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"संविधान एक अद्भुत मंदिर था जिसका निर्माण हमने देवताओं के रहने के लिए किया था लेकिन इससे पहले कि वे वहां स्थापित होते शैतानों ने उसपर कब्ज़ा जमा लिया। इसलिए, अब हम केवल एक काम कर सकते हैं, और वह काम है इस मंदिर को जलाकर खाक कर देना" - डा. भीमराव अंबेडकर, स्त्रोतः द टाइम्स ऑफ इंडिया, 20 मार्च 1955.

शिक्षा का अधिकार कानून (आरटीई) लाकर बच्चों की पहुंच स्कूल तक तो हो गई लेकिन शिक्षा तक उनकी पहुंच अब भी नहीं हो पायी है। आरटीई में शिक्षा के लिए इनपुट के नॉर्म्स तो तय किए गए हैं लेकिन लर्निग आउटकम की बात नहीं की गई है। अध्यापकों की जो थोड़ी बहुत जवाबदेही सतत एवं समग्र मूल्यांकन (सीसीई) और नो डिटेंशन के प्रावधान के माध्यम से थी उसको भी हटाया जा रहा है। सीखने की सारी जिम्मेदारी व जवाबदेही बच्चों पर वापस डाली जा रही है। तमाम सरकारी व गैरसरकारी अध्ययन भी यह बताते हैं कि बड़ी तादात में अध्यापक स्कूलों में गैरहाजिर रहते हैं। यदि स्कूल आते भी हैं तो कक्षाओं में नहीं जाते। इस गंभ

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हमारे आस पास तमाम ऐसी घटनाएं घटित होती हैं जो अखबारों की सुर्खियां नहीं बन पाती लेकिन अक्सर समाज में बदलाव लाने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। परिवर्तन की ऐसी ही एक सकारात्मक बयार  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी के अमरा गांव में भी बहती महसूस की जा सकती है। इसकी शुरूआत एक स्वयं सहायता समूह की प्रेरणा से स्थानीय स्कूल में पढ़ने वाले 10-12 वर्ष के कुछ छात्र-छात्राओं द्वारा स्कूल न जाने वाले बच्चों को पढ़ाने के काम से शुरू हुई। स्कूली बच्चे गांव के खेत-खलिहान के आस पास के अन्य बच्चों को बैठाकर पढ़ाना शुरू किया। इन

बीते दिनों केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने 10वीं कक्षा में बोर्ड की परीक्षा को पुनः अनिवार्य बनाने पर अपनी सहमति दे दी। इसके साथ ही राज्यों को पांचवी कक्षा के बाद परीक्षा कराने की भी दे दी गई। राजस्थान सहित कई राज्यों ने छठीं व आगे की कक्षा में परीक्षा कराने की गैर आधिकारिक घोषणा भी कर दी। 10वीं में बोर्ड की परीक्षा व छठीं तथा आगे की कक्षा में वार्षिक परीक्षा पद्धति वापस लाने के पीछे छात्रों द्वारा लापरवाही करने और पढ़ाई पर ध्यान न देने को प्रमुख वजह बताया गया है। इसे तर्कसंगत साबित करने के लिए राज्यों द्वारा तमाम सरकारी,

क्या आप जानते हैं?
भीषण प्रदूषण से प्रभावित एक देश ने लोगों को प्रदूषण फैलाने से रोकने की बजाए उन्हें पर्यावरण प्रदूषित करने का अधिकार देकर समस्या पर काबू पाया..
क्या आप जानते हैं?
लगातार विलुप्त होते जानवरों को बचाने के लिए एक देश ने लोगों को जानवरों को मारने की छूट दे दी। आज वे जानवर भारी तादात में उस देश में मौजूद हैं..
क्या आप जानते हैं?

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-  द्वितीय अंतर्राष्ट्रीय लघु फिल्म प्रतिस्पर्धा ‘एडू-डॉक’ की हुई औपचारिक घोषणा, प्रविष्ठियां भेजने की अंतिम तारीख 30 अक्टूबर
- 3 दिसंबर को प्रतिष्ठित ‘स्कूल च्वाइस नेशनल कांफ्रेंस’ के दौरान इंडिया हैबिटेट सेंटर में होगी स्क्रीनिंग, 3 श्रेष्ठ फिल्में होंगी पुरस्कृत

- पॉलिसी रिव्यू कमेटी का गठन कर बजट प्राइवेट स्कूलों के समक्ष उत्पन्न होने वाली कई समस्याओं का करेंगे समाधान
- दिल्ली के निजी स्कूलों ने अव्यवहारिक ‘लैंड नॉर्म्स’ के कारण पैदा हुई समस्याओं से उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया को कराया था अवगत

बड़े व्यापारिक घराने उच्च मजदूरी दर (न्यूनतम मजदूरी की दर बढ़ाने) के लिए लॉबिंग करते हैं, ताकि छोटे व्यावसायिक प्रतिष्ठान इस बढ़े भार को सहन न कर सकें और समाप्त हो जाएं.. इस प्रकार, बड़े प्रतिष्ठानों के राह से प्रतिस्पर्धा समाप्त हो जाती है..
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सहभागितापूर्ण लोकतंत्र के मूलमंत्र को आत्मसात करते हुए थिंकटैंक सेंटर फॉर सिविल सोसायटी (सीसीएस) ने शिक्षा के क्षेत्र में सक्रिय विभिन्न संगठनों को एक मंच के नीचे लाकर 'एनईपी गठबंधन' तैयार किया है। गठबंधन का उद्देश्य नई शिक्षा नीति के बाबत व्यापक विचार विमर्श करना है। इस उद्देश्य को अमली जामा पहनाते हुए एनईपी गठबंधन द्वारा ऑनलाइन विचारमंच (विकी) www.nep.ccs.in लांच किया गया है। इस विचारमंच पर कोई भी आम-ओ-खास शिक्षा और शिक्षा के बाबत बनने वाली नीतियों पर अपने विचार प्रकट कर सकता है। इस विचारमंच को तैयार करते

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