कैसे मिले 'मन मुताबिक़ शिक्षा' का अधिकार ?

देश के प्रत्येक बच्चे को समुचित शिक्षा मिलनी चाहिए, यह एक आदर्श वाक्य है। यह वाक्य जितना आदर्शवादी है उतना ही निर्विवाद भी है। भला कौन कहेगा कि समुचित शिक्षा नहीं मिलनी चाहिए! शायद कोई नही। खैर, इस आदर्श वाक्य को मै दो शब्दों की वजह से अधूरा मानता हूँ। बेहतर होता कि हम ये कहते कि "देश के प्रत्येक बच्चे को 'मन-मुताबिक़' शिक्षा मिले" बजाय कि उपरोक्त वाक्य कहें। शाब्दिक तौर पर दोनों ही वाक्य समानार्थी प्रतीत होते हैं लेकिन व्यहारिकता के स्तर पर प्रयोग होने वाले सिद्धांतों के धरातल पर दूसरा वाक्य ज्यादा सुधारवादी एवं पारदर्शी है। चूँकि किसी बच्चे को शिक्षा मिले यह तो अच्छा है ही, लेकिन वह शिक्षा उसके एवं उसके अभिभावकों की सहूलियत, उनकी इच्छा के अनुरूप मिले, इसका भी ख्याल रखा जाना बेहद जरुरी है। आज से पांच साल पहले ही भारत शिक्षा का अधिकार दे चुका है लेकिन बावजूद इसके हम बच्चों को उनके मन-मुताबिक़ शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार नहीं दे पाए हैं। हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि हर बच्चा शिक्षा के अधिकार के तहत अपने मर्जी के विद्यालय का चयन कर सके, अन्यथा शिक्षा के अधिकार की वर्तमान अवधारणा अधूरी मानी जायेगी। 

अब बड़ा सवाल यह है कि वह कौन सा मॉडल हो जो इस बात को सुनिश्चित कर पाए कि स्कूल चयन करने का अधिकार बच्चे अथवा उसके अभिभावक को है ? इस प्रश्न पर अवश्य विचार होना चाहिए लेकिन पहले वर्तमान में सरकारों द्वारा शिक्षा का अधिकार क़ानून लागू करने के मॉडल पर संक्षिप्त चर्चा की जानी अनिवार्य है। दरअसल वर्तमान मॉडल के अनुसार सरकार का दायित्व है कि वो छ: से चौदह साल तक के हर बच्चे को मुफ्त (हालांकि कुछ भी मुफ्त नहीं होता) शिक्षा की व्यवस्था करे। लेकिन सरकारी तंत्र इसको लागू करने में बुरी तरह असफल रहा। इसके बाद इसे प्राइवेट स्कूलों में भी 25 फीसद कोटे के तहत लागू करने की बात की गयी। सरकार ने प्रावधान तय किया कि निजी स्कूल गरीब बच्चों के लिए 25 फीसद आरक्षित सीट रखें और उन्हें मुफ्त शिक्षा दें, जिसकी भारपाई सरकार 'रिम्बर्समेंट' से करेगी। लेकिन 'रिम्बर्समेंट' की प्रणाली और बुरी तरह फेल हुई। ऐसे में प्राइवेट स्कूलों में एक दीवार खींच गयी गरीब बनाम अमीर बच्चों की।

सरकारें इस बात को समझने में बुरी तरह नाकाम रहीं कि उनका यह मॉडल एक नयी समस्या पैदा कर रहा है। ऐसे में जब सरकार द्वारा आजमाए तमाम मॉडल फेल हो रहे हैं, तो वाउचर अथवा 'डायरेक्ट कैश ट्रांसफर' प्रणाली पर सोचा जाने लगा है। एकबार इस मॉडल पर विचार क्यों न करें कि रिम्बर्समेंट का पैसा स्कूलों को देने की बजाय सीधे 'बच्चे' को दिया जाय? चाहें तो वाउचर के माध्यम से हो अथवा कैश माध्यम हो। अगर ऐसा किया गया तो सबसे पहला फायदा यह होगा कि प्राइवेट स्कूलों में जो गरीब बनाम अमीर बच्चे की दीवार खड़ी हुई है, वो ध्वस्त होगी। कोई भी मुफ्त में पढ़ रहा है, अथवा कोई भी स्कूल किसी बच्चे को मुफ्त में पढ़ा रहा है, जैसी अवधारणायें भी खंडित होंगी। सब अपनी पढ़ाई का शुल्क एक ढंग से स्कूल में जमा करेंगे, चाहें वो गरीब हों या अमीर हों।

इस दिशा में हरियाणा की मनोहर लाल खट्टर सरकार ने व्यापक स्तर पर सुधारवादी कदम उठाने के संकेत दिए हैं। हरियाणा सरकार ने इस थ्योरी को स्वीकार किया है कि अगर रिम्बर्समेंट की राशि विद्यालयों की बजाय सीधे बच्चे अर्थात उसके अभिभावक को दी जाय तो यह ज्यादा कारगर साबित हो सकता है। कुछ अन्य राज्यों में भी इस प्रणाली को प्रयोग में लाने की कोशिशें हो रही हैं। इस दिशा में नेशनल इंडिपेंडेंस स्कूल एलायंस(निसा) ने कई स्तरों पर सरकारों पर दबाव बनाने से लेकर उन्हें समझाने तक के स्तर पर काम किया है। इसी का परिणाम है कि अब विधायिका स्तर के नीति-निर्माता इस बात को लेकर आश्वस्त हो रहे हैं कि बजाय कि स्कूलों को धन देने के सीधे बच्चों को धन मुहैया कराया जाय।

हालांकि समाजवादी एवं साम्यवादी अवधारणा ने हमेशा से समाज को शक की निगाह से देखने का आम चलन विकसित किया है। इस नजरिये से जब कोई सोच रहा होता है तो वो समाज से ज्यादा सरकारी तंत्र पर अंध-विश्वास करने लगता है, जबकि हमारे भारतीय समाज में तमाम चीजें बेहद गैर-सरकारी(राज्य के सन्दर्भ में) सहजता से संचालित होती रही हैं। शिक्षा उनमे से एक है। प्राचीन भारत में शिक्षा कभी राज्य आश्रित नहीं रही है। हाँ राज्य मदद करते रहे हैं क्योंकि वे टैक्स लेते हैं। आज के दौर में जब सशक्तिकरण का मानदंड आर्थिक मजबूती है, ऐसे में 'मुफ्त' की किसी भी प्रणाली से सुधारवादी योजना शुरू करना महज सुधारों के 'यूटोपिया' में जीवन जीना है। हमें समझना होगा कि जहाँ भी दो लोगों के बीच में कोई ऐसा संबंध है जिसमे प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष तौर पर 'अर्थ' जुड़ा है, वहां जवाबदेही का पैमाना भी अर्थ से ही तय होता है। विद्यालय उसकी खुशामद करेंगे जिनसे उन्हें पैसा मिलेगा।

अगर सरकार सीधे विद्यालयों को पैसा देती है तो विद्यालय, शिक्षक भी सीधे सरकार के प्रति जवाबदेह होंगे न कि विद्यार्थी अथवा उसके अभिभावक के प्रति। लेकिन इसके उलट अगर पैसा विद्यार्थी की जेब में हो तो विद्यालय प्रशासन समेत शिक्षक तक उस विद्यार्थी के संतुष्टि की दिशा में प्रयास करेंगे। सरकार अगर विद्यालयों की बजाय बच्चे के अभिभावक को पैसा अथवा वाउचर दे दे तो उस अभिभावक के पास अपने बच्चे के लिए 'स्कूल च्वाइस' का विकल्प मिल जाएगा। वो कई स्कूलों का तुलनात्मक अध्ययन करने के बाद दाखिला कराएगा। ऐसे में विद्यालयों पर यह दबाव होगा कि वो अपनी गुणवत्ता से अभिभावकों को आकर्षित कर सकें। लिहाजा विद्यालयों की गुणवत्ता बढ़ेगी। गरीब का बच्चा भी उतने ही आत्मविश्वास से स्कूल जाएगा जिस आत्मविश्वास से किसी अमीर का बच्चा जाता है। यह सब तब संभव है जब 'रिम्बर्समेंट' की राशि स्कूल की बजाय बच्चे के अभिभावक को दी जाय। हमें अब स्कूल च्वाइस का अधिकार हर अभिभावक और हर बच्चे को देने की जरुरत है। यही वो एकमात्र उपाय दिख रहा है जो शिक्षा के अधिकार को वास्तविक ढंग से धरातल पर उतार पाने में सफल होगा।

- शिवानन्द द्विवेदी

(लेखक डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी फाउंडेशन में रिसर्च फ़लो हैं)