ब्लॉग

Monday, November 01, 2010

सवाल शुरू होता है खुद से ‘क्या हमने कोई काम ले-दे कर करवाया है?’ बस, देश में रिश्वत के स्तर और समाज में उसकी मान्यता का अंदाजा यहीं से लग जाएगा. चाय पानी, सुविधा शुल्क, फिक्सिंग, घूस और न जाने कितने नामों से प्रचलित रिश्वत हमारी प्रणाली में घुन्न की तरह लगी और बढती चली गई. न तो रिश्वत नयी बात है और न ही भारत में इसका होना कोई अजूबा. हां, बीते वर्षों में यहां इसका प्रचलन जिस तरह से बढा है और यह धारणा बनी है कि कोई काम बिना लिए - दिए नहीं होगा, वह चिंताजनक है.

भ्रष्टाचार करने वाले हजार के नोटों...

Thursday, October 28, 2010

वस्तुतः नक्सलवाद की नींव रखने वाले चारू मजुमदार और कनु सान्याल के मन में सत्ता के खिलाफ सशस्त्र आन्दोलन शुरुआत करने का विचार तभी आया होगा जब उन्होंने संभवतः यह महसूस किया होगा कि भारतीय मजदूरो और किसानो की दुर्दशा के लिए सरकारी नीतिया जिम्मेदार है,और उसी के कारण उच्च वर्गों का बोलबाला हो गया है.

और शायद सौ फीसदी वे गलत भी नहीं है. अतः निश्चय ही आज ये सशस्त्र विद्रोह नक्सलवाद का उग्र रूप धारण कर चुका है, जो देश के लिए एक सबसे बडा खतरा बनकर मंडरा रहा है.

...

Wednesday, October 27, 2010

भाषा मुँह से निकली ध्वनियों से अलग भी कुछ होती है? क्या होती है? हमारी सोच का विस्तार और सीमा? हमारे चिन्तन का शिल्प? ज्ञानकोष का खाता? सामाजिक और नैतिक मूल्यों की परम्परा?

मेरी परिवार की एक बारह साल की बच्ची को ठीक से 'क ख ग घ' नहीं आता। तीस के आगे गिनती भी नहीं आती। मैं इस बात से अवसादग्रस्त हुआ हूँ। ये भाषा के अप्रसांगिक होने के संकेत हैं। हालांकि बातचीत वह हिन्दी में ही करती है मगर ज्ञानार्जन के लिए उसे हिन्दी वर्णमाला और अंकमाला की ज़रूरत नहीं। एक सफल जीवन जीने के लिए उसे...

Tuesday, October 26, 2010

प्रिय प्रधानमंत्री जी,

मुझे यह जानकर खुशी हुई कि सुप्रीम कोर्ट को ‘‘सम्मानपूर्वक’’ फटकारते हुए आप ने कहा है कि अनाज, सड़ते हुए खाद्यान्न का निपटारा जैसे सभी सवाल नीतिगत मामले हैं. आप बिल्कुल सही कह रहे हैं और बहुत दिनों बाद ऐसा किसी ने कहा है. ऐसा कर आप संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की सार्वजनिक बयानबाजी में ईमानदारी लाने की एक छोटी-सी कोशिश कर रहे हैं, जिसकी बहुत कमी महसूस की जा रही थी. बेशक यह आपकी सरकार को तय करना है कि वर्तमान में लाखों टन सड़ते अनाज का क्या करना है, कोर्ट को...

Monday, October 25, 2010

जब देश आजाद हुआ था तब देश का भरणपालन अधिकतर आदर्शवादियों के हाथ में था. इस कारण जो देश २५०० साल से लुटतापिटता आया था उसे बहुत ही सावधानी से देश की विदेश नीति बनाई गई, आर्थिक नीति बनाई गई, हर चीज को उस तरह से नियंत्रण में रखा गया जैसे एक मां बडी समझदारी से पिताजी की सीमित आय से परिवार का खर्चा चलाती है.

ऐसे परिवारों में मां जो कुछ करती है उसे एक दो लोग समझते हैं, लेकिन कुछ बच्चे हमेशा शिकायत करते रहते हैं कि उनको पडोसी के बच्चों के समान यह नहीं मिला या वह नहीं...

Friday, October 22, 2010

अगर मैं कहूं कि चीन उन देशों में से एक हैं जहां आज़ादी को सबसे ज्यादा तवज्जो नहीं दी जाती, तो आप चौंकेंगे नहीं. अगर मैं यह कहूं कि चीन में रोज-रोज मानवाधिकारों का हनन होता है, तो भी आपको अचरज नहीं होगा. लेकिन मुझे मनोविकार से पीड़ित चीनी सरकार के इन्टरनेट सम्बन्धी  रवैये को लेकर हमेशा हैरानी होती है. क्योंकि इसी देश में आपको उन असंख्य स्ट्रीमिंग वेबसाइट्स से गैरकानूनी तरीके अपना कर अपलोड किए गए बेशुमार संगीत, फिल्में और अन्य सामग्री मनमाने ढंग से फ्री डाउनलोड करने की छूट है.

इसे चीनी...

Wednesday, October 13, 2010

कुछ बेहद महत्वपूर्ण सवाल ऐसे हैं जिनका जवाब आर्थिक क्षेत्र के वैज्ञानिकों को देना ही चाहिए. ऐसे सवाल “What If” यानी “क्या होता यदि” से शुरू होते हैं. क्या हमें 8-9 फीसदी की आथिर्क विकास दर से संतुष्ट हो जाना चाहिए, खास तौर पर ऐसे समय में जब दुनिया की अधिकांश अर्थव्यवस्थाएं 2008 के बाद शुरू हुए भीषण आथिर्क संकट से अब भी बमुश्किल उबर रही हैं? लेकिन क्या हम इन बातों को दरकिनार कर सकते हैं कि जीडीपी वृद्धि दर आधारित बेहतरी को आर्थिक विकास और जीवन स्तर का पैमाना मानने की बात पर सवालिया निशान उठाए जाते हैं?

...
Wednesday, October 13, 2010

पिछले एक दशक में भारत और चीन दोनों ही काफी तेजी से विकसित हुए हैं। हालांकि आर्थिक विकास और गरीबी उन्मूलन के लिहाज से भारत का प्रदर्शन चीन से कुछ कम अच्छा है। चीन के परिणाम चौंकाने वाले हैं- विकास की औसतन 9 फीसदी दर और पिछले दो दशक में 30 करोड़ लोग गरीबी की रेखा के ऊपर उठ चुके हैं। जबकि भारत में, ज्यादा विकास दर के बावजूद गरीबी एक दुर्भाग्यपूर्ण लेकिन देश की आर्थिक स्थिति का स्थायी भाव सा बन गया है। हाल ही में मेरे एक सहकर्मी ने मुझसे जानना चाहा कि क्या मुझे लगता है कि भारत के विकास की धीमी गति का कारण राजनीतिक...

Pages