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अमेरिकी अर्थशास्त्री थॉमस सॉवेल के अनुसार, देश में आम चुनावों के लिए मतदान इनकम टैक्स जमा करने की अंतिम तिथि (अमेरिका के संदर्भ में 15 अप्रैल) के दूसरे दिन कराना चाहिए। यह उन गिने चुने तरीकों में से एक होगा जो सरकारों को अत्यधिक खर्चीला होने के प्रति हतोत्साहित करेगा..

एक खबरः भारत में व्यापार करना हुआ आसान बीबीसी हिंदी द्वारा इस मुद्दे पर प्रकाशित कार्टून असंगठित क्षेत्र के व्यवसायियों के साथ जारी ज्यादतियों को बेहद ही प्रभावी ढंग से व्याख्या करता है.. साभारः बीबीसी हिंदी
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- सरकार व शिक्षा विभाग पर स्कूलों के साथ भेदभाव का आरोप, प्रधानमंत्री व राज्य के मुख्यमंत्रियों को पत्र लिख मामले से कराया अवगत
- देशभर के 60,000 से अधिक स्कूलों के शैक्षणिक व गैर-शैक्षणिक कर्मचारियों ने शांतिपूर्ण तरीके से दर्ज कराया विरोध

"हम अर्थशास्त्री ज्यादा तो नहीं जानते, लेकिन हम ये अच्छी तरह जानते हैं कि किसी वस्तु का अभाव कैसे पैदा किया जाता है। उदाहरण के लिए, यदि आप टमाटर की कमी पैदा करना चाहते हैं तो सिर्फ एक ऐसा कानून बना दीजिए जिसके तहत कोई भी खुदरा व्यापारी टमाटर की कीमत 20 रूपए प्रति किलो की दर से अधिक नहीं वसूल सकेगा। तत्काल ही टमाटर की कमी पैदा हो जाएगा। ठीक ऐसी ही स्थिति तेल और गैस के साथ है।"
- मिल्टन फ्रीडमैन

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सरकारी नियंत्रण फर्जीवाड़े़ और काला बाजारी को बढ़ावा देता है। यह सत्य का दमन करता है और वस्तुओं की गहन कृत्रिम कमी पैदा करता है। यह लोगों को कहीं का नहीं छोड़ता है और उन्हें उपक्रमण से वंचित करता है। यह लोगों को स्वावलंबी होने के गुणों का नाश करता है। जाहिर तौर पर, सरकार की बढ़ती शक्तियां मुझे भयभीत करती है। भले ही यह लोगों को शोषित होने से बचाकर यह अच्छा काम करती है, लेकिन व्यैक्तिकता (निजी), जो कि सभी उन्नतियों के हृदय में वास करती है, को नष्ट कर यह मानवता को भीषण हानि पहुंचाती है.. : महात्मा गांधी

 शिक्षा का अधिकार कानून (आरटीई) लाकर बच्चों की पहुंच स्कूल तक तो हो गई लेकिन शिक्षा तक उनकी पहुंच अब भी नहीं हो पायी है। आरटीई में शिक्षा के लिए इनपुट के नॉर्म्स तो तय किए गए हैं लेकिन लर्निग आउटकम की बात नहीं की गई है। अध्यापकों की जो थोड़ी बहुत जवाबदेही सतत एवं समग्र मूल्यांकन (सीसीई) और नो डिटेंशन के प्रावधान के माध्यम से थी उसको भी हटाया जा रहा है। सीखने की सारी जिम्मेदारी व जवाबदेही बच्चों पर वापस डाली जा रही है। तमाम सरकारी व गैरसरकारी अध्ययन भी यह बताते हैं कि बड़ी तादात में अध्यापक स्कूलों में गैरहाजिर रहते हैं। यदि स्कूल आते भी

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"हम अर्थशास्त्री ज्यादा तो नहीं जानते, लेकिन हम ये अच्छी तरह जानते हैं कि किसी वस्तु का अभाव कैसे पैदा किया जाता है। उदाहरण के लिए, यदि आप टमाटर की कमी पैदा करना चाहते हैं तो सिर्फ एक ऐसा कानून बना दीजिए जिसके तहत कोई भी खुदरा व्यापारी टमाटर की कीमत 20 रूपए प्रति किलो की दर से अधिक नहीं वसूल सकेगा। तत्काल ही टमाटर की कमी पैदा हो जाएगा। ठीक ऐसी ही स्थिति तेल और गैस के साथ है।"
- मिल्टन फ्रीडमैन

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केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (सीबीएफसी) और विवादों का चोली दामन का साथ रहा है। वर्ष 1952 में अपनी स्थापना के बाद से ही सीबीएफसी का नाम अक्सर किसी न किसी विवाद से जुड़ता ही रहा है। विवाद की स्थिति कभी किसी राजनैतिक दल से करीबी रिश्ता रखने वालों को बोर्ड का प्रमुख बनाए जाने के कारण तो कभी किसी फिल्म/दृश्य को प्रसारित किए जाने की अनुमति देने अथवा न देने के कारण पैदा होती रही है। कभी किसी सीईओ के रिश्वत लेकर फिल्मों के प्रसारण की अनुमति देने के कारण तो कभी किसी फिल्म को प्रसारण की अनुमति न देने के कारण। कभी एक फिल्म में 21 कट्स लगाने का आदेश देने

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