क्यों बचे रहें मंत्रीजी?

भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने वालों की सुरक्षा के लिए एक नए कानून का मसौदा (Whistleblower draft law) तैयार है. लेकिन बताया जा रहा है मंत्रीगण इससे मुक्त हैं...

हर दफ्तर में काम करने वाले अमूमन सभी लोग जानते हैं कि उन्हें किसकी बात कितनी सुननी है, कितना काम करना है, कब काम करना है और किसका काम करना है. अपने मामले में प्राकृतिक न्याय की हर कोई अपेक्षा करता है, लेकिन किसी दूसरे के साथ वह न्याय करें या न करें यह उनकी मर्जी या जरूरत से तय होता है.

वक्त से पहले और जरूरत से ज्यादा, जितनी जल्दी हो सके, पा लेने की चाह ने भारत के नागरिकों को उतना ईमानदार नहीं रखा जितना लॉर्ड मैकाले की भारत यात्रा के दौरान वे थे. मैकाले ने अपने देश लौट कर ब्रिटिश संसद में 2 फरवरी 1835 को दिए अपने भाषण में भारतीयों की ईमानदारी की भूरि-भूरि प्रशंसा की थी.

आज़ाद भारत में स्थितियां बदल गई हैं. एक अनुमान के मुताबिक भारत में 21 हजार करोड़ रु. का रिश्वत का कारोबार है. ट्रांसपैरेंसी इंडेक्स में 180 देशों की सूची में भारत का 85वां स्थान है. ईमानदारी सूचकांक में भारत का स्कोर 3.5 से गिर कर 3.41 हो गया है.

सरकारी दफ्तर में काम करवाने वाले लेन-देन की भाषा को न सिर्फ समझ गए हैं बल्कि इसे अपरिहार्य मान कर इसे अपनाने लगे हैं. कोई इस लेन-देन नहीं मानता. कहीं आप रूटीन काम के लिए “फीस” देते हैं तो कहीं मजबूरी में “चाय-पानी”. लेकिन यदि कोई इसके जरिये अपनी “सेटिंग” करना चाहता हैं तो “मिठाई का डिब्बा” “पेटी” या “खोखा” तक देने में ऐतराज नहीं होता, बस किसी तरह अपना काम निकलना चाहिए.

लेकिन कुछ लोग ऐसे हैं जो इस भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाते हैं. करीब 5 साल पहले राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण के इंजीनियर सत्येंद्र दुबे ने भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाई. सरकार इस “व्हिसलब्लोअर” की रक्षा करने में नाकामयाब रही.

अब बताया जा रहा है कि सरकार ने एक नए कानून का मसौदा (Whistleblower draft law) तैयार किया है जिसके तहत केंद्र सरकार के किसी अधिकारी या केंद्र सरकार के सहयोग से संचालित किसी दफ्तर के खिलाफ भ्रष्टाचार के विरुद्ध केंद्रीय सतकर्ता आयोग (सीवीसी) के पास शिकायत दर्ज करवाई जा सकती है. भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने वाले ऐसे व्यक्ति का नाम सीवीसी गोपनीय रख सकेगा, जांच के आदेश जारी कर सकेगा और जरूरत पड़ने पर शिकायतकर्ता को सुरक्षा मुहैया करवाएगा.

इस मसौदे में कुछ बड़ी खामियों को लेकर आवाजें उठने लगी हैं. मसलन, यह कानून महज सार्वजनिक क्षेत्र तक सीमित रहेगा और दूसरा इस कानून के तहत दर्ज शिकायत के दायरे में मंत्री नहीं आएंगे. सार्वजनिक क्षेत्र में सबसे बड़ा पद मंत्री का ही होता है. किसी भी सरकारी विभाग में निर्णय लेने की संपूर्ण प्रक्रिया में मंत्री की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण होती है. ऐसे में क्या मंत्रियों को भ्रष्टाचार विरोधी किसी भी कानून के दायरे से बाहर रखना उचित है? क्या आपको लगता है कि इस कानून के आने पर ज्यादा से ज्यादा लोग भय मुक्त हो कर भ्रष्टाचार के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद करेंगे? आपकी राय में इस दिशा में और क्या क़दम उठाए जा सकते हैं? क्या ऐसा कोई कानून कारगर होगा?

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