज बताने से पहले रोग का निदान करता है।संकट के कारण हस्तक्षेपवाद में निहित हैं। इलाज है पूंजीवाद।मुझे उम्मीद है कि यह पुस्तक ज्यादा से ज्यादा लोगों को आर्थिक मुद्दों के प्रति आलोचनात्मक रूख अपने और उन्हें नैतिकता,संस्थाओं और अभिक्रमों के प्रकाश में सोचने को प्रोत्साहित करेगी।

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