सिलिकॉन वैली में भारतीयों की उन्नति और भारत उदय - कंवल रेखी

1993 में लेखक इन्फोसिस के संस्थापक नारायणमूर्ति के साथ

भारत और चीनः राहें जुदा-जुदा

इक्कीसवीं सदी के पहले दशक में भारत की तेज और एकाएक उन्नती ने पूरी दुनिया को चौंका दिया। अधिकांश लोगों को पिछले तीन दशकों में चीन की प्रगति ने अभिभूत कर रखा था। निर्यात के आंकड़ों, प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की बढ़ी मात्रा और उसके नए और आधुनिक ढांचे के कारण जहां चीन की तरक्की साफ तौर पर दिखाई पड़ती थी, वहीं भारत की तरक्की को देखना और समझ पाना मुश्किल था। उसके यहां प्रत्यक्ष विदेशी निवेश चीन की तुलना में एक दहाई से कम था और ऊपर से उसका आधारभूत ढांचा भी काफी जर्जर, पुराना और अपर्याप्त था। चीन की कार्यकुशल और उद्देश्यपूर्ण सरकार का पूरा ध्यान आर्थिक और सैन्य ढांचे को मजबूत कर अपनी बड़ी आबादी को गरीबी से बाहर निकालने पर था।

चीन में उसके लक्ष्यों और प्राथमिकताओं को लेकर सर्वसम्मति का माहौल था। दूसरी ओर, भारत में माहौल काफी अव्यवस्थित था और सरकार और उनकी प्राथमिकताओं के बदलते रहने से यहां का लोकतंत्र जड़ सा दिखाई देता था। भारत जहां लड़खड़ाता हुआ बिना किसी तैयारी के चलता दिख रहा था, वहीं चीन तेजी से कदम उठाता दिखता था। इन सब बातों के बाद भी आज भारत की तरक्की साफ तौर पर देखी जा सकती है। ऐसा लगता है कि एक ही मुकाम की ओर बढ़ते भारत और चीन ने इसके लिए अलग-अलग रास्तों का चयन किया है। चीन ने जहां अनुशासित शीर्ष टेक्नोक्रेट्स को ऊपर से नीचे तक तरक्की के लिए खुली छूट दे रखी है तो भारत ने अपने उद्यमियों को पूरी आजादी देकर नीचे से ऊपर तक की तरक्की का रास्ता अपनाया है। अगर बात कम अवधि की हो रही हो तो चीन का पलड़ा भारी दिखाई देता है, लेकिन लंबी रेस का घोड़ा कौन होगा, फैसला अभी बाकी है।

विश्वस्तरीय आईटी इंडस्ट्री का जन्म

भारत की तरक्की में जहां कई बातों (उदाहरण के लिए, आबादी का अच्छा संतुलन, नब्बे के दशक में आर्थिक उदारवाद) का योगदान है, वहीं अस्सी और नब्बे के दशकों में भारत की तरक्की और कैलिफोर्निया की सिलिकॉन वेली में भारतीय-अमेरिकी उद्यमियों की तरक्की के बीच काफी रोचक और लगभग अनदेखा संबंध है। अमेरिका में बसे भारतीयों की गिनती ऐसे सबसे हठी उद्यमियों में की जाती है, जिन्होंने अपने पैरों पर खड़े होकर काफी कम समय में तकनीशियनों के स्थानों से शुरूआत करके उद्यमों और कारोबार में नेतृत्व तक का सफर तय कर लिया।

1967 में न्यूयॉर्क की धरती पर लेखक (पगड़ी पहने) का पहला दिनउनकी इस तरक्की ने उनके देशवासियों को भी ऐसा ही करने के लिए प्रेरित किया और भारतीयों ने एक ऐसी विश्वस्तरीय आईटी इंडस्ट्री को साकार किया, जिसने वर्ष 2008 में 50 अरब डॉलर का आंकड़ा पार कर लिया। यह भारतीय अर्थव्यवस्था के पांच फीसदी के बराबर है। ऐसी उम्मीद है कि वर्ष 2020 तक यह उद्योग 300 अरब डॉलर तक पहुंच जाएगा। किसी ने भी इस उद्योग की ऐसी तरक्की की कल्पना तक नहीं की थी। विदेशी मुद्रा के लिए तरसते एक ऐसे देश में जहां विदेशी निवेश न के बराबर था, सरकार को यह समझने में भी वक्त लगा कि इस उद्योग के कारण बड़ी संख्या में रोजगार के अवसर भी पैदा होंगे। साथ ही निर्यात से कमाई में भी इजाफा होगा। आधारभूत ढांचे सहित कोई भी कमी इस उद्योग की गति को कम नहीं कर सकती थी। बिजली की कमी, बैंडविड्थ की कमी, प्रबंधन की प्रतिभाओं की कमी, पूंजी की कमी हो या फिर सरकार के समर्थन की कमी, उद्यमियों ने किसी बात को अपनी राह का रोड़ा नहीं बनने दिया। उद्योग ने खुद अपनी प्रतिभाओं और प्रबंधकों को ट्रेनिंग दी। अपनी बिजली खुद पैदा की और खुद को संगठित करके सरकार में भी अपनी पैठ बना ली।

भारतीय प्रवासियों ने तोड़ दिया तिलस्म

हार्ट-सेलार कानून 1965 में बदलाव के साथ अप्रवासी नियम भी बदले और इसके साथ ही काम के लिए भारतीयों का अमेरिका जाने का सिलसिला शुरू हो गया। पहले राष्ट्रीयता पर आधारित इस कानून में बदलाव के बाद तकनीकी काबिलियत और महारत अप्रवासियों के लिए अमेरिका में प्रवेश का आधार बन गया। 1960 के दशक में रूस की अंतरिक्ष में छलांग ने अमेरिका को इस हकीकत से रूबरू कराया कि अगर उसे तरक्की की दौड़ में आगे रहना है तो विदेशों से इंजीनियरों और वैज्ञानिक प्रतिभाओं का आयात करना ही होगा। यह भारत के लिए फायदे की बात रही, जहां प्रतिभाओं की कमी नहीं थी, कमी थी तो उनके लिए सही रोजगार की। दूसरे शब्दों में, स्पूतनिक के लांच ने भारतीयों के लिए अमेरिका के दरवाजे खोल दिए।

लेखक 1975 में मिली अमेरिकी नागरिकता प्रमाण-पत्र के साथमैं खुद 1967 में अमेरिका आया था। मिशिगन से मास्टर्स डिग्री हासिल करने के बाद 1971 में मैं सिलिकॉन वेली पहुंच गया। अमेरिका आने वाले भारतीयों में बड़ा हिस्सा आईआईटी, मेडिकल कॉलेजों और आईआईएम के ग्रेजुएट्स का था। ये सभी अमेरिका में आगे की पढ़ाई करने के लिए आए थे। 1960 और 1970 के दशक में उनको अमेरिका के उद्योगों में बड़े पैमाने पर नौकरियां मिलने लगीं। खास तौर पर बोस्टन के मार्ग क्रमांक 128 पर तेजी से विकसित होती सिलिकॉन वेली में। 1970 के दशक के अंत तक तो इनमें से कई तकनीकी क्षेत्र में शीर्ष् स्थानों तक पहुंच चुके थे। वे इसके साथ ही भारत में तेजी से उभरती आईटी इंडस्ट्री में अपना कारोबार फैलाने के लिए भी तैयार दिख रहे थे। भारत में घरेलू आईटी इंडस्ट्री का विकास एक तरह से भारत सरकार द्वारा आईबीएम को भारत छोड़ने के आदेश का ही परिणाम था। ऐसे में बाजार में एक रीतापन सा आ गया क्योंकि जिनके पास आईबीएम के कम्प्यूटर थे, उनको अब भी हार्डवेयर-सॉफ्टवेयर के लिए मदद की दरकार थी। इसके चलते छोटे पैमाने की एक इंडस्ट्री का आगाज़ हुआ जिसने तकरीबन 25 बरस में ही दुनिया पर राज जमा लिया।

सॉफ्टवेयर कारोबार में एग्रेसिव प्राइसिंग

सत्तर के दशक के मध्य में तेजी से उभरती माइक्रोप्रोसेसर इंडस्ट्री ने अमेरिका की कम्प्यूटर इंडस्ट्री में बड़ा बदलाव लाना शुरू कर दिया। इसके साथ ही आईबीएम मेनफ्रेम्स को माइक्रोकम्पयूटर्स, सुपर माइक्रोकम्प्यूटर्स और अंततः पर्सनल कम्प्यूटर के क्षेत्र में भी कारोबार गंवाना पड़ा। ऑपरेटिंग सिस्टमों के आमूलचूल परिवर्तनों के साथ यूनिक्स और डॉस के इर्दगिर्द ही केंद्रित होते जाने के कारण सॉफ्टवेयर इंडस्ट्री में बड़ा परिवर्तन देखने को मिला। शुरूआती दौर की मल्टीयूजर मशीनों ने जैसे ही यूनिक्स ऑपरेटिंग सिस्टम को अपनाया, भारतीय उद्यमियों ने मेनफ्रेम और माइक्रोकम्प्यूटर्स की पुरानी एप्लिकेशनों को नए सिरे से लिखने के काम में अपनी पैठ बना ली। नई मशीनों के लिए पुरानी एप्लिकेशनों को नए सिरे से लिखने का काम उनकी बेहतर आर्थिक स्थिति और स्वभाव के चलते अमेरिकियों के बूते की बात नहीं थी।

भारतीय उद्यमियों ने कीमतों को कम रखकर इस मौके का भरपूर फायदा उठा लिया। वे सबसे कम जोखिम वाले और सबसे सस्ते सप्लायर बन गए। तेजी से तरक्की के लिए कई तौर-तरीकों का इस्तेमाल किया गया। शुरूआत अमेरिकियों की तुलना में भारत की सस्ती श्रमशक्ति से हुई। भारतीय उद्यमियों ने शुरूआती दौर में अमेरिकी आईटी इंडस्ट्री को उनके स्थान पर ही तुलनात्मक कम कीमत पर भारतीय कुशल श्रमिक मुहैया कराना शुरू किया या फिर उनके काम को सस्ते में भारत आउटसोर्स कर दिया जाता था। इस आमूलचूल परिवर्तन ने भारतीय तकनीशियनों की एक ऐसी फौज तैयार कर दी जो अमेरिका में इस्तेमाल में आने वाली अधिकांश एप्लिकेशन में माहिर हो गए थे।

नब्बे के दशक के मध्य में जब 'मिलेनियम बग' यानी वायटूके की समस्या ने पूरी दुनिया के कम्प्यूटर यूजर्स को आतंकित कर दिया था, भारतीय उद्यमी उनके बचाव में आगे आए। अगले कुछ सालों तक भारतीय आईटी इंडस्ट्री ने कुलांचे मारते हुए तरक्की की। सदी के अंत तक भारत की आईटी इंडस्ट्री एक अरब डॉलर की हो चुकी थी।

सबसे अच्छी क्वालिटी, सबसे सस्ते में

ऐसी आशंका जताई जा रही थी कि एक बार वायटूके समस्या गुजर जाने के बाद काम की कमी के चलते आईटी इंडस्ट्री ढह कंवल रेखी जाएगी। यह अमेरिकी उद्यमियों को हिला डालने वाले डॉट कॉम उद्योग के ढहने जैसा नहीं था। रातों-रात बजट में कमी कर दी गई, हालांकि काम जस का तस था। एक दशक से भारतीय सप्लायरों के साथ काम कर रहे अमेरिकी उपभोक्ता, अब पूरी तरह से उन पर ही निर्भर हो गए। ये काम था पहले एप्लीकेशन में वक्त के साथ परिवर्तन का और फिर उस सिस्टम को स्थापित करने का।

भारतीय आईटी इंडस्ट्री तो मानो रॉकेट पर सवार हो गई। तब तक भारतीय उद्यमी भी अनुभव के साथ मंझ चुके थे। उन्होंने और ज्यादा जिम्मेदारियां लेना शुरू कर दीं और सॉफ्टवेयर डिजाइन ही नहीं आईटी उद्योग के अन्य क्षेत्रों में अपनी पकड़ और ज्ञान को और अधिक बढ़ाने की अंदरूनी कोशिशें तेज कर दीं। उन्होंने क्वालिटी बढ़ाने और लागत कम करने के लिए अपने कामकाज को भी बेहतर बनाया। परिणाम यह हुआ कि आज भारतीय सबसे बेहतरीन क्वालिटी सबसे कम कीमत में मुहैया कराते हैं।

आईटी इंडस्ट्री की कामयाबी ने अन्य उद्योगों से जुड़े उद्यमियों को भी बेहतरी के लिए प्रोत्साहित किया। कई पुरानी इंडस्ट्रियों ने अपने उद्यम और प्रतिस्पर्धात्मक गुण को और अधिक तराशा। फार्मास्यूटिकल्स, बायोटेकनालॉजी, मशीन टूल और वाहन उद्योग में कस्टम डिजाइन इंजीनियरिंग के लिए विशेषज्ञता प्राप्त प्रतिभाओं की जरूरत महसूस की जाने लगी है।

लोकतंत्र, अर्थव्यवस्था में विकास की कुंजी मिली

सिलिकॉन वैली में भारतीयों की शुरूआती कामयाबी ने विदेशों में बसे अन्य भारतीयों को भी प्रोत्साहन दिया है। भारतीयों ने आत्मविश्वास में इजाफे के साथ ही उद्योजकता को ध्यान में रखते हुए खुद को संगठित किया। टाई (द इंडयूएस एंटरप्रेन्योर्स) जैसे समूह बने जो रोल मॉडल साबित हुए। एक संस्था के तौर पर 1994 में उभरे टाई के 2009 तक टोक्यो सहित, दुनिया भर में 53 चैप्टर खुल चुके हैं। यह अमेरिका में बसे भारतीयों (भारतीयअमेरिकी) और फिर भारतीय उद्यमियों की तेज तरक्की में अहम साबित हुआ है।

टाई ने भारत के नीति निर्धारकों को भी मदद की और नीतियों का ढांचा बदलने में प्रमुख भूमिका निभाई। जनवरी 2001 में टेलीकॉम इंडस्ट्री का उदारीकरण भी इसी के कारण हुआ था। उस वक्त भारत में सेलफोन की संख्या दस लाख और लैंडलाइन उपभोक्ताओं की संख्या 1.7 करोड़ थी। आज भारत में 40 करोड़ लोग सेलफोन इस्तेमाल करते हैं, जबकि लैंडलाइन इस्तेमाल करने वालों की संख्या पांच करोड़ तक पहुंच गई है। भारतीयअमेरिकी दुनिया के सबसे कामयाब प्रवासी साबित हुए हैं। वह सबसे ज्यादा प्रति व्यक्ति आय वाला समूह है और भारत के राष्ट्रीय औसत से दोगुना आय रखते हैं। वे हर पेशे में हैं, डॉक्टर, इंजीनियर, बिजनेस मैनेजर, उद्यमी। इनमें से आधा दर्जन तो 'फॉर्च्यून500' कंपनियों के सीईओ हैं।

भारतीय लोकतंत्र आज उस स्थिति में पहुंच चुका है जहां युवा आबादी ही भारतीय राजनीति का भी निर्धारण करने लगी है। मार्च से मई 2009 के दौरान हुए ताजा आम चुनावों में भारतीय मतदाताओं ने उन उम्मीदवारों को सिरे से खारिज कर दिया जो उनकी सोच से मेल नहीं खाते थे। मतदाताओं की आर्थिक और कार्यकुशलता की जरूरतों पर ध्यान देने वाले राजनीतिज्ञों को ही कामयाबी मिल सकी।

बहुत बड़े और बहुत विविधता भरे भारत में आजादी के वक्त निरक्षरता और बहुत ज्यादा गरीबी सबसे बड़ी समस्याएं थीं। ऐसा लगता है उसने लोकतंत्र और उद्यम को प्रोत्साहित करने वाली खुलेबाजार वाली अर्थव्यवस्था के जरिये विकास का तरीका खोज निकाला है। निश्चित ही चीन ज्यादा कार्यकुशल है और कम अवधि के लिहाज से भारत से आगे है, लेकिन मुझे नहीं लगता कि लंबी अवधि में भी ऐसा ही होगा।

कंवल रेखीटाई के बोर्ड ऑफ ट्रस्टी के पूर्व चेयरमैन कंवल रेखी इस वक्त भारतअमेरिकी वेंचर केपिटल फंड इन्वेंटस केपिटल पार्टनर्स के प्रबंध निदेशक हैं। अमेरिकी नागरिक कंवल ने 1997 में मिशिगन टेकनालॉजी यूनिवर्सिटी से बिजनेस और इंजीनियरिंग में पीएचडी की थी।

कँवल रेखी

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