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शनिवार, फरवरी 16, 2013
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  • अर्थव्यवस्था से संबंधित भ्रमों में सबसे ज्यादा सुनाई देनेवाली यह धारणा है कि मशीनें बेरोजगारी पैदा करती है।
    - हेनरी हैजलिट
  • हमने कैसे लकड़ी की जगह कोयला इस्तेमाल करना शुरू किया, कोयले के बदले तेल का प्रयोग करने लगे।उसके बाद तेल से प्राकृतिक गैस के के उपयोग तक कैसे पहुंचे ?भगवान के नाम पर कोई तो समझाओ कि किसी सरकारी एजंसी के बिना हम संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल करना कैसे सीख पाए ?
    - मिल्टन फ्रीडमैन
  • साझेदारी की दिक्कत ऐसी ही है- कई सारे बच्चे एक ही बर्तन में स्ट्रा डालकर...
बुधवार, फरवरी 13, 2013
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भारत में न्याय कछुआ चाल से होता है। मुकदमों के निपटारे की बेहद धीमी रफ्तार का ही नतीजा है कि  देश के न्यायालयों में 2 करोड़ 60 लाख से ज़्यादा मुक़दमे लंबित हैं। इनमें से कई तो आधी सदी से भी ज़्यादा पुराने हैं। आज की तारीख में सुप्रीम कोर्ट र्में कुल 56,304 मुकदमे लंबित हैं। इस न्यायालय में एक साल तक पुराने मुकदमों की कुल संख्या 19,968 हैं। यही हाल हाईकोर्टों का भी है। यहां पांच लाख 30 हजार याचिकाएं तो वह हैं जो 10 से ज्यादा वर्षों से लंबित हैं। निचली अदालतों में तो अराजकता फैली हुई है। वहां तो लंबित मामलों की संख्या करोड़ों में है।

लंबित...

सोमवार, जनवरी 21, 2013
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शुक्रवार, जनवरी 11, 2013
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उदारवादी अर्थशास्त्री और अर्थशास्त्र के नोबल पुरस्कार विजेता जेम्स एम बुकानन पिछले दिनों नहीं रहे । बुकानन ने गॉर्डन टलक के साथ मिलकर ‘Public Choice Theory’ या ‘लोक चयन के सिद्धांत’ की खोज की. 1986 में उन्हें अपने काम ‘अनुबंधात्मक और संवैधानिक आधार पर’ अर्थशास्त्रीय सिद्धांत का विकास और राजनैतिक निर्णय पर अर्थशास्त्र का नोबेल पुरस्कार मिला.

बुकानन ने शिकागो यूनिवर्सिटी में अर्थशास्त्र के बैचलर डिग्री प्रोग्राम में उदारवादी समाशास्त्री के रूप में दाखिला लिया. फ्रेंक नाइट के ‘मूल्य सिद्धांत’ के पाठ्यक्रम को छह हफ्तों तक पढ़ने के बाद बुकानन ने यह...

शनिवार, जनवरी 05, 2013

अपनी जड़ों से जुड़ने की बात पर ग्राम्य जीवन की रोमानी छवि पेश करने की साधारण रवायत रही है। लेकिन उल्लेखनीय यह है कि ग्राम्य जीवन पर न्यौछावर होने वाले ये अधिकतर लोग शहरों में रहते हैं – या तो भारत में या कहीं और। इस तरह रूमानी रंग देने में छिपे विरोधाभास को ये नकार देते हैं – आखिरकार इनकी पिछली पीढ़ियाँ कुछ वाजिब कारणों से ही तो गाँव छोड़ के शहर आई थीं।

गाँवों के सबसे बड़े हिमायती थे मोहनदास गाँधी, जिनकी शिक्षा लन्दन में हुई थी, और उनकी वकालत का पेशा भी शहरी दक्षिण अफ़्रीका में था। उन दिनों गाँधी के सबसे कटु आलोचक थे अम्बेडकर, जिन्होंने अछूत के...

शनिवार, जनवरी 05, 2013

एक शताब्दी पूर्व राजनैतिक आज़ादी का विचार शिक्षित अभिजात वर्ग में बहस का मुद्दा हुआ करता था। यह बहुतायत का जनप्रिय आन्दोलन होने की बजाय गिने चुनों के बीच बुद्धिगत माथा पच्ची का विषय बना था। ऐसा नहीं कि उस समय भारतियों में उपनिवेशवाद से राजनैतिक निजात पाने की अभिलाषा नहीं थी, बात बस यह थी कि आज़ादी की यह संकल्पना आम लोगों के पल्ले नहीं पड़ती थी। ये महात्मा गाँधी जैसे प्रतिभाशाली व्यक्ति ही थे जिन्होंने अभिजात वर्ग के लक्ष्यों को ऐसे आसान मंत्र में गढ़ दिया कि वह हर किसी को समझ आ सके। प्रत्येक व्यक्ति को उन्होंने एक सरल सस्ता हथियार दिया, अहिंसात्मक अवज्ञा, जिससे...

मंगलवार, जनवरी 01, 2013
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मंगलवार, जनवरी 01, 2013
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मंगलवार, जनवरी 01, 2013
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डरावनी कहानियों का रंग उतरना शुरू हो गया हैं. ऐसे में इस तूफान के पीछे के कारणों को जानना महत्वपूर्ण है.

पहेली जैसा प्रश्न ये है कि सीपीएम ने नंदीग्राम मामले में जो हुआ वो क्यों होने किया? शायद वे उस चीनी नेतृत्व के पदचिन्हों पर चलने का प्रयास कर रहे रहे थे, जिसने खुलेआम थिआनानमेन चौक पर छात्रों के प्रदर्शन का दमन किया था और उसके बाद इतना कड़ा रुख अपनाया गया कि बीजिंग के महाशक्ति के रूप में तेज़ी से उभरने की वजह से अब इस बारे में कोई बात भी नहीं करना चाहता.

हालांकि, मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी विशेष आर्थिक क्षेत्रों...

शनिवार, दिसम्बर 29, 2012
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