सुधारों के बलबूते सेंसेक्स @20,000!

नई दिल्ली : आर्थिक सर्वेक्षण में अनुमान जताया गया है कि अगर वैश्विक अर्थव्यवस्था अक्टूबर महीने तक सुधरने लगती है, तो भारत की सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) वृद्धि दर 7.75 फीसदी तक पहुंच सकती है और अगर ऐसा नहीं हुआ, तो भी इसमें 6.25 फीसदी की वृद्धि तो दर्ज की ही जाएगी। विदेशी निवेश के मोर्चे पर भरोसा जताते हुए सर्वेक्षण में कहा गया है कि चालू खाता सरप्लस जीडीपी का 2.8 फीसदी रहने का अनुमान है, जबकि 2008-09 में भारत में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) का प्रवाह 46.5 अरब डॉलर रहने का अनुमान जताया गया है। इस दस्तावेज में सुझाव दिया गया है कि सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम में विनिवेश से सरकार हर साल करीब 25,000 करोड़ रुपए जुटा सकती है। वित्त सचिव अशोक चावला ने संवाददाताओं को बताया कि एसेट बेचने से जुड़ी योजना का ब्योरा वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी 31 मार्च, 2010 तक का बजट पेश करते वक्त घोषित करेंगे। आथिर्क सर्वेक्षण में (कॉरपोरेट डिविडेंड टैक्स के बजाय) डिविडेंड पर टैक्स दोबारा लगाने की सलाह दी गई है। अगर इसे लागू किया जाता है तो जो लखपति अब तक डिविडेंड पर कोई टैक्स नहीं चुका रहे, उन्हें काफी ऊंची दर पर कर भरना होगा। सर्वेक्षण में दावा किया गया है कि वैश्विक स्तर पर प्रतिकूल हालात के बावजूद ऊंची बचत और निवेश दर, ग्रामीण समृद्धि और सर्विस निर्यात ने अर्थव्यवस्था की रफ्तार कायम रखने में अहम भूमिका अदा की है। इसका फोकस मंदी के बाद की राजकोषीय और मौद्रिक राहत उलटने की रणनीति की तुलना में नए आर्थिक राहत पैकेज की जरूरत पर कम है और संभवत: 2010-11 तक एफआरबीएम लक्ष्यों की वापसी की जरूरत पर जोर देने वाला है। आर्थिक सुधारों के दर्जनों सुझावों से अटा पड़ा यह सर्वेक्षण सोनिया-प्रणव मुखर्जी के बजाय मोंटेक-वीरमानी का दस्तावेज ज्यादा मालूम दे रहा है। यह नेताओं की राजनीति की तुलना में टेक्नोक्रेट के सुधारवाद की सोच को रेखांकित कर रहा है। एक वक्त था, जब आर्थिक सर्वेक्षण को सरकार के मंसूबों का दस्तावेज समझा जाता था। लेकिन इस दफा इसे टेक्नोक्रेट की निराशा के घोषणापत्र के तौर पर देखा जा रहा है, जिसमें ऐसे सुधारों की फेहरिस्त खींची गई है, जिन्हें लागू करने की तुरंत जरूरत है। हालांकि, उन्हें राजनीतिक स्वीकार्यता मिलने की कोई उम्मीद नहीं दिख रही। राजकोषीय मोर्चे पर प्रस्तावित सुधारों में साइक्लिकल एडजस्टेड शून्य घाटा लक्ष्य, एलपीजी उपभोग को 6-8 सिलेंडर प्रतिवर्ष तक सीमित करना, पेट्रोल, डीजल, फटिर्लाइजर और चीनी उद्योगों को सरकारी नियंत्रण से बाहर ले जाना, उर्वरक कीमतों को मुक्त करना और इसके बजाय फर्टिलाइजर सब्सिडी सीधे किसानों को देना, 3जी स्पेक्ट्रम की नीलामी, टैक्स रियायतें खत्म करना और ऐसे शुल्क ढांचे की ओर बढ़ना शामिल जिसमें उल्टे कर ढांचे को खत्म किया जाए प्रमुख हैं। इसके अलावा सुधारों में कृषि वायदा पर लगी पाबंदी हटाना, हाजिर और वायदा मुद्रा बाजार को स्वतंत्रता देना, बाह्य वाणिज्यिक कर्ज जुटाने के अधिकारों की नीलामी, बैंकों में चरणबद्ध तरीके से एफडीआई सीमा लागू करना और वोटिंग के अधिकारों को हिस्सेदारी पर आधारित बनाना, कोयला खनन और परमाणु ऊर्जा में निजी क्षेत्र को दाखिल होने की इजाजत देना, खुली पहुंच के अधिकार देकर प्रतिस्पर्धी बिजली बाजार बनाना, बीमा क्षेत्र और रक्षा उद्योगों में में एफडीआई सीमा 51 फीसदी तक बढ़ाना, पुलिस, न्यायिक तथा प्रशासनिक सुधार लागू करना और ओवरटाइम समेत प्रतिदिन 12 घंटे काम करने की इजाजत देने के लिए श्रम कानूनों में संशोधन करना शामिल है। यह सुधारों का वह एजेंडा है, जिस अगर सरकार की ओर से संजीदगी से लिया गया तो सेंसेक्स 20,000 का आंकड़ा छू सकता है। वास्तव में गुरुवार को बाजार ने उछाल दिखाया भी, लेकिन कारोबारियों के यह महसूस करने पर वह नीचे आ गया कि आर्थिक सर्वेक्षण कुछ और नहीं टेक्नोक्रेट की चाहतों की सूची है और इसे सरकारी कदम उठाने का ब्लूप्रिंट माना जाना गलत होगा। सर्वेक्षण में इस बात का ब्योरा भी दिया गया है कि सरकार ने आम आदमी के लिए अब तक क्या किया है और वह क्या करना जारी रखेगी। 2008-09 में कृषि ऋण 23 फीसदी और औद्योगिक कर्ज 21.6 फीसदी बढ़ा है। ग्रामीण इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोग्राम भारत निर्माण को अंतरिम बजट 2009-10 में 40,900 करोड़ रुपए मुहैया कराए गए थे, जबकि इससे पिछले साल इसे 31,280 करोड़ रुपए की राशि दी गई थी। 2008-09 के दौरान राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कानून के तहत 4.47 करोड़ परिवारों को रोजगार मुहैया कराया गया। इससे पिछले वर्ष ऐसे परिवारों की तादाद 3.39 करोड़ थी। 2008-09 के दौरान खाद्य सब्सिडी 40 फीसदी बढ़कर 43,668 करोड़ रुपए पहुंच गई और खाद्य सुरक्षा अधिनियम के बनाए जाने और उसे लागू किए जाने पर यह और बढ़ सकती है। सर्वेक्षण में इस साल वैश्विक स्तर पर कम पैदावार की आशंका जताई गई है, जिससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कीमतें बढ़ सकती हैं और खाद्य सुरक्षा पर दबाव पड़ने का अनुमान है। इससे साफ होता है कि सरकार खाद्य निर्यात की इजाजत देने में सर्तकता बरत सकती है।
स्वामीनाथन अय्यर

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