आम बनिया आम आदमी नहीं

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सरकार द्वारा बहु-ब्रांड खुदरा में 51 प्रतिशत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की अनुमति के खिलाफ बीते हफ्ते पांच करोड़ दुकानदारों और व्यापारियों ने बंद का आह्वान किया। असलियत में यह साबित करता है कि छोटे व्यापारियों का वह दावा कितना खोखला है, जिसमें वे खुद को असंगठित क्षेत्र का कमजोर प्रतिनिधि बताते हैं। हड़ताल पर गए पांच करोड़ ये व्यापारी देश के समूचे संगठित क्षेत्र के कामगारों (3 करोड़) से कहीं अधिक हैं। दुकानदारों को असंगठित या गरीब बिल्कुल नहीं कहा जा सकता। जहां मैं रहता हूं, वहां के स्थानीय बाजार में छोटी सी भी दुकान करोड़ रुपये की है।

छोटे दुकानदार, जिनमें बनियों का दबदबा है, मिलावटखोरी और घटतौली के जरिए ग्राहकों को चूना लगाने के लिए कुख्यात हैं। वे बिक्री और आयकर की चोरी करने के लिए भी जाने जाते हैं। इसीलिए वे घृणा के पात्र रहे हैं (हालांकि सभी को एक ही तराजू में तौलना गलत होगा)।

फिर भी यह चौंकाने वाली बात है कि तमाम राजनीतिक पार्टियां और राज्य सरकारें विदेशी खुदरा कारोबारियों के खिलाफ करोड़पति बनियों के समर्थन में खड़ीं हो गई हैं। इन विदेशी खुदरा कारोबारियों का अपराध सिर्फ यही है कि इनके आने से कीमतें इतनी कम हो जाएंगी कि छोटे दुकानदारों का सफाया हो जाएगा। अगर असल में ऐसा होता है कि विदेशी रिटेलर कीमतें इतनी ज्यादा घटा देते हैं तो महंगाई के मारे आम आदमी के लिए इस से बड़ी बात क्या हो सकती है। वैसे ऐसी उम्मीद अतिशयोक्ति ही है।

इस तरह तो विदेशी रिटेलरों का विरोध कर नेता आम आदमी के सामने आम बनियों को बढ़ावा दे रहे हैं। इसे समाजवादी नारों की चाशनी में भले लपेटा जा रहा हो, लेकिन असल में यह गरीब उपभोक्ताओं के खिलाफ अमीर व्यापारियों की तरफदारी से ज्यादा कुछ नहीं है।

ऐसा क्यूं होता है? वजह यह है कि नेता हमेशा वोट बैंक और धन की झोली खोलने वालों को लुभाने की फिराक में रहते हैं। बनियों का एक बहुत ही संगठित वोट बैंक है (बीते हफ्ते के बंद के हिसाब से यह संख्या 5 करोड़ है)। वे राजनीतिक फाइनेंसर भी हैं, यह बात केवल भाजपा के लिए ही सही नहीं है। इसीलिए वामपंथी तक उनकी तरफदारी कर रहे हैं।

व्यापारी और दुकानदार तमाम देशों में इतने अधिक संगठित हैं कि उनका राजनीतिक दबदबा उनकी आबादी से कहीं ज्यादा है। अमेरिका की महामंदी के दौरान दुकानदारों ने राष्ट्रपति रूजवेल्ट को प्रतिस्पर्धा विरोधी कानून रीसेल प्राइस मेंटीनेंस (आरपीएम) को लागू करने के लिए दबाव बनाया। आरपीएम ने निर्माताओं को उत्पादों की न्यूनतम कीमत तय करने के लिए बाध्य किया। इस कीमत को कानूनी तौर पर बड़ी खुदरा रिटेल चेन भी कम नहीं कर सकती थीं। कई दशकों बाद अमेरिकी अदालतों ने आरपीएम को प्रतिस्पर्धा विरोधी बताते हुए खारिज कर दिया। लेकिन यह अमेरिकी दुकानदारों के दबदबे का ही नतीजा था कि आरपीएम इतने लंबे समय तक लागू रहा। अभी भी वहां के कई राज्यों में पिछले दरवाजे से इसे फिर से लागू करने की चर्चा चल रही है। 

दशकों तक ब्रिटेन का अपना आरपीएम रहा। इसे दुकानदारों के भारी विरोध के बावजूद वहां की कंजर्वेटिव सरकार ने 1964 में खत्म कर दिया था। कुछ समीक्षकों ने तब दावा किया था कि कंजर्वेटिव पार्टी 1964 का आम चुनाव दुकानदारों के इसी विरोध की वजह से हारी। हालांकि अन्य समीक्षक इससे सहमत नहीं थे।

कुल मिलाकर सभी लोकतंत्रों में दुकानदार बनिया ताकतवर है। वह अपने हितों को बढ़ावा देने के लिए गरीब आम आदमी के नाम का सहारा लेता है। उसे कमजोर और असंगठित बिल्कुल नहीं कहा जा सकता। सच तो यह है कि आम उपभोक्ता के मुकाबले वह बेहद सशक्त और संगठित है। बनियों का अपना वोट बैंक है, जबकि सामान्य उपभोक्ता के साथ ऐसा नहीं है। बनिया नेताओं को चंदा देने में सबसे आगे हैं, जबकि आम आदमी की झोली वैसे ही खाली है। इन्हीं सब वजहों से बनिया हमेशा आम आदमी से जीतता रहा है।

देश में किसान लॉबी भी बहुत बड़ी और मजबूत है। फिर भी यह कृषि व्यापार के मामले में बनियों से बार-बार मात खाती आई है। भारतीय किसान संगठनों के कंसोर्टियम के मुखिया चेंगल रेड्डी खुदरा कारोबार में विदेशी निवेश के पक्षधर हैं। वह कहते हैं कि इससे किसानों के पास बेहतर तकनीकी आएगी और बनिया बिचौलिये गायब होंगे। इससे पहले उन्होंने एपीएमसी कानून को समाप्त करने का जोरदार समर्थन किया। यह कानून किसानों को उन सरकारी मंडियों के जरिए ही अपनी उपज को बेचने के लिए बाध्य करता है, जहां बिचौलियों के रूप में आढ़तिए मौजूद हैं। राजनीतिक दलों की ओर से किसानों को बार-बार सबसे ज्यादा तरजीह देने का दावा किया जाता है, लेकिन ज्यादातर राज्य सरकारों ने अभी भी रिटेलरों पर किसानों से सीधी खरीद पर रोक लगा रखी है। यहां तक कि विदेशी रिटेलरों का पक्षधर माने जाने वाले पंजाब ने भी सीधी कॉरपोरेट खरीद पर लगी पाबंदिया हटाई नहीं हैं। क्यों? वजह यह है कि व्यापारी लॉबी बेहद संगठित है और नेताओं को जमकर चंदा देती है। यह गठजोड़ टूटता नहीं दिख रहा।

नेता बार-बार यह दोहराते हुए विदेशी निवेश का विरोध कर रहे हैं कि भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी भी व्यापारी बनकर आई थी और बाद में उसने यहां की सत्ता हथिया ली। क्या देश में वास्तव में आज भी वही 18वीं सदी जैसे हालात हैं? आज की तारीख में चीन में विदेशी 5.7 करोड़ वर्ग फुट रिटेल स्पेस के मालिक हैं। क्या इससे वह उपनिवेशवादियों की जागीर बन गया है? कदापि नहीं। कोरिया, ताइवान, थाइलैंड और इंडोनेशिया जैसे अन्य एशियाई देश विदेशी रिटेलरों को नई तकनीकी और कीमतों में कटौती लाने वाले हरकारों के रूप में देख रहे हैं। क्या भारत में इससे कुछ अलग हो जाएगा?

बनिये भारतीय रिटेल दिग्गजों के आने के बावजूद भी आसानी से बच निकले और विदेशियों के आने के बाद भी बने रहेंगे। उनके मोटे मुनाफे पर आंच न आए, इसके लिए वे हर संभव राजनीतिक तरकीब लड़ाते हैं। दुकानदार लॉबी ने पहले भी वैट (मूल्यवर्द्धित कर) को कई राज्यों में लंबे समय तक रोके रखा, इनमें खासतौर पर उत्तर प्रदेश और तमिलनाडु का नाम है। यह कोई ताज्जुब की बात नहीं है कि इन्हीं दोनों राज्यों ने अब खुदरा में विदेशी निवेश का विरोध किया है। यह दिखाता कि बनिया लॉबी कितनी मजबूत है। विदेशी रिटेलरों को लेकर राजनीतिक हो-हंगामे के पीछे भी यही असली वजह है।

- स्वामीनाथन अय्यर
साभार: स्वामीनॉमिक्स.ऑर्ग