अविनाश चंद्रा's blog

कानून बनाने का उद्देश्य क्या होता है और वास्तव में कानून क्या करता है, इस विषय को बेहद हल्के फुल्के किंतु सटीक ढंग से चित्रित किया है The Hindu अखबार के कार्टूनिस्ट सुरेंद्र ने.. अवश्य देखें और अपनी प्रतिक्रिया दें...
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सुनो सुनो... विधायक जी कह रहे हैं कि ये ही मिल कर मुख्यमंत्री चुनते हैं

 

साभारः काजल कुमार

 

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जनसंख्या को सभी समस्याओं का कारण मानने और चीन जैसी कड़ी नीति का मांग करने वाले लोगों को यह खबर अवश्य पढ़नी चाहिए.. http://bit.ly/2mD5QI9 बाद में एक बार http://azadi.me/population_boon_not_bane इसे भी पढ़ना चाहिए...
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स्कूलों से संबंधित नीतियों के निर्धारण की प्रक्रिया के दौरान अनऐडेड बजट स्कूलों के प्रतिनिधित्व को सुनिश्चित करने की मांग को लेकर बजट स्कूल एसोसिएशनों के अखिल भारतीय संगठन 'नेशनल इंडिपेंडेंट स्कूल्स अलायंस' (निसा) का एक प्रतिनिधिमंडल बृहस्पतिवार को केंद्रीय मानव संसाधन मंत्रालय पहुंचा। निसा प्रेसिडेंट कुलभूषण शर्मा के नेतृत्व में मानव संसाधन मंत्रालय पहुंचे बजट स्कूल एसोसिएशनों के विभिन्न राज्यों के प्रतिनिधियों ने सेक्रेटरी, डिपार्टमेंट ऑफ स्कूल एजुकेशन एंड लिटरेसी; अनिल स्वरूप से मुलाकात की और समस्याओं से अवगत कराया। इस दौरान स्कूलों की ऑटो

"संविधान एक अद्भुत मंदिर था जिसका निर्माण हमने देवताओं के रहने के लिए किया था लेकिन इससे पहले कि वे वहां स्थापित होते शैतानों ने उसपर कब्ज़ा जमा लिया। इसलिए, अब हम केवल एक काम कर सकते हैं, और वह काम है इस मंदिर को जलाकर खाक कर देना" - डा. भीमराव अंबेडकर, स्त्रोतः द टाइम्स ऑफ इंडिया, 20 मार्च 1955.

शिक्षा का अधिकार कानून (आरटीई) लाकर बच्चों की पहुंच स्कूल तक तो हो गई लेकिन शिक्षा तक उनकी पहुंच अब भी नहीं हो पायी है। आरटीई में शिक्षा के लिए इनपुट के नॉर्म्स तो तय किए गए हैं लेकिन लर्निग आउटकम की बात नहीं की गई है। अध्यापकों की जो थोड़ी बहुत जवाबदेही सतत एवं समग्र मूल्यांकन (सीसीई) और नो डिटेंशन के प्रावधान के माध्यम से थी उसको भी हटाया जा रहा है। सीखने की सारी जिम्मेदारी व जवाबदेही बच्चों पर वापस डाली जा रही है। तमाम सरकारी व गैरसरकारी अध्ययन भी यह बताते हैं कि बड़ी तादात में अध्यापक स्कूलों में गैरहाजिर रहते हैं। यदि स्कूल आते भी हैं तो कक्षाओं में नहीं जाते। इस गंभ

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हमारे आस पास तमाम ऐसी घटनाएं घटित होती हैं जो अखबारों की सुर्खियां नहीं बन पाती लेकिन अक्सर समाज में बदलाव लाने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। परिवर्तन की ऐसी ही एक सकारात्मक बयार  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी के अमरा गांव में भी बहती महसूस की जा सकती है। इसकी शुरूआत एक स्वयं सहायता समूह की प्रेरणा से स्थानीय स्कूल में पढ़ने वाले 10-12 वर्ष के कुछ छात्र-छात्राओं द्वारा स्कूल न जाने वाले बच्चों को पढ़ाने के काम से शुरू हुई। स्कूली बच्चे गांव के खेत-खलिहान के आस पास के अन्य बच्चों को बैठाकर पढ़ाना शुरू किया। इन

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