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Thursday, September 07, 2017

 शिक्षा का अधिकार कानून (आरटीई) लाकर बच्चों की पहुंच स्कूल तक तो हो गई लेकिन शिक्षा तक उनकी पहुंच अब भी नहीं हो पायी है। आरटीई में शिक्षा के लिए इनपुट के नॉर्म्स तो तय किए गए हैं लेकिन लर्निग आउटकम की बात नहीं की गई है। अध्यापकों की जो थोड़ी बहुत जवाबदेही सतत एवं समग्र मूल्यांकन (सीसीई) और नो डिटेंशन के प्रावधान के माध्यम से थी उसको भी हटाया जा रहा है। सीखने की सारी जिम्मेदारी व जवाबदेही बच्चों पर वापस डाली जा रही है। तमाम सरकारी व गैरसरकारी अध्ययन भी यह बताते हैं कि बड़ी तादात में अध्यापक स्कूलों में गैरहाजिर रहते हैं। यदि स्कूल आते भी...

Tuesday, August 01, 2017

"हम अर्थशास्त्री ज्यादा तो नहीं जानते, लेकिन हम ये अच्छी तरह जानते हैं कि किसी वस्तु का अभाव कैसे पैदा किया जाता है। उदाहरण के लिए, यदि आप टमाटर की कमी पैदा करना चाहते हैं तो सिर्फ एक ऐसा कानून बना दीजिए जिसके तहत कोई भी खुदरा व्यापारी टमाटर की कीमत 20 रूपए प्रति किलो की दर से अधिक नहीं वसूल सकेगा। तत्काल ही टमाटर की कमी पैदा हो जाएगा। ठीक ऐसी ही स्थिति तेल और गैस के साथ है।"
- मिल्टन फ्रीडमैन

Tuesday, July 25, 2017

केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (सीबीएफसी) और विवादों का चोली दामन का साथ रहा है। वर्ष 1952 में अपनी स्थापना के बाद से ही सीबीएफसी का नाम अक्सर किसी न किसी विवाद से जुड़ता ही रहा है। विवाद की स्थिति कभी किसी राजनैतिक दल से करीबी रिश्ता रखने वालों को बोर्ड का प्रमुख बनाए जाने के कारण तो कभी किसी फिल्म/दृश्य को प्रसारित किए जाने की अनुमति देने अथवा न देने के कारण पैदा होती रही है। कभी किसी सीईओ के रिश्वत लेकर फिल्मों के प्रसारण की अनुमति देने के कारण तो कभी किसी फिल्म को प्रसारण की अनुमति न देने के कारण। कभी एक फिल्म में 21 कट्स लगाने का आदेश...

Monday, July 24, 2017

हाल ही में लोकसभा में एक एक विधेयक पारित हुआ है जिसके कानून बन जाने की सूरत में देश मे लगभग आठ लाख शिक्षकों की कमी हो जाएगी। पारित विधेयक के अनुसार 31 मार्च 2019 तक सभी सरकारी ग़ैरसरकारी शिक्षको को बीएड की डिग्री हासिल करनी है अन्यथा वो कहीं पढ़ाने योग्य नही रहेंगे। लोकसभा में पारित मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार संशोधन विधेयक में हुई चर्चा के दौरान ये बात सामने आयी कि इस समय निजी स्कू लों में करीब 5 लाख और सरकारी स्कूलों में ढाई लाख से ज्यादा गैर प्रक्षिशित लोग पढ़ा रहे है जो काफी नुकसानदायक है। फिलहाल ये विधेयक राज्य सभा मे जाएगा और देश...

Tuesday, June 27, 2017

एचआरडी मिनिस्ट्री ने न्यू एजुकेशन पॉलिसी बनाने के लिए कमिटी का ऐलान किया है। कमिटी का हेड अंतरिक्ष वैज्ञानिक के. कस्तूरीरंगन को बनाया गया है। इनके अलावा कमिटी में और 8 सदस्य हैं। मिनिस्ट्री काफी वक्त से कमिटी बनाने की तैयारी कर रही थी लेकिन इसमें लगातार देरी होती रही। पहले मिनिस्ट्री ने पूर्व कैबिनेट सेक्रेटरी टीएसआर सुब्रमण्यम के नेतृत्व में न्यू एजुकेशन पॉलिसी की कमिटी बनाई थी। जिसने देशव्यापी कंसल्टेशन के बाद अपनी रिपोर्ट जमा की। लेकिन बाद में मिनिस्ट्री ने इस रिपोर्ट को एजुकेशन पॉलिसी का ड्राफ्ट मानने से इनकार कर दिया और इसे महज कुछ...

Saturday, June 24, 2017

लोक कल्याण के लिए चलाई जाने वाली सरकारी योजनाओं की सफलता का पैमाना उस योजना से बाहर निकलने वाले लोगों की संख्या की गणना के आधार पर होनी चाहिए बजाए कि उस योजना में शामिल किए जाने वाले लोगों की संख्या की गणना के आधार परः रोनाल्ड रीगन (अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति)

Thursday, June 01, 2017
खुशखबरी!! ipolicy वर्कशॉप में आवेदन करने से चुक गए पत्रकारों के लिए सुनहरा मौका। आवेदन की अंतिम तिथि 31 मई 2017 से बढ़ाकर 5 जून 2017 कर दी गई है। जल्दी करें आवेदन का यह अंतिम मौका हाथ से निकल न जाए.. अधिक जानकारी के लिए क्लिक करें http://azadi.me/ipolicy-for-journalists-naukuchiatal पूर्व में आयोजित ipolicy वर्कशॉप से संबंधित तस्वीरों को देखने के लिए क्लिक करें... https://www.facebook.com/pg/www.azadi.me/photos/?tab=albums
Thursday, May 04, 2017

नोबेल पुरस्कार विजेता प्रख्यात अर्थशास्त्री मिल्टन फ्रीडमैन ने दशकों पहले कहा था कि, अधिकांश समस्याओं की जड़ सरकारी फैसलों के उचित नीति की बजाए अच्छी नियत के आधार पर लिया जाना होता है। फ्रीडमैन का यह कथन अब भी अत्यंत प्रासंगिक है। उचित नीति की बजाए जब महज अच्छी नियत के आधार पर फैसले लिए जाते हैं तो अधिकांश लोगों के लिए वे परेशानी का सबब बनते हैं। अवैध बूचड़खानों पर प्रतिबंध के कारण उत्तर प्रदेश में ऐसी ही स्थिति उत्पन्न हो गयी है। मांसाहारी खानों के शौकीन लोगों के साथ साथ जानवरों को भी परेशानी उठानी पड़ रही है..। इस समस्या को अत्यंत हल्के...

Monday, May 01, 2017
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पिछले कुछ दशकों में प्राथमिक शिक्षा के सम्बन्ध में अभिभावकों की पसंद में अत्यधिक परिवर्तन हुआ है और कम साधनों के बावजूद ग्रामीण एवं उप-नगरीय क्षेत्रों में बजट प्राइवेट स्कूलों की बढ़ती संख्या ने कम साधनों वाले माता-पिता को भी एक दूसरा विकल्प दिया है जिसकी लम्बे समय से आवश्यकता थी | इसके बाद भी इन स्कूलों के प्रति जो धारणा है वो अच्छी नहीं है और उनके ऊपर आरोप लगते रहते हैं की वे गुणवत्ता के स्थान पर अपने लाभ को अधिक प्राथमिकता देते हैं |

इसको दूर करने के लिए सेंटर फॉर सिविल सोसाईटी...

Thursday, April 27, 2017

शिक्षक हूँ, पर ये मत सोचो,
बच्चों को सिखाने बैठा हूँ..
मैं डाक बनाने बैठा हूँ ,
मैं कहाँ पढ़ाने बैठा हूँ।
कक्षा में जाने से पहले
भोजन तैयार कराना है...
ईंधन का इंतजाम करना
फिर सब्जी लेने जाना है।
गेहूँ ,चावल, मिर्ची, धनिया
का हिसाब लगाने बैठा हूँ,
मैं कहाँ पढ़ाने बैठा हूँ ...
कितने एस.सी. कितने बी.सी.
कितने जनरल दाखिले हुए,
कितने आधार बने अब तक
कितनों के खाते खुले हुए
बस यहाँ कागजों में उलझा
निज साख बचाने बैठा हूँ
मैं कहाँ पढ़ाने बैठा हूँ ......

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