हमारे दोहरे मानदंडों का सच

हमारी संस्कृति की अनेक खूबियों में से एक है उसका उदारवाद। हमारे ग्रंथों ने हमें सभी लैंगिक समूहों और उनकी यौन अभिरुचियों का सम्मान करने की सीख भी दी है, फिर चाहे वे हमसे भिन्न ही क्यों न हों। लेकिन इसके बावजूद आज भी हम भिन्न यौन अभिरुचियों वाले व्यक्तियों के प्रति पर्याप्त उदार और सहिष्णु नहीं हो पाते। उभयलिंगियों को तो हमने हाशिये का उपेक्षित समुदाय बना डाला है। बर्बर देशों की तरह हम 'व्यभिचारियों' को पत्थर मार-मारकर मार तो नहीं डालते, लेकिन एक तरह से उनका सामाजिक बहिष्कार जरूर कर देते हैं। उन्हें अन्य तरीकों से यंत्रणा दी जाती है और वे हमारी घृणा और हिकारत का विषय बन जाते हैं। देह व्यापार करने वाली नगरवधुएं भी वंचितों की इसी श्रेणी में आती हैं।

यही कारण है कि आज भी किसी महिला के लिए सबसे बड़ा लांछन यही है कि उसे व्यभिचारिणी या नगरवधू कहकर पुकारा जाए। आज भी किसी पुरुष के लिए सबसे बड़ा लांछन यही माना जाता है कि उसकी मां या बहन को चरित्रहीन कहकर बुलाया जाए। दोनों ही स्थितियों में प्रश्नचिह्न स्त्री के सम्मान पर ही लगाया जाता है। जबकि लगभग सभी वर्ग-समूहों में इस तरह की महिलाओं ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। पवित्र ग्रंथों में कई नगरवधुओं का उल्लेख किया गया है और उनके त्याग की सराहना की गई है। फिर आज हम उनसे घृणा क्यों करते हैं? उन्हें अपराधी क्यों मानते हैं? आखिर उनका अपराध क्या है?

पिछले हफ्ते एक तमिल सिने तारिका को पुणे की एक पांच सितारा होटल से कथित रूप से वेश्यावृत्ति के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया। अखबारों में खुलेआम उसका नाम उछाला गया और उसके द्वारा अभिनीत फिल्मों की सूची भी प्रकाशित की गई। मुझे नहीं पता कि उसके अपराध की खबर सच है या मनगढ़ंत, लेकिन इतना जरूर तय है कि इसी के साथ उसके अभिनय कॅरियर का अंत हो गया है। भले ही उस पर लगे आरोपों की पुष्टि कभी न हो पाए, जैसा कि इस तरह के मामलों में अक्सर होता है, लेकिन सजा तो उसे पहले ही मिल चुकी है। लगता नहीं कि वह अपना आत्मसम्मान फिर हासिल कर सकेगी।

हमारे इस रवैए और नजरिए की क्या वजह है? कुछ साल पहले गृह मंत्री ने मुंबई के सभी डांस बार बंद करवा दिए थे और ७५ हजार युवा महिलाओं के सामने रोजी-रोटी का संकट पैदा हो गया था। इन बार डांसर्स के लिए अभद्र विशेषणों का भी प्रयोग किया गया। हो सकता है कि इनमें से कुछ बार डांसर्स देह व्यापार में लिप्त हों, लेकिन यह भी इतना ही सच है कि सभी इस तरह की नहीं हैं। यह उनके विरुद्ध एक अन्यायपूर्ण सामान्यीकरण है। अमेरिका की श्रेष्ठ स्कॉलर्स में से एक ने मुझे बताया था कि वे खुद इन बार डांसर्स के बीच जाकर उनके साथ थोड़ा समय बिता चुकी हैं और उन्होंने उनके साथ डांस भी किया है। ऐसा करने के पीछे यही कारण था कि वे जानना चाहती थीं कि इन लड़कियों को किन स्थितियों में अपना जीवन बिताना पड़ता है। उन्होंने मुझे अपनी दोस्तों से मिलवाया। वे अद्भुत थीं। उनमें से कुछ तो प्रतिभाशाली अभिनेत्रियां थीं, जिन्हें काम नहीं मिल पा रहा था। कुछ ऐसी थीं, जो कुछ समय के लिए बेकार थीं। एक कविताएं लिखती थी और एक तो ऐसी भी थी, जो ठुमरी सीख रही थी और क्लासेस अटेंड कर पाने के लिए यह काम कर रही थी।

मुझे लगता है कि इस तरह की महिलाओं के प्रति समाज की और खासतौर पर पुरुषों की घृणा का कारण उनकी एक ग्रंथि है। उन्हें लगता है कि वे उन पर अपनी मिल्कियत नहीं जता सकते। ये महिलाएं आत्मनिर्भर होती हैं। वे किसी की ऋणी नहीं होतीं, इसलिए उन पर किसी का पूर्ण आधिपत्य भी नहीं हो सकता। इतिहास गवाह है कि महिलाओं की खरीद-फरोख्त की जाती रही है। उन्हें जानवरों और गुलामों की तरह खरीदा-बेचा जाता रहा है। सम्राट अपनी पत्नियों को जुए में दांव पर लगाते रहे हैं। वे अपनी बेटियों का विवाह किसी दूरस्थ देश में स्थित अजनबी सम्राटों से केवल इसीलिए करते रहते हैं कि इससे उन्हें अपने साम्राज्य या व्यवसाय का विस्तार करने का मौका मिलेगा। लेकिन हमारे समय की ये महिलाएं चूंकि किसी की दासी नहीं होतीं और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होती हैं, इसलिए उन्हें घृणित अपराधी माना जाता है। उन्हें सताया जाता है और उनका सामाजिक बहिष्कार कर दिया जाता है।

जबकि मजे की बात है कि आज लगभग हर क्षेत्र में महिलाओं की दैहिक अपील का दोहन किया जाता है, फिर चाहे वह रियल लाइफ हो या रील लाइफ। विज्ञापन देख लीजिए। उत्पाद कोई भी हो, लेकिन उसकी मार्केट वेल्यू बढ़ाने के लिए महिलाओं का इस्तेमाल किया जाता है। हम उनका शोषण करने में कतई शर्मिंदा नहीं होते, लेिन जब वे अपनी उसी दैहिक अपील के चलते खुद आत्मनिर्भर बन जाती हैं, तो हम उनसे घृणा करते हैं। यह पुरुषों की लंपट प्रवृत्ति ही है, जिसने महिलाओं को शीला और मुन्नी बनाया है। हम ऐसे आइटम नंबर देखकर तो बहुत खुश होते हैं, लेकिन एक बार भी उनके पीछे छिपी सच्चाई के बारे में गंभीरता से नहीं सोचते।

आर्थिक लेनदेन की दहेज जैसी कुरीतियों पर कितना ही अंकुश क्यों न लगा दिया गया हो, लेकिन आर्थिक लेनदेन के आधार पर दो व्यक्तियों के आपसी संबंधों का सच किसी से छुपा नहीं है। विवाह पूर्व अनुबंध, जिन्हें प्री-नप्चियल कहा जाता है, आजकल जोरों से चलन में हैं और देखा जाए तो यह गलत भी नहीं है, बशर्ते हम पाखंडी होने का प्रयास न करें। बड़ी विचित्र बात है कि जलेबी बाई जैसे गीतों पर यदि कोई फिल्म स्टार किसी पांच सितारा होटल में आयोजित पार्टी में नृत्य करती है तो उसे लाखों रुपए दिए जाते हैं, जबकि इससे कहीं कम पैसों में यही काम कर रही बार डांसर को गिरफ्तार कर लिया जाता है। एक तरफ स्टारडम की चमक-दमक है तो दूसरी तरफ जीवन की विवशताएं। लेकिन इन दोनों के प्रति हमारा अलग-अलग रवैया हमारा दोहरा मानदंड नहीं तो और क्या है? मुझे लगता है कि यह एक नए किस्म की वर्ग व्यवस्था है, जो तेजी से विकसित हो रही है।

साभार - दैनिक भाष्कर (प्रीतीश नंदी)

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