आरटीई: कानूनी झोल में उलझती शिक्षा

अगर सवाल उठाया जाय कि 'स्कूल' क्यों ? तो सीधा जवाब मिलेगा, शिक्षा प्रदान करने के लिए। लेकिन वर्तमान स्थिति इस सीधे जवाब से उलट है। वर्तमान में स्कूल शिक्षा देने की बजाय सरकारी कानूनों का पालन करने अथवा न पालन कर पाने की स्थिति से निपटने में अपनी ऊर्जा खर्च कर रहे हैं। १ अप्रैल २०१० को 'शिक्षा का अधिकार क़ानून' चौदह साल तक के बच्चों को मुफ्त शिक्षा प्रदान करने के उद्देश्य से लागू किया गया था। लेकिन आज इस क़ानून के कई प्रावधान ही बच्चों की शिक्षा में आड़े आ रहे हैं। मसलन, आरटीई का बिल्डिंग कोड अथवा लैंड नार्म्स।

दरअसल शिक्षा के अधिकार क़ानून के तहत यह प्रावधान रखा गया है कि कक्षा नर्सरी से लेकर ५वीं  तक के स्कूलों के पास ८०० स्कावयर मीटर की जमीन होनी अनिवार्य है जबकि नर्सरी ८वीं तक के स्कूल १००० स्क्वायर मीटर तक की अहर्ता पूरी करें। पहली बात तो यह है कि इस अनिवार्यता को उन विद्यालयों पर भी थोपा जा रहा है जो शिक्षा का अधिकार कानून लागू होने से बहुत साल पहले से चल रहे हैं। १ अप्रैल २०१० के बाद खुल रहे स्कूलों पर इसे लागू करना तो एक हद तक समझा भी जा सकता है लेकिन छोटे बजट वाले हजारों की संख्या में गली-मुहल्ले के स्कुल क्या करें जो पहले से अपनी सीमित व्यवस्था में सरकारी स्कूलों से बेहतर शिक्षा दे रहे हैं। लेकिन इस बिल्डिंग कोड की वजह से ऐसे हजारों स्कूलों पर गाज गिर रही है। अभी एक महीने पहले ही नवभारत टाइम्स की एक रिपोर्ट में बताया गया था कि आरटीई के प्रावधानों को नहीं मानने वाले ८०० स्कूलों को बंद किया गया है। सवाल उठता है कि सरकार ने कानूनी प्रवाधानों को मनवाने के लिए स्कूल तो बंद करा दिया लेकिन उन आठ सौ स्कूलों में पढने वाले बच्चों का क्या होगा अथवा क्या हुआ, इस बारे में दिल्ली सरकार के पास कोई जवाब नहीं है।

हालांकि बिल्डिंग कोड की कमियों और इसके शिक्षा पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों को लेकर सरकार से लगातार बात करने पर वे इस बात पर तो तैयार हुए कि पहली कक्षा से पांचवी कक्षा तक के स्कूलों के लिए वे ८०० स्क्वायर मीटर की बजाय २०० स्कावयर यार्ड (1यार्ड= .9144 मीटर) का नियामक रखेंगे। गौरतलब है कि यार्ड और मीटर मापकों  में मामूली का फर्क  है। वहीँ  कक्षा १ से ८वी  तक  के लिए ७०० स्क्वायर मीटर पर सरकार राजी हुई है। यहाँ तार्किक सवाल यह है कि कक्षा १ से पांचवी तक कुल पांच कक्षाएं अगर २०० स्कावयर यार्ड  में चल सकती हैं तो फिर कक्षा ६ से ८वी तक की मात्र तीन कक्षाओं के लिए ५०० स्कावयर मीटर की बाध्यता क्यों जरुरी है ? यह एक तार्किक सवाल है जिसपर दिल्ली सरकार को गंभीरता से सोचना चाहिए।

खैर, इस बाबत जब नेशनल इंडिपेंडेंट स्कूल्स अलाएंस (NISA) की तरफ से इस बात की वकालत की गयी कि सरकार यदि दो शिफ्ट में कक्षाएं चलाने को लेकर तैयार ही है तो ऐसा क्यों न हो कि विद्यालय के लिए २०० स्क्वायर यार्ड  की बाध्यता हो जिसके पहले शिफ्ट में कक्षा १ से पांचवीं तक के बच्चे पढ़ें और दूसरी शिफ्ट में कक्षा ६ से आठवीं तक की कक्षाएं चलाई जाय। लेकिन आश्चर्यजनक है कि दो शिफ्ट में कक्षाएं चलाने की समर्थक दिल्ली सरकार इसबात पर तैयार नहीं है कि दुसरे शिफ्ट में कक्षा ६ से आठवीं तक की कक्षा चले। सरकार का कहना है कि दुसरी शिफ्ट में भी कक्षा १ से पांच तक की ही कक्षाएं चलाई जाय। ऐसे में सवाल उठता है कि सिर्फ बिल्डिंग कोड को लागू कराने मात्र के लिए शिक्षा उपलब्ध कराने के सुलभ अवसरों एवं उपायों को सरकार किस जिद में खारिज कर रही है। सामान्य समझ की बात है कि यदि कक्षा १ से पांचवी तक के बच्चे २०० स्क्वायर यार्ड में पढ़ सकते हैं तो भला कक्षा छ: से आठवीं तक के बच्चों के लिए लगभग ३०० स्कावयर मीटर ज्यादा की जरुरत क्यों है ?

सरकार को यह समझना चाहिए कि दिल्ली जैसी जगह, जहाँ जमीन न सिर्फ बेहद महंगी है बल्कि जमीन उपलब्ध भी हैं, में सरकार द्वारा स्कूल चलाने के लिए लागू किये जा रहे इन सख्त लैंड नोर्म्स का सीधा असर उन स्कूलों पर पड़ रहा है जो बेहद कम बजट के और गली-मुहल्ले में चलने वाले स्कूल हैं। हमें यह समझना होगा कि सरकार जो लैंड नोर्म्स लागू कर रही है उससे न तो सरकारी स्कूलों को कोई खतरा है और न ही बड़े पूंजीपतियों के नामी स्कूलों को खतरा है। इसका सीधा असर उन स्कूलों पर है जो बेहद छोटे बजट में चल रहे हैं और आम आदमी की जरूरतों के अनुरूप काम कर रहे हैं। इसबात पर भी हमें गौर करना होगा कि बेहद उच्च बजट वाले बड़े निजी स्कूलो की संख्या छोटे बजट वाले प्राइवेट स्कूलों की तुलना में बहुत कम है। दूसरी बात यह भी है कि बड़े स्कूलों के पास न तो बजट की समस्या है और न ही उनके पास जमीन की कमी है, लिहाजा उनके लिए आरटीई के प्रावधान उस स्तर पर समस्या पैदा करने वाले नहीं हैं, जिस स्तर पर भारी संख्या में छोटे स्कूलों के लिए समस्या पैदा कर रहे हैं।

सरकार को चाहिए कि वो तार्किक ढंग से इस समस्या का समाधान 'क़ानून प्रथम' की बजाय 'शिक्षा प्रथम' को वरीयता देते हुए निकाले। अगर कोई स्कूल २०० स्क्वायर यार्ड के क्षेत्रफल में दो शिफ्ट कक्षाएं चलाकर पहली से आठवीं कक्षा तक के बच्चों को गुणवत्ता के साथ शिक्षा दे रहा है तो सरकार उसे प्रोत्साहित करने का उपाय करे न कि उसको कानूनी हथकंडों से और समस्या में डाले। चूँकि 'शिक्षा के अधिकार' जैसे शब्द सुनने-सुनाने के लिए तो यूटोपिया जैसी मनोस्थिति पैदा कर देते हैं लेकिन तार्किकता की कसौटी पर बेहद गैर-जरुरी होते हैं। व्यावहारिकता के धरातल पर इस समस्या को समझने की जरूरत है। बजाय कि हम शिक्षा के अधिकार की बात करें, हमे अब इसबात पर जोर देना होगा कि स्कूल चुनने का अधिकार कैसे मिले, अवसर कैसे मिले, आजादी कैसे मिले! वर्तमान समय अधिकार देने का नहीं बल्कि अवसर देने  का है। हमें सहज, सुलभ और सर्वांगीण अवसर पैदा करने की जरूरत है जो कि तभी संभव है जब स्कूलों का मूल्यांकन कानून की बजाय गुणवत्ता के आधार पर हो और इसी मानक के आधार पर प्रोत्साहन भी सुनिश्चित किया जाय।

- शिवानन्द द्विवेदी
(लेखक डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी रिसर्च फाउन्डेशन में रिसर्च फेलो हैं)