कर संग्रह में वृद्धि का सबसे आसान तरीका

प्रिय श्री प्रणव मुखर्जी आपके सामने बजट संबंधी समस्याओं का अंबार खड़ा है। देश का राजकोषीय घाटा भले ही काफी बढ़ गया हो लेकिन मंदी के दौरान आप आसानी से कर बढ़ाने या खर्च कम करने का जोखिम नहीं ले सकते। कर संग्रह में वृद्धि का सबसे आसान तरीका यही होगा कि सिगरेट पर टैक्स फिर बढ़ा दिया जाए। तंबाकू के उपयोग से कैंसर होता है, लिहाजा इस पर कर बढ़ाने के हर कदम को जीवन रक्षा उपाय के रूप में पेश किया जा सकता है। फिर भी, यह अव्वल दर्जे का पाखंड कहा जा सकता है। भारतीय साल भर में करीब एक लाख करोड़ बीड़ी पी जाते हैं जबकि इसके मुकाबले 106 अरब सिगरेट का उपभोग होता है। अगर सिर्फ सिगरेट पर कर लगाया जाए तो धूम्रपान करने वाले 90 फीसदी लोग इस दायरे से बाहर रह जाते हैं। इसलिए सिगरेट और बीड़ी, दोनों पर कर लगाना तर्कसंगत होगा। अगर बिना फिल्टर वाले छोटे सिगरेट पर भी कर लगा दिया जाए तो वित्त मंत्रालय को सालाना 15,000 करोड़ रुपए की आमदनी हो सकती है। अगर स्टैंडर्ड फिल्टर सिगरेट पर लगने वाले कर के समान शुल्क लगा जाए तो साल भर में मंत्रालय को 80,000 करोड़ रुपए अतिरिक्त मिल सकते हैं। सवाल यह है कि पुराने वित्त मंत्रियों ने यह कदम क्यों नहीं उठाया? इसकी वजह यह है कि बीड़ी गरीब लोग पीते हैं और बीड़ी निर्माण का क्षेत्र लाखों लोगों को रोजगार देता है। तंबाकू के उपयोग से नुकसान होने की पुख्ता जानकारी के बावजूद बीड़ी को कर से राहत मिली हुई है। गरीब लोग बीड़ी पीते हैं, लेकिन क्या यह उचित है कि गरीब लोगों को बीड़ी खरीदने की सुविधा दी जाए जिससे वे मौत का शिकार बनते रहें। बीड़ी अगर महंगी होती है तो वे इसे कम पीएंगे और उनके स्वास्थ्य में सुधार होगा। टोरंटो युनिवर्सिटी के डॉ. प्रभात झा का अनुमान है कि साल 2010 में 9,30,000 भारतीय तंबाकू जनित बीमारियों की वजह से मौत का शिकार होंगे। धूम्रपान की वजह से इस तरह के खतरे में दो से तीन गुना तक की वृद्धि दर्ज की गई है। झा कहते हैं कि कम बीड़ी पीना भी स्वास्थ्य के लिए हानिकारक ही है। निकोटीन की लत बुरी होती है और अगर इसे महंगा कर दिया जाए तथा सामाजिक रूप से लोगों के सामने कारोबार के अन्य विकल्प उपलब्ध कराए जाएं तो इसे छुड़ाया जा सकता है। अमेरिका और यूरोप में धूम्रपान के आदी कम से कम 30 फीसदी लोगों ने इसे छोड़ दिया है। भारत में बीड़ी पीने वाले सिर्फ दो फीसदी लोगों ने इसे छोड़ने में सफलता प्राप्त की है। इसकी वजह कीमत और सामाजिक दबाव की कमी है। बीड़ी उद्योग से लाखों लोगों को रोजगार मिलता है लेकिन सच यह भी है कि इसकी वजह से लाखों दूसरे लोग धीमे-धीमे मौत के शिकंजे की ओर बढ़ते हैं। अगर लोगों को मौत का शिकार बनाने वाले इस काम को कर की दरें कम रखकर प्रोत्साहित किया जाएगा तो इससे अच्छा यह होगा कि दाउद इब्राहिम को भारत बुलाकर उसे औद्योगिक विकास मंत्रालय में सलाहकार बना दिया जाए। उसे भी लोगों को धीमी मौत देने के मामले में महारत हासिल है। आईएमएफ के एक सलाहकार एमिल सनले की रिपोर्ट के अनुसार, बीड़ी का कुल तंबाकू खपत में 77 फीसदी योगदान है, लेकिन इनसे सिर्फ पांच फीसदी कर मिलता है। सनले की रिपोर्ट साल 2007-08 के आधार पर तैयार की गई है, लेकिन उस समय से परिस्थितियों में कोई अंतर नहीं आया है। हाथ से बनी प्रति हजार बीडि़यों पर 14 रुपए और मशीन से बनने वाली बीडि़यों पर 26 रुपए कर लगता है। सिगरेट के लिए यही कर बिना फिल्टर वाले सिगरेट पर प्रति हजार 168 रुपए और 70 एमएम के स्टैंडर्ड सिगरेट पर 819 रुपए है। 85 एमएम से लंबे सिगरेट पर यह कर 2,163 रुपए प्रति हजार है। हाथ और मशीन से बनने वाली बीड़ी पर कर एकसमान किया जाना चाहिए। इससे बीड़ी बनाने की प्रक्रिया उद्योग में शिफ्ट होगी, जहां से कर जुटाना आसान है। इसे बाद सरकार को सिगरेट और बीड़ी पर कर एकसमान लगाना चाहिए। जाहिर है, यह एक बार में नहीं किया जा सकता। सरकार तीन साल में बीड़ी पर लगने वाले कर को सिगरेट के बराबर करने का जोखिम ले सकती है। हर छह महीने में बीड़ी पर लगने वाले कर को बढ़ाकर इसे सिगरेट के न्यूनतम कर के समकक्ष लाया जा सकता है। इसके अलावा सिगरेट के पैकेट के लिए जरूरी बनाए गए चेतावनी वाले चित्र को बीड़ी के लिए भी लागू किया जाना चाहिए। गरीब भारतीय लोगों के स्वास्थ्य में सुधार का एजेंडा भी सरकार की प्राथमिकता में होनी चाहिए।
स्वामीनाथन अय्यर

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