शिक्षा का अधिकार कानून के तहत गुजरात ने बनाए नई राह बनानेवाले नियम

शिक्षा के क्षेत्र में भारत सरकार की महत्वपूर्ण पहल थी शिक्षा का अधिकार कानून 2009।इस क्षेत्र के कई पर्यवेक्षकों और विशेषज्ञों की दलील थी कि  इस कानून में कई प्रमुख समस्याएं हैं।यह कानून बच्चों और अभिभावकों के हितों पर फोकस करने के बजाय सार्वजनिक क्षेत्र के आश्रित सेवा प्रदाताओं के हितों पर फोकस करता है। शैक्षणिक प्रक्रिया के साधनों पर ज्यादा ध्यान देता है भले ही उसके नतीजे कुछ भी हों। यह उन प्रायवेट स्कूलों को दंडित करता है जिनके पास साधनों की कमी होती है इस बात का खयाल किए बगैर कि सरकारी स्कूलों के मुकाबले इन स्कूलों की पढ़ाई के नतीजे बेहतर होते हैं।

इसके अलावा इस कानून पर अमल कितना अच्छा या बुरा है यह राज्य सरकारों द्वारा इस कानून के तहत  अधिसूचित नियमों पर निर्भर करता है। इसलिए अब जब संसद ने इस कानून को लागू करना तय किया है तो यह बात बहुत महत्वपूर्ण हो जाती है कि इस बारे में राज्य सरकारें क्या नियम बनाती हैं।

पिछले दिनों गुजरात ने शिक्षा का अधिकार कानून (2009) के नियम अधिसूचित किए हैं। वर्तमान गैर सहायता प्राप्त प्रायवेट स्कूलों की मान्यता के लिए इसमें कई बहुत  नवीनतापूर्ण विचार पेश किए हैं। गुजरात में नियमों का मसौदा तैयार करने के लिए पूर्व मुख्य सचिव सुधीर मंकड की अध्यक्षता में बनी समिति ने आज की भारतीय शिक्षा के समक्ष उपस्थित मुद्दों को समझने की दिशा में महत्वपूर्ण कार्य किया है।

कानून में क्लासरूम का क्षेत्रफल,खेल का मैदान,छात्र-शिक्षक अनुपात आदि जिन साधनो की आवश्यकता पर ध्यान केंद्रीत किया गया है उनके बजाय गुजरात के नियम मान्यता की शर्ते तय करते हुए छात्रों की पढ़ाई के परिणामों पर ज्यादा जोर देते हैं।गुजरात के नियमों का परिशिष्ठ 1 स्कूलों की मान्यता के लिए नई राह बनानेवाला सूत्र है –

  • छात्र की पढ़ाई के परिणाम (पूर्ण स्तर)- 30% महत्व
  • मानक परिक्षणों के द्वारा,स्वतंत्र मूल्यांकन के द्वारा यह जाना जाएगा कि छात्र ने क्या सीखा और उसके सीखने का स्तर क्या है।(पिछले स्कूली परिणाम की तुलना में कितना सुधार हुआ) – 40% महत्व
  • इस बात को यह सुनिश्चित करने के लिए कि स्कूल कमजोर छात्रों को दाखिला नकारकर बेहतर परिणाम न दिखाएं और केवल संपन्न पृष्ठभूमि के छात्रों के आने से जो बेहतर परिणाम दिखते हैं उसका समाधान करने के लिए यह उपाय किए गए हैं. केवल पहले वर्ष यह उपाय उपलब्ध नहीं होगा।तो उसको दिए जाने वाले महत्व को अन्य मापदंड़ों में बांटा जाएगा।
  • साधन (सुविधाओं सहित, शिक्षकों की योग्यता)- महत्व 15 प्रतिशत
  • छात्र के गैर अकादमिक नतीजे(को- करिक्यूलर, खेल, व्यक्तित्व और मूल्य)और अभिभावकों का फीडडबैक –महत्व 15 प्रतिशत

इसे तय करने के लिए छात्र की गैर अकादमिक क्षेत्रों में उपलब्धियां और अभिभावकों के फीडबैक का सहारा लिया जाएगा।कला,खेल और सांस्कृतिक गतिविधियों को महत्व देने के लिए मानक सर्वे उपकरण तैयार  किए जाने चाहिए। अभिभावकों के फीडबैक के मामले में रैंडम सर्वे किया जाए और कम से कम बीस अभिभावकों के फीडबैक के नमूने लिए जाएं और उन्हें संकलित किया जाए।

भारत के इतिहास में पहली बार लोकनीति में फोकस सार्वजनिक क्षेत्र के शिक्षा प्रदाता सेवाओं के बजाय छात्रों और अभिभावकों पर है।

इसके अलावा गुजरात के शिक्षा  का अधिकार कानून के नियमों में अन्य राज्यों की तुलना में  ज्यादा सूक्ष्म और लचीला नजरिया अपनाया गया है।उदाहरणार्थ कक्षा के आकार और छात्र-शिक्षक अनुपात को निरपेक्ष रूप से नहीं वरन सापेक्ष रूप में परिभाषित किया गया है।इसमें भी कक्षा का क्षेत्रफल 300 वर्ग फीट वांछित है। लेकिन किसी मामले में कक्षा का क्षेत्रफल कम है तो उसे फिर से बनानेपर जोर देने के  के बजाय नियम उन्हें अलग छात्र सिक्षक अनुपात के जरिये समाविष्ठ कर लेता है। उसका फार्मूला यह है –छात्र शिक्षक अनुपात =(कक्षा का क्षेत्रफल वर्गफीट में – 60)/8।यह नजरिया न केवल छोटी कक्षाओं को अस्तित्व में बने रहने की इजाजत देता है वरन स्कूल को बुनियादी ढांचे को ज्यादा बेहतर ढंग से प्रबंधित करने की अनुमति देता है। यदि कोई प्रायवेट स्कूल मान्यता के नियमों को पूरा नहीं कर पाता तो शिक्षा का अधिकार कानून के नियम स्कूल को मान्यता खतम कर देते हैं और उसे बंद करने को मजबूर करते हैं।इस तरह स्कूल के अचानक बंद होने से छात्रों और अभिभावकों के लिए समस्या पैदा हो सकती है और उन्हें कोई पड़ोस में कोई और स्कूल ढूंढना पड़ेगा इसलिए गुजरात के नियम राज्य को स्कूल को अधिग्रहित करने या तीसरे पक्ष को प्रबंधन हस्तांतरित करने की अनुमति देते हैं। इस तरह स्कूल को बने रहने और नियमों का पालन करने का अवसर देते हैं।यह बताता है कि गुजरात के नियमों का फोकस छात्रों और अभिभावकों के हितों पर है।

यह नजरिया बाकी राज्यों के मुकाबले बहुत बेहतर है जहां मान्यता के नियम केवल साधनों के पैमाने को पूरा करने पर(खेल का मैदान,क्लासरूम का क्षेत्रफल और छात्र शिक्षक अनुपात) आधारित और जटिल हैं।गुजरात की सोच शहरी और अर्धशहरी क्षेत्रों में सस्ते प्राइवेट स्कूलों द्वारा दिए गए महत्वपूर्ण योगदान को स्वीकार करती है। जहां भूमि और भवन बहुत बहुत खर्चीले हैं। असल में बहुत से सरकारी स्कूल भी शिक्षा का अधिकार कानून में निर्दिष्ट साधन आवश्यकताओं के कठोर  पैमाने पर खरे नहीं उतरेंगे।

- पार्थ शाह

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