सतीश पेड़णेकर's blog

अप्रैल 1987 में जब पहली बार बोफोर्स घोटाले का खुलासा हुआ था, तब से अब तक क्या कुछ भी बदला है?

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  • जब कर बहुत ज्यादा हो जाते हैं तो लोग भूखे रह जाते हैं।
    - लाऔत्से
  • प्रत्येक कर हमारे दिल में कटार बनकर चुभता है
  • एक आदमी एक हत्या से खलनायक बनता है लाखों लोगों को मारकर वह नायक हो जाता है।
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  • अर्थव्यवस्था से संबंधित भ्रमों में सबसे ज्यादा सुनाई देनेवाली यह धारणा है कि मशीनें बेरोजगारी पैदा करती है।
    - हेनरी हैजलिट
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भारत में न्याय कछुआ चाल से होता है। मुकदमों के निपटारे की बेहद धीमी रफ्तार का ही नतीजा है कि  देश के न्यायालयों में 2 करोड़ 60 लाख से ज़्यादा मुक़दमे लंबित हैं। इनमें से कई तो आधी सदी से भी ज़्यादा पुराने हैं। आज की तारीख में सुप्रीम कोर्ट र्में कुल 56,304 मुकदमे लंबित हैं। इस न्यायालय में एक साल तक पुराने मुकदमों की कुल संख्या 19,968 हैं। यही हाल हाईकोर्टों का भी है। यहां पांच लाख 30 हजार याचिकाएं तो वह हैं जो 10 से ज्यादा वर्षों से लंबित हैं। निचली अदालतों में तो अराजकता फैली हुई है। वहां तो लंबित मामलों की संख्या करोड़ों में है।

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उदारवादी अर्थशास्त्री और अर्थशास्त्र के नोबल पुरस्कार विजेता जेम्स एम बुकानन पिछले दिनों नहीं रहे । बुकानन ने गॉर्डन टलक के साथ मिलकर ‘Public Choice Theory’ या ‘लोक चयन के सिद्धांत’ की खोज की. 1986 में उन्हें अपने काम ‘अनुबंधात्मक और संवैधानिक आधार पर’ अर्थशास्त्रीय सिद्धांत का विकास और राजनैतिक निर्णय पर अर्थशास्त्र का नोबेल पुरस्कार मिला.

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अपनी जड़ों से जुड़ने की बात पर ग्राम्य जीवन की रोमानी छवि पेश करने की साधारण रवायत रही है। लेकिन उल्लेखनीय यह है कि ग्राम्य जीवन पर न्यौछावर होने वाले ये अधिकतर लोग शहरों में रहते हैं – या तो भारत में या कहीं और। इस तरह रूमानी रंग देने में छिपे विरोधाभास को ये नकार देते हैं – आखिरकार इनकी पिछली पीढ़ियाँ कुछ वाजिब कारणों से ही तो गाँव छोड़ के शहर आई थीं।

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एक शताब्दी पूर्व राजनैतिक आज़ादी का विचार शिक्षित अभिजात वर्ग में बहस का मुद्दा हुआ करता था। यह बहुतायत का जनप्रिय आन्दोलन होने की बजाय गिने चुनों के बीच बुद्धिगत माथा पच्ची का विषय बना था। ऐसा नहीं कि उस समय भारतियों में उपनिवेशवाद से राजनैतिक निजात पाने की अभिलाषा नहीं थी, बात बस यह थी कि आज़ादी की यह संकल्पना आम लोगों के पल्ले नहीं पड़ती थी। ये महात्मा गाँधी जैसे प्रतिभाशाली व्यक्ति ही थे जिन्होंने अभिजात वर्ग के लक्ष्यों को ऐसे आसान मंत्र में गढ़ दिया कि वह हर किसी को समझ आ सके। प्रत्येक व्यक्ति को उन्होंने एक सरल सस्ता हथियार दिया, अहिंसात्मक अवज्ञा, जिससे स्वतंत्रता

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