स्कूली शिक्षा की बेहतरी के लिए तटस्थ नियामक जरूरी

दो दशक पूर्व लाइसेंस, परमिट, कोटा आधारित प्रशासनिक व्यवस्था के दौर में जब अधिकांश सेवा प्रदाता कंपनियां सार्वजनिक क्षेत्र की यानि सरकारी हुआ करती थीं तब उपभोक्ताओं के लिए उन सेवाओं को हासिल करना टेढ़ी खीर हुआ करती थीं। बात चाहे हवाई जहाज की यात्रा करने की हो या टेलीफोन कनेक्शन लेने की, ऐसी सेवाएं लग्जरी की श्रेणी में शामिल हुआ करतीं थीं और स्टेटस सिंबल के तौर पर जानी जाती थीं और मध्यवर्ग के लिए ऐसा कर पाना किसी बड़े सपने के पूरा होने से कम नहीं हुआ करता था। इसके अलावा सेवा की गुणवत्ता की बात करना तो जैसे दूसरी दुनियां की बात थी। लेकिन आज परिस्थितियां बिल्कुल अलग हैं। रेल यात्रा के खर्च में हवाई यात्रा की जा सकती है और अब यह आम आदमी के पहुंच में है। हवाई यात्रा करने वालों की संख्या भी तेजी से बढ़ी है। उधर, देश में टेलीफोन और मोबाइल ग्राहकों की संख्या भी 80 करोड़ के आसपास पहुंच चुकी है।

दरअसल, आज विमानन और दूरसंचार दोनों ही क्षेत्र में सरकारी और निजी सेक्टर सेवा प्रदान करने को स्वतंत्र हैं। स्थिति यह है कि हवाई सेवा के लिए अब सरकारी कंपनी एयर इंडिया को दूसरी निजी कंपनियों से कड़ी टक्कर मिल रही है इसलिए उसे भी अपने एकाधिकार के दौर वाली सहूलियतों में विस्तार और सुधार करना पड़ रहा है। इसी तरह मोबाइल और फोन सेवा देने वाली निजी कंपनियों के बीच बीएसएनएल और एमटीएनएल भी हैं। अगर उन्हें निजी कंपनियों की चुनौती से निबटना है और अपने ग्राहकों के बीच अपनी साख बनाए रखनी है तो उन्हें भी अपनी सेवाएं, सहूलियतें आदि सुधारनी ही पड़ेंगी। सरकारी और निजी कंपनियों के बीच स्वस्थ प्रतिस्पर्धा हो और ग्राहकों के साथ अन्याय न हो सके इसकी देखरेख करने, दिशा-निर्देश बनाने आदि और अंदरूनी विवाद के लिए स्वतंत्र रेग्युलेटरी अथॉरिटी बनाई गई हैं। निश्चित तौर पर इसका फायदा ग्राहकों को ही मिल रहा है।

अब जरा स्कूली शिक्षा को देखिए। यहां भी निजी और सरकारी दोनों तरह के सेवा प्रदाता हैं। वैसे भारत जैसे देश में शिक्षा को पेशा और धंधा मानना शर्म और हेठी की बात माना जाता है। शिक्षा क्षेत्र को गैर मुनाफा कमाने वाले सेक्टर के तौर पर वर्णित किया जाता है जिसमें स्वार्थ की गुंजाइश नहीं हो। प्राचीन काल से लेकर उन्नीसवीं सदी के आखिर तक शिक्षा बेशक दूसरे पेशों के मुताबिक नहीं थी। लेकिन उसके बाद से क्रमश: यह व्यवस्था दूसरे धंधों की तरह ही आगे बढ़ी है और आज तो कम से कम निजी तौर पर यह अच्छी और कमाई वाली धंधा बन ही गई है। अब सवाल यह है कि जब शिक्षा भी धंधा बन गई है तो इस व्यवस्था को रेग्युलेट करने के लिए अलग अलग व तटस्थ रेग्युलेटर का गठन क्यों नहीं हो रहा है? आखिर निजी और सरकारी शिक्षा के लिए अलग-अलग मानदंड क्यों रखे जा रहे हैं? देश में स्कूली शिक्षा में आज भी सरकार सेवा प्रदाता भी है, सरकार रेग्युलेटर भी है और सरकार दंड नियामक संस्था भी है। उसने निजी स्कूलों के लिए तमाम तरह के मानदंड बना रखें हैं। स्कूल खोलने या चलाने और अच्छी और गुणवत्ता युक्त स्कूली शिक्षा देने के लिए ये मानदंड जरूरी भी हैं। स्कूल खोलने और चलाने के लिए इन मानदंडों को पूरा करना जरूरी होता है। लेकिन यह मानदंड सिर्फ निजी स्कूलों पर ही लागू होते हैं। यदि राजनीतिक कारणों या जरूरत के मुताबिक कहीं स्कूल खोलना होता है तो सरकारी तंत्र या विभाग सिर्फ एक घोषणा करते हैं और स्कूल शुरू हो जाता है। मानदंड बाद में पूरे किए जाते हैं। इससे स्वस्थ प्रतिस्पर्धा के प्राकृतिक सिद्धांत का हनन होता है। 

सरकारी तौर पर स्कूल तो शुरू हो जाते हैं, उनमें कामकाज भी शुरू हो जाता है, लेकिन वे बेहतर शैक्षिक माहौल नहीं दे पाते। चूंकि सरकारी शिक्षा को तकरीबन मुफ्त माना जाता है, इसलिए वहां खराब पढ़ाई भी हो या विद्यार्थियों का शैक्षिक माहौल बेहतर ना भी हो तो किसी की सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ता। स्कूली शिक्षा में फंड देने वाली भी सरकार ही है, व्यवस्था बनाने का काम भी सरकार के ही जिम्मे है और नियम भी वही बनाती है। नीतियां तो बनाना खैर उसका काम है ही। लेकिन अब मांग उठने लगी है कि स्कूली शिक्षा के लिए भी अलग अलग व तटस्थ रेग्युलेटर नियुक्त किया जाए जो कि राजनैतिक हस्तक्षेप से स्वतंत्र हों, ठीक टेलीकॉम रेग्युलेटरी अथॉरिटी (ट्राइ) की तरह। व्यवस्था बनाने, मानदंड तय करने के लिए अलग रेग्युलेटर हों तो पाठ्यक्रम तय करने के लिए अलग रेग्युलेटर होना चाहिए। इसी तरह पढ़ाई पर निगाह रखने के लिए भी रेग्युलेटर होना चाहिए। ताकि शिक्षा की गुणवत्ता को लेकर बच्चों के माता-पिता शिकायत कर सकें। 

केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड यानी सीबीएसई के गठन का प्राथमिक उद्देश्य परीक्षा कराना और सर्टिफिकेशन था। चूंकि उसे परीक्षा लेनी है, इसलिए पाठ्यक्रम तय करने की उसकी भूमिका को भी स्वीकार किया जा सकता है। लेकिन अब वही स्कूल खोलने के लिए जरूरी मानदंड तय करने और उन आधारों की जांच पर अनुमति देने का काम भी कर रहा है। इससे उसका वह मूल काम प्रभावित हो रहा है, जिसके लिए उसका गठन हुआ है। इसलिए जरूरी है कि पाठ्यक्रम तय करने के लिए अलग से संस्था का गठन हो और शैक्षिक गुणवत्ता की निगरानी के लिए अलग से रेग्युलेटर हो। ताकि सरकारी और निजी स्कूलों में स्वस्थ प्रतिस्पर्धा हो और वे स्कूली शिक्षा की गुणवत्ता को बढ़ाने में मददगार साबित हो सकें। अब सवाल उठता है कि भारत जैसे देश में जहां गरीबी और असमानता अब भी ज्यादा है। खासकर देहाती, दूरदराज के इलाकों और आदिवासी क्षेत्रों में यह असमानता कहीं ज्यादा है। अगर स्वस्थ प्रतिस्पर्धा के सिद्धांत को लागू किया जाएगा तो आदिवासी, पिछड़े और देहाती क्षेत्रों में स्कूली शिक्षा के लिए कौन आगे आएगा। वैसे भी वहां से मुनाफा मिलने से रहा। इस तर्क का जवाब यह हो सकता है कि उन इलाकों के लिए सरकार को रेग्युलेटरी अथॉरिटी से राहत मिले और नीतिगत रूप से उन इलाकों में स्कूली शिक्षा मुहैया कराने के लिए जवाबदेह बनाया जाए। वैसे भी शिक्षा अब मूल अधिकारों में शामिल हो गई है। फिर वह संविधान की समवर्ती सूची का विषय है। इसलिए राज्य और केंद्र दोनों की जिम्मेदारी हर बच्चे को शिक्षा मुहैया कराना है। अगर रेग्युलेटर का गठन होता है तो राज्य को अपने दायित्व निर्वाह के तहत देहाती और पिछड़े इलाके में भी गुणवत्ता युक्त शिक्षा मुहैया कराने के लिए बाध्य होना पड़ेगा।

- उमेश चतुर्वेदी (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। लेख में वर्णित विचार उनके निजी हैं।)

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