न जाने क्यों काशी से व्यापारियों का होने लगा था पलायन!

बहुत पुरानी बात है। गंगा तट पर बसी काशी नगरी को तब भी व्यापार, कला और कारीगरी के क्षेत्र में उत्कृष्ट मुकाम हासिल था। नगर से थोड़ी दूरी पर जुलाहों का एक दल निवास करता था। जुलाहों का मुख्य पेशा बांस की टोकरी आदि बनाना था। आमतौर पर उनके मकान कच्चे थे और बांस, मिट्टी और खपरैल आदि के ही बने थे। उनमें से सिर्फ दो-एक मकान ऐसे थे जो पक्के थे। इन पक्के मकानों में से एक मकान वृद्ध रामदीन का था। दरअसल, रामदीन अन्य जुलाहों की तरह बांस की टोकरी इत्यादि बनाने के स्थान पर रेशम के वस्त्र बनाया करता था। उसके बनाए हुए वस्त्रों की एक अलग खासियत थी। वस्त्र सदैव मुलायम और चमकदार बने रहते थे। रामदीन का भी दावा था कि वस्त्र भले ही तार तार हो जाएं लेकिन उनकी चमक पर असर पड़े तो वह वस्त्र बनाना छोड़ देगा। रामदीन की देखादेखी कुछ अन्य जुलाहों ने भी रेशम के वस्त्र बनाने की कोशिश की लेकिन गुणवत्ता के मामले में वे रामदीन के आसपास भी नहीं थें।

दरअसल, वृद्ध रामदीन पारखी नजर और अनुभव का धनी था। उसे रेशम के कीड़ों की एक ऐसी प्रजाति के बारे में पता था जिनके द्वारा प्राप्त रेशम सदैव मुलायम और चमकीले बने रहते थे। हालांकि ये कीड़े रेशम के अन्य कीड़ों के जैसे नहीं होते थे। ये कीड़े खतरनाक भी होते थे और डंक भी मारते थे। ये डंक इतने खतरनाक होते थे कि शरीर के जिस क्षेत्र को छू जाए वहां लंबे समय के लिए दर्द और सूजन की स्थिति बन जाती थी और इंसान के लिए उस अंग को हिलाना डुलाना भी संभव नहीं रह जाता था।

रामदीन ने अपने अनुभव के बल पर बिना घायल हुए उच्च गुणवत्ता के रेशम को प्राप्त करने की तकनीक सीख चुका था। ऐसे रेशम की सहायता से तैयार वस्त्र बाजार में तुरंत बिक जाया करते थे और अच्छे दाम भी मिल जाते थे। अन्य जुलाहे कोशिश करके हार गए लेकिन रामदीन के जैसे वस्त्र नहीं बना सके। रामदीन और उसके रेशमी वस्त्रों की ख्याति दूर दूर तक फैलने लगी। यहां तक कि दल के अन्य जुलाहों के अतिरिक्त नगर के अन्य व्यवसाय से जुड़े लोग भी रामदीन से अपने बच्चों को उत्कृष्ट गुणवत्ता वाले रेशमी वस्त्र तैयार करने की कारीगरी सिखाने के लिए आग्रह करने लगे।

ऐसे ही दिन बीतता रहा। अब रामदीन कमजोर होने लगा और उसके देखने की क्षमता भी पहले से कम हो गई थी। रेशम एकत्रित करने और वस्त्र बनाने में उसे पहले से अधिक समय और श्रम लगने लगा। गर्मी की एक दुपहरी में गंगा किनारे पेड़ों के झुरमुट के नीचे लेटे रामदीन के मन में एक विचार आया। वह सोचने लगा कि उसके बाद रेशम के विशेष कीड़ों से प्राप्त रेशम से वस्त्र बनाने की कला समाप्त हो जाएगी। वह यह भी सोच रहा था कि काम न करने की दशा में उसका खर्च कैसे चलेगा। इन सभी प्रश्नों के समाधान के तौर पर उसने लोगों को विशेष किस्म के कीड़ों से प्राप्त रेशम से वस्त्र बनाने की कला सीखाने का फैसला लिया। उसने यह भी तय किया कि वह सिर्फ प्रतिभावान और वास्तव में रेशमी वस्त्र बनाना सीखने वालों को ही प्रशिक्षण देगा और बदले में उनसे कुछ धन भी वसूलेगा।

कुछ दिनों बाद रामदीन ने इस बात की घोषणा भी कर दी। इस सूचना के फैलते ही तमाम लोग स्वयं व अपने बच्चों को रेशमी वस्त्र बनाने की कला सिखाने के आग्रह के साथ पहुंचने लगे। उनमें से तमाम लोग ऐसे भी थे जो दूसरों की देखा देखी वहां पहुंच रहे थे और जिन्हें वास्तव में इसमें रूची थी ही नहीं। बातचीत के दौरान कई बच्चों ने यह भी बताया कि वे घुड़सवारी, नौकाविहार आदि कार्यों में रूची रखते थे। चूंकि उसके पास बड़ी संख्या में बच्चों को प्रशिक्षण देने के लिए स्थान भी नहीं था ना ही बच्चों की देखरेख के लिए कोई सहायक। इन समस्याओं से निबटने, सही और गंभीर लोगों को वस्त्र बनाने की कला सिखाने के लिए रामदीन ने पांच स्वर्ण मुद्राओं की शर्त रखी। रेशमी कीड़े की पहचान करने, बिना किसी क्षति के सुरक्षित उत्तम किस्म के रेशम को तैयार करने की विधि के लिए अलग से पांच स्वर्ण मुद्राओं की भी शर्त रखी। हालांकि दोनों काम सीखने वालों के लिए यह शुल्क आठ स्वर्ण मुद्राएं तय की गई। रामदीन का यह मानना था कि शुल्क लेने के कारण एक तो कम गंभीर लोग स्वयं ही नहीं आएंगे दूसरे वह मिलने वाले पैसों से कोई जगह किराए पर ले सकेगा और सहायक भी नियुक्त कर सकेगा।

जैसे ही रामदीन ने अपने पास रेशम के वस्त्र बनाने की कला सीखने वालों को शुल्क की बात बताई, उनमें से अधिकांश (अगंभीर) छात्रों ने अपने नाम वापस ले लिए। चूंकि दस स्वर्ण मुद्राएं चुकाना सबके वश की बात नहीं थी और अनेक लोग ऐसे भी थें जिन्हें वस्त्र निर्माण कला सीखने का मूल्य दस स्वर्ण मु्द्राओं के मूल्य से कम प्रतीत होता था। अतः रामदीन के पास अब तीन छात्र ही शेष रह गए। तीन चार छात्रों से प्राप्त होने वाले धन से प्रशिक्षण स्थल का किराया और सहायक रखने का खर्च चुकाना भी मुश्किल था। तिस पर रामदीन को अपने भविष्य के लिए भी बचत करनी थी। यह सोच रामदीन ने शुल्क राशि दस स्वर्ण मुद्राओं से कम कर पांच स्वर्ण मुद्राएं कर दी। पांच स्वर्ण मुद्राओं के कारण रामदीन के पास बीस छात्र वस्त्र कला सीखने के लिए आने लगे। इस प्रकार शुल्क कम करने के बावजूद पूर्व (10*3=30) की तुलना में रामदीन के पास (20*5=100) अधिक स्वर्ण मुद्राएं आने लगीं। 100 स्वर्ण मुद्राएं प्रशिक्षण स्थल के किराए और सहायक का खर्च चुकाने व स्वयं के लिए कुछ बचाने को पर्याप्त थीं। रामदीन का काम अच्छा चल निकला। प्रशिक्षण केंद्र की सफलता से उत्साहित हो कुछ साहूकारों ने निर्धन छात्रों को ब्याज पर धन उपलब्ध कराने की योजना के साथ रामदीन से संपर्क किया। उन्होंने रामदीन को अच्छे और गंभीर छात्रों का चयन करने के लिए राजी किया ताकि वस्त्र कला सीख छात्र कमाई कर सकें और उनके पैसे लौटा सकें।

काशी नगरी में ही एक अन्य व्यक्ति, जयवर्द्धन भी रहता था जो नगर प्रमुख पद पर चयनित होना चाहता था। चुनाव सन्मुख देख जयवर्द्धन ने घोषणा की कि रेशमी वस्त्र बनाने की कला सीखना हर युवक का मौलिक अधिकार है। धन की कमी के कारण कोई भी युवक इस कला को सीखने से वंचित नहीं रहना चाहिए। जयवर्द्धन ने घोषणा की कि यदि काशीवासी उसे नगर प्रमुख बना देते हैं तो वह धनी लोगों पर कर लगाकर सबके लिए रेशमी वस्त्र बनाने की कला सिखने का सपना निशुल्क में पूरा करा सकेगा। यह सुन काशीवासी अत्यंत प्रसन्न हुए और जयवर्द्धन को नगर प्रमुख पद के लिए चुन लिया। जयवर्धन ने अपना वादा पूरा किया और सभी लोगों पर ‘कौशल विकास’ के नाम पर अतिरिक्त कर लगा दिए। इसके बाद नगर में पांच रेशमी वस्त्र बनाने की कला विकसित करने के लिए केंद्र खोल दिए। इनमें से दो केंद्र उसके स्वयं के रिश्तेदारों के भी थे। जयवर्द्धन ने सभी साहूकारों को दाखिले के इच्छुक सभी छात्रों को धन उपलब्ध कराने के निर्देश दिए। यह भी आदेश जारी किए कि यदि कोई छात्र धन चुकाने में असमर्थ होगा तो सरकार साहूकारों के पैसे चुकाएगी।

जयवर्द्धन के इस आदेश से लोग अत्यंत प्रसन्न हुए और उसके समर्थन में नारे लगाए। नए प्रशिक्षण केंद्र खुल जाने और साहूकारों से शुल्क के लिए आवश्यक धन आसानी से उपलब्ध हो जाने के कारण नगर के सभी गंभीर व अगंभीर सभी लोगों ने प्रशिक्षण केंद्रों में दाखिला ले लिया। चूंकि शुल्क के लिए आवश्यक धन सरकार चुका रही थी इसलिए प्रशिक्षण केंद्रों में क्या सिखाया जा रहा है इसमें कम ही लोगों की रूची रह गई थी। प्रशिक्षकों की भी छात्रों के प्रति कोई जवाबदेही नहीं रह गई क्योंकि उन्हें नगर प्रमुख की तरफ से वेतन उपलब्ध करायी जा रही थी। छात्रों के सीखने से साहूकारों का भी कोई सरोकार नहीं रह गया क्योंकि उनके द्वारा धन न चुकाए जाने की दशा में नगर प्रमुख की तरफ से धन चुकाया जा रहा था। एक दो वर्षों में ही नगर में नगर प्रमुख द्वारा मान्यता प्राप्त प्रशिक्षित वस्त्र निर्माताओं की बड़ी संख्या तैयार हो गई। इनमें से तमाम छात्र ऐसे थे जिन्हें वस्त्र बनाने का बिल्कुल ज्ञान नहीं था किंतु वे मान्यता प्राप्त थे। काशी के बाजार में रेशमी वस्त्र बनाने वालों की भीड़ लग गई किंतु खराब गुणवत्ता के कारण उनके वस्त्रों को काफी कम कीमत प्राप्त होती। कईयों के तो वस्त्र बिक भी नहीं पाते थे। समस्या विकराल होती जा रही थी और किसी को समझ नहीं आ रहा था कि क्या करें। किंतु साहूकारों का कर्ज तो चुकाना ही था अतः जयवर्द्धन ने इसकी पूर्ति के लिए अनेक नए कर जनता पर थोप दिए। दलील दी गई कि नगर व उसके युवाओं के विकास के लिए थोड़ा त्याग करना सबका फर्ज बनता है।

कुछ समय पश्चात राज्यवर्द्धन नामक एक और व्यक्ति जो नगर प्रमुख बनना चाहता था, वहां आया और उसने काशीवासियों से वादा किया कि यदि वह नगर प्रमुख बनता है तो लोगों पर और कर लगाएगा और ऐसे केंद्रों की स्थापना की जाएगी जो वस्त्र निर्माताओं से उनके वस्त्र खरीदेगी और किसी का नुकसान नहीं होने दिया जाएगा। उसने यह भी वादा किया की चूंकि रामदीन के प्रशिक्षण केंद्र के छात्र अच्छा प्रदर्शन कर रहे हैं और उनके वस्त्रों की काफी मांग भी है इसलिए ऐसा प्रावधान भी किया जाएगा कि गरीब छात्र भी रामदीन के प्रशिक्षण केंद्र में निशुल्क प्रशिक्षण हासिल कर सके। काशीवासियों ने एक फिर से गगनभेदी नारे लगाए किंतु इस बार नारे राज्यवर्धन के नाम के थे। नगर प्रमुख बनते ही राज्यवर्धन ने भी अपने वादे को पूरा किया और लोगों से और अधिक कर वसूलना शुरू कर दिया। प्रशिक्षण के ईच्छुक छात्रों को कर्ज सरकारी कोष से देने का प्रावधान कर दिया गया। सरकार ने सभी प्रशिक्षित छात्रों से उनके द्वारा बनाए गए रेशम के वस्त्र खरीदने शुरू कर दिए। साथ ही एक निश्चित संख्या में नए छात्रों को रामदीन के प्रशिक्षण केंद्र में अनिवार्य दाखिला देने का प्रावधान कर दिया।

चूंकि नगर प्रशासन ने समस्त रेशमी वस्त्रों को खरीदना शुरू कर दिया था इसलिए कुछ ही दिनों में सरकार के पास इतने वस्त्र एकत्रित हो गए कि उनको रखने की जगह कम पड़ने लगी। वस्त्र खुले में रखे जाने लगें और बर्बाद होने लगें। इस समस्या से निबटने के लिए प्रशासन ने अन्य नगरों से आयात होने वाले वस्त्रों पर प्रतिबंध लगा दिया और सभी के लिए सरकारी वस्त्र खरीदना अनिवार्य कर दिया। उधर, रेशमी वस्त्र बनाने का प्रशिक्षण लेने के इच्छुक छात्रों से दाखिले के समय छात्रों की परीक्षा/साक्षात्कार लेने पर भी रोक लगा दी गई। राज्यवर्धन के इस आदेश के कारण रामदीन के प्रशिक्षण केंद्र की लागत बढ़ने लगी और उसका मुनाफा कम होने लगा। साथ ही सरकारी सुविधा का लाभ उठाने के लिए अगंभीर छात्र रेशमी वस्त्र बनाना सीखने लगे। बड़ी संख्या में छात्र अपना कर्ज चुकाने में असफल होने लगें और नगर का खजाना खत्म होने लगा। राज्यवर्द्धन ने मजबूर छात्रों की कर्ज माफी का ऐलान कर दिया और धन की कमी को पूरा करने के लिए व्यवसायियों पर और अधिक कर आरोपित कर दिए। कुछ समय पश्चात न जाने क्यों अचानक काशी से धनी व्यवसायियों का पलायन शुरू हो गया..। एक दिन रामदीन ने भी वस्त्र तैयार करने की कला सीखाना बंद करने का फैसला कर लिया। प्रतिबंध के बावजूद काशी में पड़ोसी राज्यों में तैयार वस्त्र चोरी छिपे बिकने लगें और लोग वास्तविक कीमत से कई गुना अधिक कीमत चुकाने को मजबूर होने लगे..। राज्यवर्द्धन सहित नगरवासियों को भी समझ नहीं आ रहा था कि आखिर गड़बड़ी कहां हो रही थी...

- आजादी.मी

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