बिबेक देबरॉय

डेली स्कूल ऑफ़ इकोनोमिक्स और कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से पढ़े प्रसिद्ध अर्थशास्त्री बिबेक देबरॉय नई दिल्ली स्थित सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च में प्रोफेसर हैं. वे इंटरनैशनल मैनेजमेंट इंस्टिट्यूट में भी पढ़ाते हैं और अनेकों पुस्तक, पेपर व कॉलम लिख चुके हैं.

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वर्ल्ड बैंक ने सोमवार को इज ऑफ डूइंग बिजनेस यानी व्यापार सुगमता सूचकांक पर रिपोर्ट जारी की़। रिपोर्ट के मुताबिक उद्योग-व्यवसाय के लिहाज से सुगमता वाले राज्यों की सूची में गुजरात शीर्ष पर है, जबकि आंध्र प्रदेश दूसरे स्थान पर, झारखंड तीसरे, तो छत्तीसगढ़ चौथे स्थान पर है़। यानी इन राज्यों में उद्योग-व्यवसाय लगाना-चलाना सबसे आसान है। रिपोर्ट में प बंगाल को 11 वां, तो बिहार को 21 वां स्थान मिला है़ इज ऑफ डूइंग बिजनेस के मामले में दिल्ली, पंजाब, केरल और गोवा फिसड्डी साबित हुए हैं।
 
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बिबेक देबरॉय

असमानता को लेकर हमें अपना नजरिया साफ करने और पाखंड से दूर रहने की जरूरत है।  गरीबी एक निरपेक्ष धारणा है, जबकि असमानता सापेक्ष। गरीबी को घटाना वांछनीय है। लेकिन असमानता में कमी लाना एक स्वयंसिद्ध उद्देश्य नहीं है। ऐसी धारणा है कि बढ़ती असमानता, चाहे वह असल हो या काल्पनिक, बुरी होती है।

बीते साल शंकर आचार्य और राकेश मोहन ने मोंटेक सिंह अहलूवालिया के सम्मान में एक पुस्तक का संपादन किया था। इस किताब में स्वर्गीय सुरेश तेंदुलकर का असमानता पर एक लेख था। इस लेख में बैंकाक में हुए एक सम्मेलन के बेहद रोचक किस्से का जिक्र था। उस वक्त मनमोहन सिंह योजना आयोग के उपाध्यक्ष हुआ करते थे।

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एलपीजी के कई मायने निकलते हैं। यह लिक्विफाइड पेट्रोलियम गैस भी हो सकता है और लिबरलाइजेशन, प्राइवेटाइजेशन एवं ग्लोबलाइजेशन (उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण) भी, जिसकी अक्सर वाम झुकाव वाले आलोचना करते हैं। इसका एक मतलब सरकार द्वारा आम लोगों की जिंदगी पर डाले गए डाके (लाइफ प्लंडर्ड बाइ गवर्नमेंट) से भी है, जो सरकारी हस्तक्षेप विरोधी भावनाओं से जुड़ा हुआ है। यह एहसास तथाकथित मध्यवर्ग में लगातार बढ़ रहा है। इसकी वजह पेट्रोलियम उत्पादों की बढ़ती कीमतें व इनमें और वृद्धि का प्रस्ताव है।
असल में, पेट्रो उत्पादों में मूल्यवृद्धि जरूरी हो गई थी, क्योंकि वित्तीय सब्सिडी का बोझ बर्दाश्त से बाहर जाने लगा था। इसे सरकार तेल मार्केटिंग कंपनियों के घाटे की भरपाई के लिए दे रही थी, जो रुपये में कमजोरी के कारण और बढ़ गया। लेकिन यह कुतर्क है। दरअसल, अगर इसकी तुलना उस सार्वजनिक खर्च से की जाए, जिसे सरकार बेहिसाब लुटाती है, तो ये सब्सिडी ऊंट के मुंह में जीरे सी दिखेगी। इसे इस क्षेत्र में रोके गए निवेश का खास कारण नहीं माना जा सकता। ये निवेश कई अन्य वजहों से अटका है।

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जमीन हमेशा ही विवादों का कारण रही है। शहरीकरण, गैर-कृषि कार्यों के लिए जमीन की बढ़ती मांग, छोटे जमीन मालिकों में कुशलता का अभाव व रोजगार की कमी से विवाद की वजह को समझा जा सकता है। पश्चिमी यूरोप, खास तौर पर ब्रिटेन और इससे भी बढ़कर इंग्लैंड में औद्योगिक क्रांति से पहले ही जमीन के बाजार को मुक्त कर दिया गया था और शिक्षा तथा तकनीकी कौशल की पहुंच बढ़ गई थी। हमने ऐसे सुधार नहीं लागू किए जो लोगों को कृषि कार्य से बाहर निकलने या कृषि में ही कुछ नया कर सकने में समर्थ बना सके।

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बिबेक देबरॉय

नंदन नीलेकणी की अगुआई में सशर्त नकद हस्तांतरण (कंडीशनल कैश ट्रांसफर या सीसीटी ) के लिए एक मंत्रीस्तरीय टास्क फोर्स का गठन किया गया है, जो मुख्य तौर पर केरोसिन, एलपीजी (रसोई गैस) और खाद में सीसीटी आजमाने पर विचार करेगा। अगले चार महीनों में हमारे सामने एक योजना होगी। इस वित्त वर्ष के अंत तक प्रायोगिक स्तर पर आरंभिक परीक्षण शुरू हो जाएगा और फिर 2012-13 के बजट में इसे पूरी तरह लागू कर दिया जाएगा। कुछ इसी हिसाब से काम के आगे बढ़ने की उमीद की जानी चाहिए।

यहां टास्क फोर्स जैसे शब्द का इस्तेमाल एक मायने में रोचक है। टास्क फोर्स मूल रूप से सैन्य शब्दावली का हिस्सा है। लेकिन सब्सिडी को लक्षित करने के लिए सैन्य या तकनीकी जैसी कोई समस्या नहीं है। ये एक टास्क (करने योग्य कार्य) जरूर है, क्योंकि अब मौजूदा सब्सिडी प्रक्रिया की खामियों को स्थापित करने के लिए किसी नए शोध की जरूरत नहीं रह गई है। लेकिन क्या इन सब्सिडी को लक्षित करने के लिए हमारे पास समुचित फोर्स (बल) भी है?

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बिबेक देबरॉय

माओवादी हिंसा से जुड़ी खबरों को लेकर बहुत चिंतित ना हों। झारखंड सरकार और वहां के लोग आगे बढ़ने को तत्पर हैं और पूरी संभावना है कि राज्य 10 फीसदी की विकास दर हासिल कर ले।

पिछले कुछ महीनों के दौरान मैंने अपना काफी समय झारखंड में बिताया है। इस दौरान मैं वहां नए साल के जश्न में भी शरीक हुआ। झारखंड का मतलब रांची, धनबाद, बोकारो या जमशेदपुर ही नहीं है। मैंने सड़क और रेल मार्ग के जरिए खूंटी, गुमला, लोहरदग्गा, लातेहर, पलामू, पश्चिमी सिंहभूम, देवघर, दुमका और पाकुर की यात्रा की। जो लोग झारखंड से भली-भांति परिचित नहीं है उनके लिए इनमें से कुछ नाम अनजाने लग सकते हैं। ये झारखंड के 24 जिलों में से कुछ के नाम हैं। यहां के 18 जिले वामपंथी उग्रवाद या माओवाद के गढ़ के तौर पर देखे जाते हैं।

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बिबेक देबरॉय