अविनाश चंद्रा's blog

फाल्गुन (होली/होरी) की शुरूआत हो चुकी है। रंगभरी एकादशी के साथ अब फिजाओं में भंग, ठंडाई और रंग गुलाल की खुशबू तैरने लगी है। इस पूरे सप्ताह बनारस. बाबा धाम सहित शिव की नगरी की तो छटा ही निराली होती है।

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अब ट्रेन आनंद विहार से मुगलसराय के लिए चल पड़ी। थोड़ी ही देर में वर्दीधारी अटेडेंट चेहरे पर मुस्कान और हाथ में बेडिंग लिए हमारे समक्ष फिर अवतरित हुआ। ‘योर बेडिंग्स सर’ के साथ उसने साफ सुथरे बेडशीट, पिलो और टावेल हम सभी की सीटों पर रख दिए। जबकि आमतौर पर ट्रेन यात्रा में कोच अटेंडेंट्स से टॉवेल लेने के लिए खासी बहस करने की जरूरत पड़ती है। भारतीय रेलवे की कार्यप्रणाली में यह सुखद परिवर्तन मेरे अंदर के पत्रकार को इन सबके बारे में जानने के लिए उत्सुक करने लगा। सहयात्रियों के साथ बातचीत के बाद यूं ही हाथ-पैर सीधा करने के उद्देश्य से मैं गेट तक और फिल ‘लघुशंका’ महसूस न

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राजधानी व शताब्दी सहित कुछ इक्का दुक्का रेलगाड़ियों को छोड़ दें तो भारतीय रेल में यात्रा करने का मेरा अनुभव कुछ ज्यादा अच्छा नहीं रहा है। दूर दराज के छोटे शहरों तक पहुंचने का कोई अन्य विकल्प न होने के कारण भारतीय रेल सेवा का प्रयोग करना मजबूरी ही होती है। ट्रेन में बर्थ की अनुपलब्धता, टिकट के लिए मारामारी के बाद रही सही कसर यात्रा के दौरान पेंट्रीकार का खाना और गंदे बेडिंग से पूरी हो जाती है। और तो और सामान्य रेलगाड़ियों के अप्रशिक्षित कोच अटेंडेंट, उनकी बेतरतीब गंदी वर्दी और टायलेट की स्थिति यात्रा को ‘सफर’ बनाने के लिए काफी होती है। हर बार सरकार व रेल मंत्रालय

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भगवान राम जब अयोध्या लौट कर आये , प्रेस कांफ्रेस में इलेक्ट्रानिक मीडिया ने सवालों की बौछार कर दी ..........

-आपके टीम के श्री हनुमान को लंका सन्देश देने भेजा था पर उन्होंने वहाँ आग लगा दी.... क्या आपकी टीम में अंदरूनी तौर पर वैचारिक मतभेद है?

- क्या हनुमान के ऊपर अशोक वाटिका उजाड़ने के आरोप में वन विभाग द्वारा मुकदमा नहीं चलाया जाना चाहिए?

- आपके सहयोगी श्री सुग्रीव पर अपने भाई का राज्य हड़पने का आरोप है|....क्या आपने इसकी जांच करवाई?

- क्या ये सच है कि सुग्रीव की राज्य हड़पने की साजिश के मास्टर माइंड आप है?

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देश में इन दिनों जिस प्रकार घोटालों के पर्दाफाश की घटनाएं बढ़ीं हैं, घोटालों में शामिल राजनैतिक दलों, सरकारी कृपा प्राप्त करने वाले व्यावसायिक घरानों में घोटालों को दबाने और इस समस्या से उबरने के लिए घोटाला प्रबंधन में विशेषज्ञात रखने वालों की डिमांड भी बढ़ गई है। आश्चर्य नहीं होना चाहिए यदि जल्द ही बाजार में दो दिनों या कुछ घंटों में घोटाला प्रबंधन में माहिर बनाने वाली पुस्तक भी आने लगे। कैसा होगा वह दृश्य इसका अंदाजा फेसबुक पर पोस्ट एक कार्टून की सहायता से समझा जा सकता है।

साभारः पवनटून

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इन साहब की चिंता यह है कि इनका बेटा अन्य विषयों में तो फिसड्डी है लेकिन मैथ्स यानि गणित में तेज तर्राह है। क्या  इन साहब की चिंता जायज है...? क्या कहेंगे आप? 
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अफवाह न फैले इसलिए सरकार ने एसएमएस की संख्या सीमित कर दी है तो क्या हमें सरकार को टैक्स देना बंद कर देना चाहिए क्योंकि इससे जनहित की बजाए भ्रष्टाचार फैल रहा है।
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पूंजीवाद, बाजारवाद और पूर्ण प्रतियोगिता की अवधारणा ही एक ऐसा सिद्धांत है जिसे अपनाकर कोई भी देश एक साथ सामाजिक, आर्थिक व शैक्षणिक समस्याओं सहित सभी समस्याओं से न केवल निजात पा सकता है बल्कि तरक्की और विकास के मार्ग पर भी अग्रसर हो सकता है। देश की तंगहाल आर्थिक स्थिति से निराश जनता और बाजार ने नब्बे की दशक में ऐसे अप्रत्याशित विकास को प्राप्त कर इसकी अनुभूति भी कर चुकी है। लेकिन वर्तमान समय में इरादतन अथवा गैर इरादतन ढंग से बाजार से प्रतियोगिता की स्थिति बनाने की बजाए इसे और हतोत्साहित किया जा रहा है जिसका परिणाम महंगाई, मुद्रा स्फिति आदि जैसी समस्याओं के रूप में हमारे साम

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भारत के बारे में विदेशियों के बीच एक बात पर अवश्य राय कायम होते देखा जा सकता है। और यह राय यहां कानूनों की अधिकता और उसके न्यूनतम अनुपालन को लेकर है। यह नकारात्मक राय इन दिनों एक और कानून की अनदेखी के कारण और प्रबल हो रहा है। इस बार ऐसा आरटीई यानी शिक्षा का अधिकार कानून के अनुपालन में हो रही लापरवाही और हीला हवाली के कारण हो रहा है। दरअसल,निशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा प्रदान करने के लिए वर्ष 2009 में निर्मित शिक्षा का अधिकार कानून (आरटीई) को हर हाल में कड़ाई से लागू किए जाने को लेकर हाल ही में सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बाद ऐसा लगा कि देश में शिक्षा क्रांति का प्रादुर्भा

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