आयातित कोटेड पेपर पर एंटी डम्पिंग शुल्क का विचार गलत

भारत में चीन, संयुक्त राज्य अमेरिका और यूरोपीय संघ से आने वाले “कोटेड पेपर” पर नई एंटी-डंपिंग जाँच शुरू होने के बारे में बातें चल रही हैं। दक्षिण कोरिया और इंडोनेशिया को इस जाँच से छूट दी गई है। दरअस्ल, ये देश ही ज़ीरो कस्टम ड्यूटी स्टेटस के चलते भारत में सस्ते आयात के लिए ज़िम्मेदार हैं, जैसा कि बल्लारपुर इंडस्ट्रीज़ लि. (बीआईएलटी) के अध्यक्ष ने कंपनी की 2016 और 2017 की वार्षिक रिपोर्ट में कहा है। इस जाँच के चलते कोटेड पेपर के साथ फ़्लेक्सिबल पैकेजिंग, हल्के कोटेड पेपेर और ब्रोशर-पेम्फ़्लेट में इस्तेमाल होने वाले कोटेड पेपेर पर और ज़्यादा शुल्क लग सकता है। भारत में कोटेड पेपर का इस्तेमाल हर आकार के बहुत-से उद्योगों में होता है, फिर चाहे वे प्रकाशन-गृहों की काफ़ी छोटी इकाइयाँ हों या बड़े व्यवसाय हों।

भारत के कोटेड पेपर निर्माताओं की तुलना में यूएसए और यूरोपियन यूनियन के उत्पादकों को कारख़ानों को चलाने के लिए रोज़मर्रा की काफ़ी ज़्यादा लागत और ज़्यादा पूजी के निवेश का बोझ उठाना पड़ता है। चीन और भारत में बने कोटेड पेपर की तुलना में अमेरिका और यूरोप में बने कोटेड पेपर की गुणवत्ता ख़ासी बेहतर है। अमेरिका और यूरोप के पेपर ज़्यादातर उन कामों में इस्तेमाल होते हैं जहाँ सतत उच्चस्तरीय छपाई की ज़रूरत होती है। चीन और भारत में बने पेपर उस तरह की छपाई के परिणाम नहीं दे सकते हैं।

यह पूरी तरह सच है और इसमें कोई दो राय नहीं है कि पिछले कुछ वर्षों से चीनी उत्पादक और निर्यातक बाक़ी दुनिया से 15-20% सस्ते पेपर भारतीय बाज़ार में उतारते आ रहे हैं, ताकि जितना उत्पादन वे कर रहे हैं और उनका देश जिसे इस्तेमाल नहीं कर पा रहा है उसे कहीं और उपयोग में लाया जा सके और साथ ही भारतीय कोटेड पेपर उद्योग के बड़े हिस्से पर कब्ज़ा किया जा सके। हालाँकि 2017 के आख़िर में आते-आते हालात बदल चुके थे। इसकी वजह यह है कि प्रदूषण के बढ़ते स्तर को क़ाबू में करने के लिए चीनी सरकार ने उन उद्योगों के ख़िलाफ़ काफ़ी सख़्त क़दम उठाए जिनका प्रदूषण बढ़ाने में हाथ था और जो ईको-फ़्रेंडली तरीक़े से उत्पादन नहीं कर रहे थे, जिसमें वहाँ का पेपर उद्योग भी शामिल है। चीन की सरकार के इस रुख़ के चलते अक्टूबर 2017 के बाद वहाँ से भारत को निर्यात किए जाने वाले कोटेड पेपर में गिरावट आई और क़ीमत में भी 15% का इज़ाफ़ा हुआ। वहीं अमेरिका और यूरोप में पेपर उद्योग ने अपनी छवि को बदला–पहले जहाँ उन्हें ग़लत तरीक़े से उत्पादन करने वाला माना जाता था, उससे उन्होंने ख़ुद को नैतिक तौर पर पेपर निर्माण करने वालों के रूप में स्थापित किया जो जंगल ख़त्म किए बिना उत्पादन कर रहे हों, कार्बन फ़ुटप्रिंट घटा रहे हों और ख़राब तरह से बनाए गए पेपर से पर्यावरण पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों को कम कर रहे हों। हर साल यूरोपीय और अमेरिकी कारख़ाने बेहतर वैश्विक पर्यावरण नियंत्रण के लिए नेट कार्बन फ़ुटप्रिंट को नीचे लाने की कोशिश में लगे हुए हैं।

आम तौर पर काग़ज़ उद्योग से पानी और वृक्ष आदि प्राकृतिक संसाधनों पर काफ़ी दबाव पड़ता है जिनका उपयोग उत्पादन में किया जाता है और जिनकी भारत में पहले से ही कमी है। बीआईएलटी की ख़ुद की स्वीकरोक्ति के अनुसार–“भारत ऐसा देश है जहाँ लकड़ी-फ़ाइबर की कमी है। भारतीय पल्प और पेपर उद्योग के लिए कच्चे माल की अपर्याप्त घरेलू आपूर्ति बड़ी बाधा है।” हालात इतने बदतर हैं कि बीआईएलटी को कच्चे माल और पूंजी की कमी के चलते आर्थिक वर्ष 2017 में अपनी एक इकाई ’सेवा’ को न्यूनतम उत्पादन करने तक सीमित करना पड़ा। परिस्थितियों को बेहतर समझने के लिए स्वयं बीआईएलटी के अनुमानों को देखने की ज़रूरत है। वर्तमान 11 मिलियन मेट्रिक टन प्रतिवर्ष की ज़रूरत में से भारत पहले से ही काग़ज़ उद्योग में इस्तेमाल करने के लिए 2 मिलियन मेट्रिक टन प्रतिवर्ष लकड़ी आयात कर रहा है। इस ज़रूरत के 15 मिलियन मेट्रिक टन प्रतिवर्ष तक ऊपर जाने की संभावना है। इसकी आपूर्ति कैसे की जाएगी, यह किसी को भी मालूम नहीं है। भारत में प्रतिस्पर्धा दरअस्ल यह है कि पीने के लिए पानी को साफ़ बनाया जाए या मशीनें चलाने के लिए काग़ज़ उद्योग को दे दिया जाए। यूरोप में उत्पादकों ने पानी साफ़ करने के लिए प्लांट्स लगा रखे हैं ताकि सुनिश्चित किया जा सके कि बचा पानी शुद्ध होकर पब्लिक वाटर सप्लाई में जा रहा है। पानी साफ़ करने के लिए लगाए गए इन प्लांट्स के चलते वहाँ उत्पादन की लागत में काफ़ी इज़ाफ़ा हुआ है।

भारत में एक तरह के काग़ज़ (एलडब्ल्यूसी) का निर्माण बिलकुल नहीं होता है, इसलिए यहाँ उत्पादन उद्योग को कोई ख़तरा नहीं है – ऐसे में यह समझ से परे है कि एलडब्ल्यूसी पर एंटी-डंपिंग शुल्क लगाकर क्या हासिल होगा? ऐसे कोई सबूत नहीं है कि निकट भविष्य में हालात में बदलाव आएगा और इसलिए एलडब्ल्यूसी की मांग को पूरा करने के लिए कोई योजना नहीं है – फिर पहले से दिक़्क़तों का सामना कर रहे काग़ज़ और प्रकाशन उद्योग में एंटी-डंपिंग शुल्क का प्रावधान क्यों होना चाहिए?

हाल के दिनों में आर्थिक नासमझी और कुछ हद तक स्पेक्यूलेटिव अरेंजमेंट के चलते बल्लारपुर इंडस्ट्रीज़ बड़े कर्ज़े के दबाव से जूझ रही है। तकनीकी अपग्रेड में किए निवेश के ऑपरेशनल होने में सोच से काफ़ी ज़्यादा समय लगा, जिसकी वजह नई पूंजी हासिल करने में कंपनी की अक्षमता रही और इसका कारण वैश्विक आर्थिक गिरावट को ठहराया गया। मलेशिया की सबा फ़ॉरेस्ट इंडस्ट्रीज़ में किए निवेश का सकारात्मक परिणाम नहीं मिला, जिसके लिए बीआईएलटी ने मज़बूत मलेशियाई मुद्रा को ज़िम्मेदार ठहराया और आख़िरकार इसका कामकाज बन्द कर दिया। परिणामस्वरूप पिछले साल पूंजी के अभाव में बीआईएलटी ने कोटेड पेपर का ज़्यादातर उत्पादन बंद कर दिया। जब कोई कंपनी इस तरह की वित्तीय और उत्पादन से जुड़ी परेशानी में होती है, तो उनके लिए इस तरह के बदलाव को बढ़ावा देना ज़्यादा समझदारी का फ़ैसला नहीं लगता है।

इस नए शुल्क से घरेलू बाज़ार की क़ीमतों में बढ़ोत्तरी पर प्रभाव पड़ेगा और यह उन पर्यावरण से जुड़ी बाधाओं को भी दूर नहीं करता जिसके असर में भारतीय मेन्यूफ़ेक्चरिंग उद्योग पहले से है। दक्षिण कोरिया और इंडोनेशिया को इस पड़ताल से छूट दी गई है, जो बड़े पैमाने पर कोटेड पेपर भारत में भेजते हैं। इन देशों के कोटेड पेपर पर 10% का वह शुल्क नहीं लगाया गया है जो अन्य देशों पर लगा है। अलग-अलग देशों पर अलग-अलग शुल्क पहले से हैं और इनमें और बदलाव टकराव पैदा करेगा।

भारतीय उत्पादन उद्योग कोटेड पेपर की मांग की पूर्ति करने में सक्षम नहीं है, इसलिए निकट भविष्य में इसकी आपूर्ति में कमी होना तय है। भारत में इसकी ज़रूरत 16 मिलियन मेट्रिक टन प्रतिवर्ष है और उत्पादन की क्षमता महज़ 13 मिलियन टन प्रतिवर्ष के आस-पास है। भारत दुनिया में सबसे तेज़ी-से बढ़ रहे पेपर बाज़ारों में से एक है और ऐसी कोई भविष्यवाणी नहीं है कि अगले कुछ सालों में उत्पादन की क्षमता में कोई ख़ास इज़ाफ़ा होगा। इसमें भारत सरकार की ओर से शिक्षा के क्षेत्र में तेज़ी पैदा करने की कोशिशों और भारतीयों के बढ़ती आय को जोड़ दीजिए, ऐसे में मांग और आपूर्ति के स्तर में विषमता पैदा होना लाज़मी ही है। इसके अलावा जिस तरह से कुछ कारख़ाने चलाए जाते हैं, उससे हमारे कार्बन फ़ुटप्रिंट पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा क्योंकि ख़राब इंजीनियरिंग के चलते प्रदूषण में होने वाली वृद्धि को नकारा नहीं जा सकता। इसे ध्यान में रखें तो अमेरिका और यूरोपीयन यूनियन से काग़ज़ आयात करके पर्यावरण की सुरक्षा करने का मतलब समझ आता है।

बीआईएलटी के अनुरोध पर भारत सरकार द्वारा शुरू की गई एंटी-डंपिंग जाँच कोटेड पेपर के एक और घरेलू उत्पादक के तौर पर जेके पेपर लिमिटेड का भी ज़िक्र करती है। इस बात पर भी ग़ौर किया जाना चाहिए कि ख़ुद जेके पेपर ने वित्तीय वर्ष 2017 में इंडोनेशिया, कोरिया और चीन से बड़ी मात्रा में कोटेड पेपेर आयात किया है।

चूँकि फ़्लेक्सिबल पैकेजिंग के काम कोटेड पेपर का उपयोग किया जाता है–हाल के दिनों में इसमें काफ़ी बढ़ोत्तरी भी हुई है–ऐसे में एंटी-डंपिंग शुल्क के चलते क़ीमतों में होने वाली वृद्धि से भारत में इसके आयात में कमी तो आएगी ही, साथ ही प्लास्टिक पैकेजिंग के आसान विकल्प को भी फिर से प्रोत्साहन मिलेगा। प्लास्टिक प्रदूषण के स्तर को बढ़ाने वाले कारकों में प्रमुख है। सरकार व अन्य पर्यावरण संस्थाएँ इसके उपयोग को कम-से-कम करने में जी-जान से जुटी हुई हैं और इसकी जगह जूट तथा पेपर जैसे वैकल्पिक हल सामने रख रही हैं, इन हालात में साफ़ है कि बायोडिग्रेडेबल चीज़ों की मांग बढ़ रही है। क्या वाक़ई इसकी ज़रूरत है कि आयातकों पर बेवजह का शुल्क लगाया जाए और पर्यावरण को ख़तरे में डाला जाए? वह भी तब जब भारतीय मेन्यूफ़ेक्चरिंग सेक्टर को फ़िलहाल कोई ख़तरा नहीं है।

भारत सरकार अर्थव्यवस्था को तेज़ करने के लिए पूरी दुनिया से एफ़डीआई आमंत्रित कर रही है। ऐसे में नए प्रस्ताव से साफ़ है कि यूएसए और ईयू पेपर आयात पर पहले से लगे टैक्स पर और ज़्यादा शुल्क लगाने से से बड़े पैमाने पर नकारात्मक रूप से प्रभावित होंगे। इसके अलावा घरेलू सप्लाई चेन भी परेशानी का सामना करेगी।

- आजादी.मी

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