पूंजीवाद का धर्म

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टाम पामर ने कई लेखों की एक अनूठी श्रृंखला तैयार की है जिसमें पूंजीवाद के नैतिक आयाम के बारे में श्रेष्ठ चिंतन को संकलित किया गया है। मुझे इस बात की खुशी है कि इस प्रस्तावना के जरिये मुझे इस बहस में योगदान करने के लिए आमंत्रित किया गया।

हालांकि 1991 के सुधारों के बाद दो दशक गुजर चुके हैं जब भारत ने खुले बाजार अपनाया था। लेकिन अब भी पूंजीवाद भारत में  अपने लिए जगह बनाने की कोशिश कर रहा है। ज्यादातर लोगों की तरह भारतीय भी मानते हैं कि बाजार कुशल तो होता है लेकिन नैतिक नहीं।लेकिन मेरा मानना बिल्कुल उल्टा है कि लोग अनैतिक हो सकते हैं और खराब व्यवहार करते हैं चाहे समाज पूंजीवादी हो या समाजवादी,व्यवस्था लोकतांत्रिक हो या अधिनायकवादी।लेकिन बाजार की संस्था अपने आप में बहुत नैतिक है और उसके नैतिक चरित्र के बारे में मेरी समझ धर्म के प्रति भारतीय शास्त्रीय दृष्टि से पैदा हुई है। बाजार व्यवस्था का केंद्रबिंदु है सामान्य ,अपने हितों को लेकर जागरूक लोग जो बाजार में शांतिपूर्ण तरीके से अपने हितों को बढ़ाना चाहते हैं।बाजार में अजनबी भी एक दूसरे पर विश्वास कर लेते हैं तो आंशिक तौर पर उसका कारण धर्म है जो एक अदृश्य गोंद है जो अंतर्निहित  सामूहिक नियमों पर आधारित है और जब लोग सहयोग और लेनदेन करते हैं तो वह लोगों में सुरक्षा का भाव भरता है।

यह विचार काफी अजीब लग सकता है कि प्राचीन भारतीय चिंतन पूंजीवाद की प्रकृति के बारे में अंतर्दृष्टि दे सकता है।जब मैं कालेज में पढ़ता था तब मैं पश्चिमी विचारों के संपर्क में आया ।मैंने बिना सोचेसमझे ही यह मान लिया कि –पूंजीवाद पश्चिम से आया है। मैंने एडम स्मिथ,मार्क्स,जान लोके और अन्य को पढ़ा जिन्होंने मेरा उदारवादी विचार परंपरा से परिचय कराया।लेकिन बाद की जिंदगी में मुझे अपनी गलती का अहसास हुआ जब मैंने दो हजार वर्ष पुराना संस्कृत महाकाव्य महाभारत पढ़ा। यह महाकाव्य धर्म का संकल्पना से अभिभूत है और जैसे –जैसे मैंने उसे समझने की कोशिश की मैंने यह महसूस किया कि स्वतंत्रता और बाजार पूंजीवाद के विचारों की जड़ें गैर पश्चिमी भी हो सकती हैं।और उदारवादी विचार परंपरा सार्वजनीन हो सकती है।

धर्म  शब्द का अनुवाद करना सरल नहीं है।कर्तव्य ,अच्छाई,न्याय,नियम और रीति रिवाज से इसका कुछ ताल्लुक है।लेकिन यह मुख्यरूप से सार्वजनिक और निजी जीवन में सही काम करने से जुड़ा हुआ है। यह संस्कृत के ध मूल से बना है जिसका अर्थ है नींव की तरह धारण करना,टिकाए ऱखना। यह वह नैतिक नियम है जो व्यक्ति, समाज और ब्रम्हाण्ड को टिकाए रखता है। अपने धारणा करने के मूल से धर्म का एक और अर्थ व्यक्त होता है वह है  संतुलन – हर व्यक्ति के अंदर का संतुलन ही  ब्रम्हाण्ड के संतुलन और व्यवस्था में व्यक्त होता है।जब व्यक्ति धर्म के अनुसार व्यवहार करता है तो समाज में संतुलन,व्यवस्था और विश्वास पैदा होता है।धर्म सामान्य रूप से सार्वजनिक नीति और विशेषरूप से बाजार के गतिशास्त्र को समझने के लिए खासतौर पर अनुकूल है क्योंकि वह नैतिक पूर्णता को पाने की कोशिश नहीं करता।वह मनुष्य के प्रति व्यावहारिक दृष्टिकोण पर आधारित है –उसकी नजर में मनुष्य सामाजिक लेकिन अपूर्ण प्राणी है जिसकी इच्छाएं और भावनाएं बहुत सशक्त होती हैं जिन्हें नियंत्रित करने की आवश्यकता है। उदाहरणार्थ, राजा का धर्म है कि समाज की उत्पादक शक्तियों का पालन पोषण  करे। -हे भारत के नरेश,वैश्यों,व्यापारियों और सामान्यजनों के साथ ऐसा व्यवहार करो जिससे उत्पादक शक्तियां बढ़े।वैश्य राज्य की शक्ति को बढ़ाते हैं,उसकी  कृषि को बेहतर बनाते हैं और व्यापार का विकास करते हैं।एक बुद्धिमान राजा उनपर कम कर लगाता है।(महाभारत- 12 अध्याय82) यह एक व्यावहरिक सलाह है आगे यह महाकाव्य कहता है यदि ऐसा नहीं किया तो वे पडोस के राज्य में चले जाएंगे।

इस तरह से धर्म समाज को बांधनेवाले नियम उपलब्ध कराता है जिन्हें लोग सामूहिक तौरपर मानते हैं और जो उन्हें सहयोग  की अनुमति देता है।यह शासकों की जिम्मेदारियां और कर्तव्य तय करता है। बाजार में यह विक्रेताओं और खरीददारों को नियंत्रित करता है क्योंकि हम समान धर्म को मानते हैं इसलिए मैं आपका चेक स्वीकार करने को तैयार हो जाता हूं। एक रिक्शावाला मुझे ले जाने को तैयार हो जाता है क्योंकि वह जानता है कि धर्म का नियंत्रण यह सुनिश्चित करता है मैं यात्रा के अंत में भुगतान कर दूंगा। मैं अपने फलवाली की इस बात पर यकीन कर लेता हूं कि उसके फल उनकी बेहतर गुणवत्ता के कारण इस हफ्ते महंगे हो गए हैं। यदि आम खराब हुए तो मैं उसपर आरोप लगाऊंगा कि वह अपने धर्म का पालन नहीं कर रही है और मैं उसके प्रतियोगी से खरीदारी कर उसे दंडित करूंगा। उससे न केवल वह खरीदार ही खोएगी वरन जब यह बात लोगों तक फैलेगी तो उसे कम धार्मिक माना जाएगा।सप्लायर भी उसपर विश्वास नहीं करेंगे। उसे अचछे कर्मचारी भी नहीं मिलेंगे।दूसरी तरफ धर्म का पालन करनेवाले व्यक्ति को अच्छी प्रतिष्ठा के द्वारा पुरस्कृत किया जाएगा। उसके सप्लायर,खरीददार और कर्मचारी सभी उससे संतुष्ट होंगे।आखिर में बाजार कानून पर नहीं स्वनियंत्रण पर निर्भर करता है।धर्म की भावना लोगों के एक बड़े बहुमत का नियमन करती है जो ज्यादातर समाजों में आपसी आदर से कार्य करना चाहते हैं।हालांकि हर समाज में ऐसे धोखेबाज लोग होते हैं जो अपने को धर्म से बंधा हुआ महसूस नहीं करते और इसलिए कानून और सख्त कार्रावाई जरूरत होती है।राजा का धर्म यह है कि (जैसा भीष्म ने युधिष्ठिर को बताया)धर्म का कम पालन करनेवालों को दंडित करने के लिए कानून बनाए और शासन का डंडा ऱखे।

मुक्त बाजार को अपनाकर भारत आर्थिक रूप से प्रगति कर रहा है यह बहुत आश्चर्य़जनक बात नहीं है।हमारे देश में बाजारों का लंबा इतिहास रहा है। प्राचीनकाल से ही व्यापारी समाज के सम्मानीय सदस्य रहे हैं।सामाजिक श्रेणीक्रम में वह ऊंची जातियों  द्विज  माने गए हैं। चीन के विपरित भारत हमेशा कमजोर राज्य लेकिन सशक्त समाज रहा है। जबकि चीन में परंपरागत तौरपर सशक्त राज्य और कमजोर समाज रहा है। इसलिए भारत का इतिहास युद्ध करनेवाले राजाओं का तो चीन का इतिहास साम्राज्यों का रहा है।धर्म ने भी राजाओं के अधिकारों को नियंत्रित किया था ।चीन में सम्राट कानून के निर्माता के साथ उसकी व्याख्या करनेवाला भी था लेकिन उसके विपरित भारत  में धर्म राजा से ज्यादा महत्वपूर्ण था और राजा से उम्मीद की जाती थी कि वह धर्म का पालन करेगा। धर्म के व्याख्याकार राजा नही वरन ब्राम्हणहोते थे।इस तरह प्राचीन भारत में राज्य सत्ता पर एक अंकुश रखा गया था।

इसतरह 1950 से 1990 तक का समाजवादी राज्य भारतीय इतिहास में एक अपवाद था। जब भारत ने राज्य के माध्यम से सार्वजनिक क्षेत्र को सर्वोच्च प्राथमिकता देकर औद्योगिकीकरण किया ।जिसने विश्व के सबसे बुरे नियंत्रणों  जिन्हें लाइसेंस राज कहा जाता है के जरिये निजी क्षेत्र का गला घोटा। आश्चर्य़ नहीं कि वह असफल हो गया। भारतीय राज्य में सर्वोच्च अर्थव्यवस्था के प्रबंधन की क्षमता नहीं है न ही राज्य की केंद्रीकृत नौकरशाही देश के विकेंद्रीत ऐतिहासिक स्वभाव के अनुरूप है। दीवालियेपन के खतरे को देखते हुए 1991 में भारत ने सुधारों की श्रृंखला के जरिये भारत ने अपनी नीतियों को एकदम पलट दिया ।इसके तहत समाजवाद व्यवस्था की संस्थाओं को खत्म किया गया उनके स्थानपर बाजारोन्मुख संस्थाओं को लाया गया। बीस वर्ष के पूंजीवादी विकास ने भारत को विश्व की दूसरी सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था बना  दिया। अपने इतिहास और स्वभाव के अनुरूप भारत आज राज्य की मदद के बगैर नीचे से ऊपर उठ रहा है जबकि चीन की सफलता की कहानी विशाल और टेक्नोक्रेटीक राज्य द्वारा लिखी गई है जिसने असाधारण बुनियादी ढांचा खड़ा किया।

आर्थिक गतिविधियों का एक उद्देश्य होता है और प्राचीन भारतीय उसके बारे में बहुत सजग था इसलिए आर्थिक खुशहाली को जीवन का एक पुरूषार्थ या उद्देश्य  माना गया था। वे मानते थे कि धनार्जन तबतक उचित है जबतक वह अच्छे जीवन की तऱफ ले जाता है। अच्छे जीवन के लिए कई और भी पुरूषार्थ हैं विशेषकर धर्म यानी नैतिक संतोष–।महाभारत हमें याद दिलाता है कि अर्थ का पुरूषार्थ धर्म के आधीन है। इसका अर्थ है कि समृद्धि को पाने के सही और गलत रास्ते हैं।यदि आज की भाषा में कहा जाए तो अर्थिक गतिविधियो का मकसद दुनिया को बेहतर बनाना है।गरीबों को गरीबी से निकालना है। इस तरह पूंजीवाद का नैतिक उद्देश्य समाज को गरीबी से समृद्धि की तरफ ले जाना है।समस्या तब शुरू होती है जब गरीबी पर विजय पा ली जाती है और समाज समृद्ध और मथ्यमवर्गीय बन जाता है।एक सीमा के बाद बढ़ी हुई समृद्धि लोगों को खुशी नहीं  देती और वे अन्य उद्देश्यो या पुरूषार्थों की तरफ बढ़ने लगते हैं। वक्त के साथ पूंजीवाद की सफलता कमजोर करनेवाले प्रभाव डालती है जब बचत करनेवाली पीढ़ी की जगह खर्च करनेवाली पीढ़ी लेती है। भारत और चीन अगली पीढ़ी में  इसी समस्या का सामना करेंगे।प्रखर प्रतियोगिता मुक्त बाजार की दूसरी विशेषता है और वह संक्षारक हो सकती है।लेकिन प्रतियोगिता आर्थिक उत्प्रेरक भी है जो मानवीय कल्याण को बढ़ावा देती है।

अधिक की इच्छा करना मनुष्य का स्वभाव है। और धर्म इच्छाओं को एक सुव्यवस्थित अस्तित्व के अंतर्गत नियंत्रित करके उनमें  एक सुसंगति कायम करता है। चूंकि चाहे जितने कानून हो वे सभी अपराधियों को नहीं पकड़ सकते  इसलिए समाज के अंदर व्यवस्था  को स्थापित करने के लिए बाजार के खिलाडियों को आत्मसंयम रखने की जरूरत है।नीति निर्माताओं को अनियंत्रित मुक्त बाजार और केंद्रीकृत नियोजन में से किसी को नहीं चुनना है वरन नियमनों सही मिश्रण तैयार करना है।यदि कम्युनिस्टों को छोड़ दिया जाए तो भारत में  शायद ही कोई उत्पादन पर सरकारी स्वामित्व चाहता है। सरकारी स्वामित्व में तो प्रतियोगिता का अभाव चरित्र को और गिरा देता है।धर्म की दृष्टि नैतिक पूर्णता पाने की नहीं है वह तो अपरिहार्य रूप से धर्मराज्य और या अधिनायकवाद की ओर ले जाती है।धर्म तो सामान्य सुसंगत विश्व पाना चाहता है जो हमारी रोजमर्रा जिंदगी के करीब हो और बाजार में विनिमय के लिए अनुकूल हो। स्वनियंत्रण धर्म के कई अर्थों में से एक अर्थ है। स्वनियंत्रण समाज में विश्वास पैदा करने में मदद करता है मैं मानता हूं वही पूंजीवाद का धर्म है।

- गुरुचरण दास