विचारधारा जब विवेक पर हावी हो जाए

विकृत और अक्षम प्रशासनिक तौर तरीकों वाली आरटीई हमारे बच्चों को शैक्षणिक भूखमरी का शिकार बना रही है

कहावत है कि नर्क का मार्ग अच्छी नीयत के साथ तैयार किया जाता है। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि अच्छी नीयत के साथ लाया गया शिक्षा का अधिकार अधिनियम (आरटीई एक्ट) 2009 एक त्रासदीपूर्ण प्रयोग साबित हुआ है। 6 से 14 वर्ष की आयु के बच्चों को शिक्षा का अधिकार सुनिश्चित कराने के बहुप्रचारित उद्देश्योँ के विपरीत आरटीई ने लाखों बच्चों को शिक्षा के अधिकार से वंचित करने का काम किया है क्योंकि कानून के प्रावधानों के कारण बड़ी तादात में स्कूल बंद हो रहे हैं। 
दिल्ली की आम आदमी पार्टी की सरकार ने बेहद कम फीस में गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों के बच्चों को दाखिला देने वाले गैर सहायता प्राप्त निजी स्कूलों को बंद करने के लिए आरटीई एक्ट के सेक्शन 18 और 19 को हथियार बनाया है। कई अन्य राज्य भी चुपचाप इस तरह के कदम उठा रहे हैं।

आरटीई एक्ट के सेक्शन 18 के तहत निजी गैर सहायता प्राप्त स्कूलोँ के लिए सरकारी लाइसेंस (मान्यता) प्राप्त करना आवश्यक है, जिसके लिए संसाधन सम्बंधी सभी मानकोँ पर खरा उतरना और छात्र-शिक्षक के तय अनुपात को पूरा करना होता है। सेक्शन 19 ऐसे स्कूलोँ को बंद करने का आदेश देता है जो मान्यता प्राप्त नहीं हैं। राज्य सरकारोँ ने स्कूलोँ की मान्यता हेतु कई अन्य नियम व शर्ते भी लागू किए हैं।

उपरोक्त बाध्यताओं का उद्देश्य गुणवत्ता में सुधार का था जबकि वास्तव में वैश्विक स्तर पर हुए सैकड़ों अध्ययन और विविध विश्लेषणों (मेटा एनालिसिस) द्वारा यह साबित हुआ है कि निवेश केंद्रीत उक्त दृष्टिकोण पहले से ही वैश्विक स्तर अस्वीकृत किये जा चुके हैं। यहां तक कि राष्ट्रीय स्तर पर एकत्रित आंकड़ें भी यह दर्शाते हैं कि ऐसे स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों के ज्ञान का स्तर, सरकारी स्कूलों के बच्चों के द्वारा अर्जित ज्ञान के स्तर से दोगुना और कई राज्यों में तीन गुना तक अधिक बेहतर है।

वास्तव में, राज्य सरकारोँ का सेक्शन 19 का सहारा लेकर निजी स्कूलोँ के पर कतरने की कोशिश के पीछे गौरवपूर्ण कारण कम ही हैं। सबसे पहला यह कि ऐसा करना राजनैतिक रूप से फायदेमंद है। दरअसल, आरटीई के सेक्शन 12 (जो सभी निजी स्कूलोँ के लिए उनकी सीट का 25% हिस्सा सुविधाहीन वर्ग (डिसएडवांटेज ग्रुप) के बच्चोँ के लिए आरक्षित कराता है) ने पहले से ही खाली हो रहे सरकारी स्कूलोँ के पुराने ट्रेंड को और बढ़ावा दे दिया है। इससे राज्य सरकारोँ को शर्मिंदगी का सामना करना पड़ रहा है। वर्ष 2015-16 में सिर्फ राजस्थान, महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ में ही ऐसे 24,000 सरकारी स्कूलों को बंद करना पड़ा जिनमेँ बच्चोँ के नामांकन की संख्या घटकर 10 से भी कम पहुंच गई थी।

इस तरह स्कूलोँ के बंद होने से सरकार की अयोग्यता उजागर होती है, ऐसे में राज्य सरकारेँ अपनी शर्मिंदगी छिपाने के लिए कम फीस लेने वाले गैर मान्यता प्राप्त स्कूलोँ को दबा रही है, ताकि ये बंद हो जाएँ और यहाँ पढ़ रहे गरीब बच्चे उन सरकारी स्कूलोँ में दाखिला ले लेँ जहाँ शिक्षकोँ की अनुपस्थिति का दर कहीँ ज्यादा है। बच्चोँ के सीखने के परिणाम और इससे देश की उत्पादकता और विकास पर पड़ने वाले भयानक असर के बारे में कोई सोच भी नहीं रहा है। 

दूसरा, सरकार के लिए दोगुने खर्च के दबाव से बचने का सबसे आसान तरीका निजी स्कूलोँ को बंद करा देना लगता है। सरकारी स्कूलोँ के खाली भवनोँ और बहुत अधिक वेतन वाले शिक्षकोँ का प्रबंधन (प्रति छात्र सिर्फ शिक्षक के वेतन का खर्च 2,300 रुपये प्रति माह होता है) कठिन होता है। और इसके अलावा सरकारी स्कूलोँ को छोड़ प्राइवेट स्कूलों में जाने वाले बच्चोँ की शिक्षा के लिए उन स्कूलोँ को पुनर्भुगतान (फी-रिईम्बर्समेंट) करने से सरकार का खर्च और अधिक बढ़ जाता है।

इस सारी समस्या का कारण यह है कि आरटीई एक्ट के नियमोँ को तय करने वाले लोगोँ ने सरकारी स्कूलों के खाली होने के कारणों को नजरअंदाज किया। इसके साथ ही सीखने का खराब होते स्तर के तथ्य की भी अनदेखी की गई, जिसके चलते पैरेंट्स अपने बच्चोँ को प्राइवेट स्कूलोँ में भेज रहे थे। वे मग्न होकर स्कूल तक बच्चों की पहुंच सुनिश्चित करने पर ध्यान केंद्रीत करते रहें। ऐसा करते समय उन्होंने इस बात पर शायद ध्यान भी नहीं दिया कि इनकी जरूरत नहीं है क्योंकि स्कूल जाने की उम्र वाले 96% बच्चे वर्ष 2009 में ही स्कूलों में दाखिला ले चुके थे। 

विरोधाभाष यह है कि आरटीई का सेक्शन 19 सरकारी स्कूलोँ को संसाधन संबंधी खामियों के नियमोँ का उल्लंघन करने की स्थिति के मामले में दंड से मुक्त रखता है। ऐसे में यह जानकर हैरानी नहीं होगी कि वर्ष 2016 तक सिर्फ 6.4% स्कूल ही वास्तव में तय नियमोँ के अनुकूल पाए गए (अगस्त 2016 में एचआरडी मंत्री द्वारा संसद में एक सवाल के जवाब में दिए गए तथ्योँ के अनुसार)। इसका मतलब है कि यह अधिनियम तमाम खामियोँ के बावजूद सरकारी स्कूलोँ को संरक्षण देकर दोहरे मानक लागू करता है।

इस अधिनियम की एक अन्य खामी भी है: इसका सेक्शन 6 राज्य सरकार को हर इलाके में स्कूल खोलने की बाध्यता तय करता है, ऐसे में कानूनी तौर पर राज्य सरकार ऐसे और नए स्कूल खोलने पर मजबूर होती है जिन्हेँ पहले से ही लोग त्याग रहे हैं। आधिकारिक यू-डीआइएसई के आंकड़े बताते हैं कि 2010 से 2016 के बीच सरकारी प्राथमिक स्कूलोँ में दाखिलों की संख्या में 1.8 करोड़ की गिरावट आई है (और मान्यता प्राप्त निजी स्कूलोँ में यह संख्या 1.7 करोड़ तक बढ़ गई है)। सरकारी स्कूलोँ में औसत नामांकन की संख्या 122 से घटकर मात्र 103 तक रह गई है; और छोटे सरकारी स्कूलोँ की संख्या (जहाँ नामांकन की कुल संख्या 50 अथवा इससे भी कम हैं) 3,13,169 से बढ़कर 4,17,193 हो गई है।
इन 4.17 लाख स्कूलोँ का औसत साइज़ मात्र 28 छात्र प्रति स्कूल था, जिसके चलते ये न सिर्फ शैक्षणिक रूप से बल्कि आर्थिक रूप से भी पूरी तरह से अनुपयोगी साबित होते हैं। इन छोटे 4.17 सरकारी स्कूलोँ के शिक्षकोँ के कुल वेतन का बिल 2016-17 में 56,497 करोड़ था (न्यूपा के आंकड़े के अनुसार)। आरटीई नए सरकारी स्कूलोँ को खोलने पर जोर देता है जबकि ये स्कूल तेजी से खाली होते जा रहे हैं, जिसके चलते इनकी विचित्र अक्षमता बढ़ रही है। इसप्रकार, ये विवेक की बजाए सिर्फ एक विकृत विचारधारा बनाने में लगे हुए हैं।

बहुत सारे राज्योँ ने ऐक्ट के सेक्शन 12 को लागू ही नहीं किया है जो गरीब बच्चोँ की प्राइवेट स्कूलोँ तक पहुंच सुनिश्चित करने के लिए है। उत्तराखंड और महाराष्ट्र सरकार ने तो यह कहकर हाथ खडे कर लिए हैं कि हम निजी स्कूलोँ को पुनर्भुगतान के रूप में सैकड़ों करोड़ रूपए का भुगतान नहीं कर सकते हैं। कर्नाटक सरकार की यह दलील है कि ऐक्ट का सेक्शन 12 निजीकरण को बढ़ावा देता है जबकि दूसरी ओर उनके सरकारी स्कूल लगातार खाली होते जा रहे हैं।
कुछ लोग सेक्शन 12 को हिंदू-विरोधी बताते हैं क्योंकि यह सेक्शन सिर्फ गैर-अल्पसंख्यक (खासकर हिंदू) स्कूलोँ पर लागू होता है। निजी स्कूल भी सेक्शन 12 से खुश नहीं है, वे पुनर्भुगतान की दर कम होने, इसके देर से मिलने और इस पूरी प्रक्रिया में भ्रष्टाचार की शिकायत करते हैं। इसके साथ ही उन्हेँ सरकारी गिरफ्त बढ़ने, अफसरों की दखल, स्वायत्तता में कमी और शिक्षा की गुणवत्ता में लगातार गिरावट आने का भय लगता है।

यह एक्ट गलत तरीके से की गई जांच पर आधारित परिणामोँ के मद्देनजर (इनपुट आधारित) तैयार किया गया है और ऐसे में इसके तहत इलाज भी गलत हो रहा है। जबकि जरूरत इस बात की है कि जवाबदेही बढ़ाने वाले सुधार किए जाएँ ताकि सरकारी स्कूलोँ की मौजूदा स्थिति सामने आ सके और वे निजी स्कूलोँ के साथ प्रतिस्पर्धा करने पर मजबूर हो जाएँ। बहुत सारे देशोँ ने पब्लिक फंडिंग (सरकारी और निजी स्कूलोँ को) के रूप में पैरेंट्स को वाउचर देकर बड़े स्तर पर सुधार देखा है, जिससे पैरेंट्स सशक्त होते हैं और आगे चलकर स्कूलोँ की जवाबदेही बढ़ती है।

आने वाली नेशनल एजुकेशन पॉलिसी के जरिए इस नुकसानदायक राइट टु एजुकेशन एक्ट 2009 को खत्म कर देना चाहिए और ऐसे राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय अनुभवोँ पर आधारित नियम लागू किए जाने चाहिए जिससे बच्चोँ के सीखने की दिशा में सुधार हो, न कि एक विचारधारा विशेष अथवा प्रयोग को बढ़ावा दिया जाए। यह देश के करोड़ों बच्चोँ के भविष्य का सवाल है जिनके कंधोँ पर देश का विकास और समृद्धि निर्भर है।

- प्रो. गीता गांधी किंगडन
साभारः टाइम्स ऑफ इंडिया

फोटोः makewayanddo.com से साभार

Add new comment

Filtered HTML

  • Lines and paragraphs break automatically.
  • Allowed HTML tags: <a> <em> <strong> <cite> <blockquote> <code> <ul> <ol> <li> <dl> <dt> <dd>
  • Web page addresses and e-mail addresses turn into links automatically.

Plain text

  • No HTML tags allowed.
  • Web page addresses and e-mail addresses turn into links automatically.
  • Lines and paragraphs break automatically.