अविनाश चंद्रा's blog

बकरे की अम्मा कब तक खैर मनाएगी? 

रिश्वत कांड में आरोपी पूर्व रेलमंत्री पवन कुमार बंसल द्वारा जारी विवाद से मुक्ति पाने के लिए बकरे की पूजा करने की खबर आने पर कार्टूनिस्ट पवन द्वारा अपने कार्टून के माध्यम से किया गया कटाक्ष बिल्कुल सटीक बैठता है...।

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राजनैतिक हितों व वोट बैंक के स्वार्थ के वशीभूत हो सियासी दलों द्वारा निजीकरण, मुक्त बाजार व पूर्ण प्रतियोगिता की स्थिति की चाहे जितनी अनदेखी व आलोचना की जाए। लेकिन वास्तविकता यही है कि महंगाई की समस्या का समाधान किसी सरकार के पास नहीं बल्कि स्वयं बाजार के पास ही होता है। यदि बाजार में पूर्ण प्रतियोगिता की स्थिति हो तो वस्तुओं/सेवाओं की कीमतों में उतरोत्तर कमी व गुणवत्ता में तुलनात्मक रूप से वृद्धि देखने को मिलती है। अर्थशास्त्र के इस सामान्य से नियम की न केवल अनदेखी की जाती है बल्कि लोगों के मन में बाजार को लेकर भ्रम भी पैदा किया जाता है।

मुक्त बाजार व्यवस्था लोगों के बीच तालमेल और सहयोग को बढ़ावा देती है और उनका जीवन स्तर सुधारने में मदद करती है। दूसरी ओर, अगर अर्थव्यवस्था सरकार के हाथ में है तो यहां हमेशा कुछ ऐसे लोग होंगे जिन्हें सरकार से "खास फायदे" मिलते हैं। जो दूसरे लोगों को लूटते हैं और खुद लुटने से हमेशा बच जाते हैं।

 

- एलन बरिस

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एक नेता मरने के बाद यमपुरी पहुँच गया वहां यमराज ने उसका भव्य स्वागत किया,यमराज ने कहा इससे पहले कि मैं आपको स्वर्ग या नरक भेजूं पहले मैंचाहता हूँ  कि आप दोनों जगहों का मुआयना कर लें कि आपके लिए कौन सी जगह ज्यादा अनुकूल होगी!

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शिक्षा का अधिकार कानून (आरटीई) को लागू हुए आज तीन वर्ष पूरे हो गए। इस मौके पर देश भर में सरकारी व गैर सरकारी स्तर पर बेहतर शिक्षा, स्कूलों व अध्यापकों की गुणवत्ता आदि पर ढेरों बातें हुईं। अधिकांश चर्चाओं परिचर्चाओं का मुख्य केंद्र सरकार द्वारा इस मद में खर्च की जाने वाली धनराशि, सरकारी स्कूलों की खराब स्थिति व स्कूलों में पिछले तीन वर्षों के दौरान हुए दाखिलों की बातें ही रहीं। छात्रों को किस प्रकार के कमरों में पढ़ाया जाए? स्कूल का आकार कम से कम कितने क्षेत्र में फैला होना चाहिए? कक्षा में अधिकतम छात्र कितने होने चाहिए? मिड डे मिल का मेन्यू क्या हो ताकि छात

फाल्गुन (होली/होरी) की शुरूआत हो चुकी है। रंगभरी एकादशी के साथ अब फिजाओं में भंग, ठंडाई और रंग गुलाल की खुशबू तैरने लगी है। इस पूरे सप्ताह बनारस. बाबा धाम सहित शिव की नगरी की तो छटा ही निराली होती है।

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अब ट्रेन आनंद विहार से मुगलसराय के लिए चल पड़ी। थोड़ी ही देर में वर्दीधारी अटेडेंट चेहरे पर मुस्कान और हाथ में बेडिंग लिए हमारे समक्ष फिर अवतरित हुआ। ‘योर बेडिंग्स सर’ के साथ उसने साफ सुथरे बेडशीट, पिलो और टावेल हम सभी की सीटों पर रख दिए। जबकि आमतौर पर ट्रेन यात्रा में कोच अटेंडेंट्स से टॉवेल लेने के लिए खासी बहस करने की जरूरत पड़ती है। भारतीय रेलवे की कार्यप्रणाली में यह सुखद परिवर्तन मेरे अंदर के पत्रकार को इन सबके बारे में जानने के लिए उत्सुक करने लगा। सहयात्रियों के साथ बातचीत के बाद यूं ही हाथ-पैर सीधा करने के उद्देश्य से मैं गेट तक और फिल ‘लघुशंका’ महसूस न

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राजधानी व शताब्दी सहित कुछ इक्का दुक्का रेलगाड़ियों को छोड़ दें तो भारतीय रेल में यात्रा करने का मेरा अनुभव कुछ ज्यादा अच्छा नहीं रहा है। दूर दराज के छोटे शहरों तक पहुंचने का कोई अन्य विकल्प न होने के कारण भारतीय रेल सेवा का प्रयोग करना मजबूरी ही होती है। ट्रेन में बर्थ की अनुपलब्धता, टिकट के लिए मारामारी के बाद रही सही कसर यात्रा के दौरान पेंट्रीकार का खाना और गंदे बेडिंग से पूरी हो जाती है। और तो और सामान्य रेलगाड़ियों के अप्रशिक्षित कोच अटेंडेंट, उनकी बेतरतीब गंदी वर्दी और टायलेट की स्थिति यात्रा को ‘सफर’ बनाने के लिए काफी होती है। हर बार सरकार व रेल मंत्रालय

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