एन इंट्रोडक्शन टू ऑस्ट्रियन इकोनॉमिक्स

19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में पश्चिमी यूरोप में आर्थिक विचारों के दो विरोधी संप्रदायों- जर्मन ऐतिहासिक संप्रदाय और ऑस्ट्रियन संप्रदाय का जन्म हुआ। जर्मन ऐतिहासिक संप्रदाय ने आर्थिक इतिहास की सहायता से आर्थिक सच्चाई को जानने का प्रयास किया। प्रारंभिक ऑस्ट्रियन विचारकों ने 1883 में जर्मन संप्रदाय द्वारा विकसित अनुभवाश्रित पद्धति को अपनी आलोचना का केंद्र बनाया। इनका मत था कि आर्थिक ज्ञान इतिहास के अध्ययन से नहीं बल्कि सैद्धांतिक विश्लेषण से उत्पन्न होता है। पद्धति को लेकर उत्पन्न हुआ विवाद दो दशकों से अधिक समय तक बना रहा। ऑस्ट्रियन संप्रदाय के विचारों का उल्लेख करने वाले थॉमस सी. टेलर के मोनोग्राफ "एन इंट्रोडक्शन टू ऑस्ट्रियन इकोनॉमिक्स" के कुछ अध्याय यहां सिलसिलेवार ढंग से पेश किए जाएंगे, जिनके जरिये आपको इस संप्रदाय के विचारों से रू-ब-रू होने का मौका मिल सकेगा। पेश है पहली कड़ी:

मूल्य का विषयगत सिद्धांत

1. संतुष्टि और मूल्यन
बाजार अर्थव्यवस्था में होने वाली सभी आर्थिक क्रियाओं की व्याख्या अंतिम तौर पर मूल्य के विषयगत सिद्धांत पर टिकी हुई है। विभिन्न उपभोक्ता वस्तुओं और सेवाओं का मूल्य वस्तुगत और मूलभूत रूप से स्वयं वस्तुओं में विद्यमान नहीं होताष यह व्यक्ति द्वारा किए गए मूल्यांकन में होता है। यह मूल्यांकन एक विषयगत मामला है जिसके वह वस्तुगत रूप में अथवा माप के रूप में नहीं ले सकता। मूल्यन के अंतर्गत उपलब्ध वैकल्पिक वस्तुओं में बढ़ोतरी की तुलना में एक वस्तु में वृद्धि को अधिमानता दी जाती है। मूल्यन का परिणाम विभिन्न वस्तुओं और सेवाओं की निश्चित मात्रा को एक निश्चित क्रम में रखने से है। मानवीय मूल्यन की प्रकृति की व्याख्या करने और समझने के लिए सिद्धांत मूल्य के पैमाने के परिकल्पित विचार का सहारा लेती है। वैकल्पिक साधनों के क्रम का निर्धारण व्यक्ति की संतुष्टि की प्रत्याशा पर निर्भर करता है। एक व्यक्ति उस विकल्प का चयन करेगा जिसके बारे में उसका विश्वास है कि वह उसे अधिकतम संतुष्टि प्रदान करेगा।

मूल्यन की वस्तुनिष्ठता संतुष्टि की प्रकृति पर निर्भर करती है। संतुष्टि विषयगत होती है और इसे अंकात्मक रूप से मापा नहीं जा सकता। कोई वस्तु किस सीमा तक संतुष्टि प्रदान करती है, वह व्यक्ति की इच्छा पर निर्भर करता है। व्यक्ति की विभिन्न वस्तुओं और सेवाओं से संतुष्टि एक समान नहीं होती। अनुभव से यह पता चलता है कि व्यक्ति की अधिमानताओं में समय में परिवर्तन के साथ बदलाव होता रहता है। उसकी वैकल्पिक रूचि के क्रम में किसी भी क्षण में परिवर्तन हो सकता है। व्यक्ति के मूल्यों का पैमाना भी बढ़ोतरी या घटोतरी से भी बदल सकता है।

एक व्यक्ति से मूल्यन के विषय को जोड़ने का अर्थ यहां यह समझना नहीं है कि प्रत्येक व्यक्ति का संबंध केवल उसकी अपनी आवश्यकताओं की संतुष्टि से ही होता है। एक व्यक्ति अन्य व्यक्तियों की सहायता करने में संतुष्टि प्राप्त कर सकता है। संतुष्टि प्रायः स्वार्थहीन और स्वार्थी होने से भी प्राप्त हो सकती है। लेकिन जो बात रह जाती है वह यह है कि संतुष्टि चाहे किसी भी प्रकार की हो, प्रत्येक चयन, व्यक्ति (जो चुनाव कर रहा है) के विषयगत मूल्यन पर निर्भर करता है। वह अपने दिमाग से इस चिंता को भगाना चाहता है कि क्या यह चिंता उसकी अपनी तात्कालिक समस्या से या किसी अन्य की समस्या से जुड़ी हुई है। उसका चयन इस अधिमानता से निकलता है कि उसे किसी अन्य समस्या के स्थान पर एक विशिष्ट चिंता को दूर करना है ताकि वह अपना ध्यान केंद्रित कर सके। 

जारी है..

- आजादी.मी

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