बजट की रेवड़ियों से चुनाव नहीं जीते जाते

बीटल्स का एक गीत है, 'कैंट बाय मी लव' (अपने लिए मैं प्यार तो नहीं खरीद सकता)। इसी तर्ज पर इस साल के बजट की थीम है, 'अपनी पार्टी के लिए मैं चुनाव तो नहीं खरीद सकता'। वित्तमंत्री आम तौर पर चुनाव से ठीक पहले वाले बजटों में सब्सिडी और कर्ज माफी के रूप में खुले हाथों रेवड़ियां बांटते हैं। ऐसे उपाय वोट दिलाने में ज्यादा कारगर नहीं होते, फिर भी वित्तमंत्री अपनी तरफ से उम्मीद नहीं छोड़ते। बहरहाल, वित्तमंत्री पलनियप्पन चिदंबरम ने अभी जो चुनावी बजट पेश किया है, उसमें उन्होंने मुफ्त का चंदन घिसने से भरसक परहेज किया है। वित्तीय मितव्यय को ध्यान में रखते हुए उन्होंने वोट हासिल करने के लिए कोई शाहखर्ची नहीं दिखाई है। उनका लक्ष्य जीडीपी ग्रोथ की रफ्तार बढ़ाने, महंगाई पर काबू पाने का है और उन्हें लगता है कि इसके लिए मतदाता उन्हें 2014 में पुरस्कृत करेंगे। यह एक जोखिम भरा दांव है, हालांकि इसमें नजर आने वाला साहस प्रशंसनीय है।

पिछली बार के नुस्खे

चिदंबरम पांच साल पहले भी वित्तमंत्री थे। तब 2009 के आम चुनाव से 15 महीने पहले उन्होंने जो बजट पेश किया था, उसमें छोटे और मंझोले किसानों के लिए 60 हजार करोड़ रुपये की कर्ज माफी और ग्रामीण रोजगार योजना (नरेगा) को पूरे देश में फैलाने जैसे उपाय किए थे। राजनेताओं और मीडिया, दोनों ने ही तब इसे चुनाव खरीदने के शास्त्रीय उदाहरण की तरह देखा था, जो बाद में कामयाब भी साबित हुआ। लेकिन यह व्याख्या सही नहीं थी। यूपीए अपनी सीटों में जबर्दस्त बढ़ोतरी करने में सफल रहा, लेकिन इसमें गांवों के वोट थोक भाव में खरीद लिए जाने जैसी कोई बात नहीं थी। यूपीए ने दिल्ली, मुंबई, चेन्नई, कोलकाता, बेंगलुरू, हैदराबाद सभी बड़े शहरों की तकरीबन सारी सीटें जीत लीं, जबकि चार सबसे गरीब, ग्रामीण बहुल राज्यों, बिहार, ओडिशा, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में उसे कुल 72 में से सिर्फ नौ सीटें हासिल हुईं।

प्रो-इनकंबेंसी का दौर

ऐसा क्यों हुआ? इसलिए कि चुनाव नतीजे कर्ज माफी या नरेगा से नहीं बल्कि 8.5 फीसदी की जीडीपी ग्रोथ से संचालित हुए। इस रिकॉर्ड ग्रोथ ने खासकर शहरी इलाकों में लोगों की आमदनी बढ़ाई और उन्हें ज्यादा मौके मुहैया कराए। इससे पहले असंतुष्ट मतदाता तीन चौथाई मौजूदा सरकारों को चुनावों में उखाड़ फेंकते थे। लेकिन तेज जीडीपी ग्रोथ का दौर शुरू होने के बाद तीन चौथाई सरकारें दोबारा चुनी जाने लगीं। 1998-04 के बीजेपी युग में एंटी-इनकंबेंसी की लहर देखी जाती थी, क्योंकि इस दौर की औसत वृद्धि दर 5.7 फीसदी थी और गरीबी घटने की रफ्तार मात्र 0.75 प्रतिशत सालाना थी। इसके विपरीत यूपीए-1 के शासनकाल में ग्रोथ रेट 8.5 फीसदी की औसत दर से बढ़ी और गरीबी 1.5 प्रतिशत की वार्षिक गति से कम हुई। यह तथ्य आर्थिक वृद्धि और गरीबी उन्मूलन के बीच तनाव देखने वाली दृष्टि को खारिज करता है।

देश में एंटी - इनकंबेंसी की जगह प्रो - इनकंबेंसी की लहर चलने का फायदा 2009 में सिर्फ यूपीए को ही नहीं ,कई मुख्यमंत्रियों को भी मिला। पूनम गुप्ता और और अरविंद पानगढि़या की एक महत्वपूर्ण रिपोर्ट ( इंडिया :इलेक्शन आउटकम्स एंड इकनॉमिक परफॉर्मेंस ) ने यह दिखाया कि 2009 में मतदाता राष्ट्रीय आर्थिक प्रदर्शन सेज्यादा राज्य सरकारों के सुधरे हुए प्रदर्शन से प्रभावित थे। सीएसओ के आंकड़ों के मुताबिक 2000-2004 और2004-2009 में बिहार की औसत आर्थिक वृद्धि दर 4.5 से बढ़कर 12.4 प्रतिशत , ओडिशा की 4.8 से 10.2प्रतिशत और छत्तीसगढ़ की 6.1 से बढ़कर 9.7 प्रतिशत हो गई। ये सभी गैरकांग्रेसी राज्य थे और मतदाताओं नेतेज वृद्धि का श्रेय नीतीश कुमार , नवीन पटनायक और रमन सिंह को दिया , सोनिया गांधी को नहीं।

2004-05 से 2008-09 के बीच राज्यों की जीडीपी ग्रोथ का जायजा लेने के लिए इस अध्ययन में राज्यों को तीन श्रेणियों में बांटा गया -

(राष्ट्रीय वृद्धि की तुलना में) ऊंची, मध्यम और नीची वृद्धि दर वाले राज्य। ऊंची वृद्धिवाले राज्यों में वहां के सत्तारूढ़ दलों के 85 प्रतिशत उम्मीदवार दोबारा चुने गए। इसके विपरीत मध्यम वृद्धि दरवाले राज्यों में वापसी का प्रतिशत 50 और निम्न वृद्धि वालों में मात्र 30 था। चुनाव में गठबंधन , जाति , क्षेत्रीयस्वाभिमान और महंगाई जैसे कारकों ने भी काम किया , लेकिन धीमी वृद्धि दर वाले जिन भी राज्यों में ग्रोथ कीरफ्तार 7 प्रतिशत से ज्यादा हुई , वहां यही चीज जीत का निर्णायक तत्व साबित हुई। गुप्ता - पानगढि़या अध्ययनका निष्कर्ष यह था कि तेज आर्थिक वृद्धि से गरीबी घटी , काम धंधे बढ़े और इसका फायदा सिर्फ अमीरों को नहीं, बल्कि व्यापक जनता को भी मिला। 2009 में लगभग सभी कांग्रेसी एक सुर में कह रहे थे कि किसानों कीकर्जमाफी और नरेगा ने उन्हें यह चुनाव जिताया है। लेकिन उनका यह उद्गार किसी गहरे विश्लेषण से नहीं , गांधीपरिवार के प्रति उनकी स्वामिभक्ति से अनुप्राणित था। (इन दोनों उपायों को सोनिया का समर्थन प्राप्त था।)

सीधी बात , नो बकवास

बहरहाल , इस बार मामला अलग है। बजट पेश करने के बाद चिदंबरम से जब एक टीवी इंटरव्यू में पूछा गयाकि अगला चुनाव जीतने के लिए उन्होंने 2008 जैसे टोटके क्यों नहीं अपनाए , तो उनका जवाब था कि 2009 केचुनाव तेज आर्थिक वृद्धि और उसके चलते गरीबी में आई कमी के बल पर जीते गए थे , कर्ज माफी और नरेगा केबल पर नहीं। यह पहला मौका है जब किसी कांग्रेसी ने इस मामले में इतनी सीधी बात कही है। चिदंबरम ने आगेकहा कि 2008 से अब तक उनकी नीतियों में कोई बदलाव नहीं आया है। उन्हें नहीं लगता कि मुफ्त की रेवड़ियांबांटकर कोई चुनाव जीता जा सकता है। इसके बजाय इस संबंध में उनकी राय यह है कि तेज आर्थिक वृद्धि को अंजाम देकर अगले 15 महीनों में मतदाताओं को अपने पक्ष में किया जा सकता है। देखना सिर्फ यह है कि चिदंबरम की यह स्पष्टवादिता दोबारा उन्हें सत्ता में ला पाने के लिए पर्याप्त सिद्ध होती है या नहीं।

- स्वामीनाथन एस. अंकलेसरिया अय्यर
साभारः नवभारत टाइम्स

Category: