अविनाश चंद्रा's blog

"सागर में समाकर अपनी पहचान खो बैठने वाली पानी की बूंद से इतर, मनुष्य समाज में रहकर भी अपनी पहचान नहीं खोता है।
मानव जीवन स्वतंत्र होता है। मनुष्य का जन्म केवल समाज की उन्नति के लिए नहीं बल्कि स्वयं की उन्नति के लिए होता है..."
 
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सेंटर फॉर सिविल सोसायटी  (सीसीएस) और सेंट्रल स्क्वायर फाउंडेशन (सीएसएफ) द्वारा फेडरेशन ऑफ इंडियन चैंबर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (फिक्की) के संयुक्त तत्वावधान में फेडरेशन हाउस में 29 अगस्त 2013 को राइट टू एजुकेशन पोर्टल की लॉंचिंग की जा रही है। उद्घाटन समारोह के दौरान सांसद श्री नवीन जिंदल और श्री प्रकाश जावडेकर बतौर मुख्य अतिथि मौजूद रहेंगे।

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डॉलर के मुकाबले रूपया अपने न्यूनतम स्तर पर पहुंच गया है। सरकार और नीति निर्धारकों द्वारा रूपये को गिरने से बचाने के लिए तमाम कृत्रिम जतन किए जा रहे हैं लेकिन इससे रूपए की सेहत पर कोई असर पड़ता दिखाई नहीं दे रहा है। उधर, विभिन्न दलों के बीच इस बाबत राजनीति भी जम कर हो रही है। रूपए की इस हालत के लिए सभी एक दूसरे को दोषी ठहरा रहे हैं। देखें एक मजमून: 

 

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ऑस्ट्रियन-ब्रिटिश अर्थशास्त्री फ्रेडरिक आगस्टस हायक (1899-1992) ने क्या खूब कहा है, कि समानता के लिए कार्य करना और समान व्यवहार करना दोनों बिल्कुल अलग अलग चीजे हैं। उनका मानना था कि यदि समाज में वास्तव में समानता लानी है तो आपको उसके लिए बड़ी-बड़ी योजनाएं बनाने की जरूरत नहीं है। आपको बस करना ये है कि आगे से सबके साथ समान व्यवहार करना शुरू कर दें।

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सरकार और सरकारी एजेंसिया लोकहित, रोजगार सृजन और नैतिक जिम्मेदारी के निर्वहन के नाम पर किस प्रकार से काम करती हैं और उनका क्या हश्र हो सकता है? यह नीचे प्रस्तुत लघु कथा में वर्णित वाकए से स्पष्ट हो जाता है। इस लघु कथा के माध्यम से यह भी बताने की कोशिश की गई है कि महज इमानदारी से कार्य करने की जिम्मेदारी के निर्वहन भर से ही योजना सफल नहीं होती। सरकारी रोजगार गारंटी योजना के तहत भी कमोवेश यही हो रहा है... 

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देशभर में मिलावटी खाद्य सामग्री का धड़्ल्ले से उपयोग हो रहा है। थोड़े से फायदे के लिए मिलावट खोर ऐसे ऐसे कार्यों को अंजाम दे रहे हैं जो उपभोक्ता के न केवल जेब पर भारी पड़ रहा है बल्कि स्वास्थ संबंधी जटिलताएं भी पैदा कर रहा है। जबकि इसे रोकने के लिए जिम्मेदार विभाग व अधिकारी घोड़े बेचकर सो रहे हैं। इसी मुद्दे पर आधारित कार्टूनिस्ट पवन का यह कार्टून व्यस्था पर जबरदस्त कटाक्ष करता है।

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सरकार एक बार फिर गरीब और गरीबी की नई परिभाषा के साथ अवतरित हुई है। इस बार सरकार ने पूर्व के 27 रुपए की बजाए 32 रुपए को गरीबी रेखा निर्धारित करने का मानक बिंदू बताया है। अर्थात जो व्यक्ति प्रतिदिन 32 रुपए कमाता है वह गरीब नहीं है। हालांकि जैसा कि तय था, सरकार के इस मानक बिंदू का विरोध भी खूब हुआ। लेकिन अपनी गलती स्वीकार करने की बजाए सरकार व सरकारी नुमाइंदों में इसे सही साबित करने की होड़ मच गई। कोई भरपेट भोजन के लिए 12 रुपए को पर्याप्त बताने लगा तो कोई दो कदम और आगे बढ़ पांच रुपए को पेटभर खाने के लिए उपयुक्त बताने लगा। यहां तक कि रूलिंग पार्टी के एक नेता ने तो ज

भ्रष्टाचार और घोटालों के माध्यम से लाखों करोड़ों रुपए का वारा न्यारा कर चुकी सरकारों का यह बयान कि "घोटालों से देश को जीरो लॉस हुआ है" यह बताने के लिए काफी है कि करदाता के खून पसीने से अर्जित धन का इनके लिए क्या महत्व है।

 

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