राजनैतिक हित साधने के उपकरण के रूप में तब्दील हो जाएगा आरटीईः निसा (भाग एक)

केंद्र सरकार द्वारा वंचित व कमजोर वर्ग को गुणवत्ता युक्त शिक्षा सुनिश्चित कराने के लिए लागू किया गया शिक्षा का अधिकार (आरटीई) कानून स्वयं ही सर्वशिक्षा अभियान की राह में सबसे बड़ा रोड़ा साबित होता प्रतीत हो रहा है। कानून में समाहित कुछ प्रावधान ऐसे हैं जिनसे देशभर के लाखों निजी (बजट) प्राइवेट स्कूल बंद होने की कगार पर पहूंच गए हैं। अकेले दिल्ली में ही 13 हजार से ज्यादा स्कूलों पर तालाबंदी का खतरा मंडरा रहा है। इसके साथ ही इन स्कूलों में पढ़ने वाले लाखों नौनिहालों का भविष्य भी अंधकारमय हो गया है। दुष्परिणामों से भरे आरटीई के इन्हीं प्रावधानों के खिलाफ आवाज उठाने के उद्देश्य से देशभर के 6 हजार से ज्यादा प्राइवेट स्कूल एसोसिएशनों के महागठबंधन के तौर पर उभरा नेशनल इंडिपेंडेंट स्कूल एसोसिएशन (निसा) आज किसी परिचय का मोहताज नहीं है। स्थापना के एक वर्ष से भी कम समय के भीतर ही आठ राज्यों के 12 हजार से अधिक प्राइवेट बजट स्कूलों को अपने अभियान में शामिल कर निसा ने अपने लक्ष्य की ओर मजबूत कदम बढ़ाए हैं। प्रस्तुत है ‘निसा’ के राष्ट्रीय संयोजक आर.सी. जैन से उक्त मसलों पर अविनाश चंद्र से बातचीत के मुख्य अंशः

सबसे पहले हमें यह बताईए कि निसा है क्या? और इसके गठन की जरूरत क्यों पड़ी?

आर.सी. जैनः निसा, छोटे बजट प्राइवेट स्कूलों का राष्ट्र स्तरीय महा गठबंधन “नेशनल इंडिपेंडेंट स्कूल एलायंस” का संक्षिप्त स्वरूप है। शिक्षा का अधिकार कानून के तहत छोटे-छोटे बजट प्राइवेट स्कूलों के हितों पर पड़ने वाले इसके दुष्प्रभावों के खिलाफ आवाज उठाने के लिए वर्ष 2011 में इस महागठबंधन का गठन हुआ। निसा से अबतक आठ राज्यों के लगभग 6 हजार प्राइवेट स्कूल एसोसिएशनों के प्रतिनिधियों के माध्यम से 12 हजार स्कूल प्रबंधन सीधे जुड़ चुके हैं। स्कूल प्रबंधकों के रूझानों को देखते हुए जल्द ही इस संख्या में ईजाफा होने की उम्मीद है।

बजट प्राइवेट स्कूल से आपका क्या तात्पर्य है? और शिक्षा का अधिकार कानून किस प्रकार उनके हितों को प्रभावित कर रहा है?

आर.सी. जैनः बजट प्राइवेट स्कूलों से हमारा तात्पर्य ऐसे छोटे-छोटे निजी स्कूलों से है जो कम शुल्क में गुणवत्तायुक्त शिक्षा प्रदान करते हैं। ये स्कूल मोहल्ले के ऐसे स्कूल होते हैं जो छोटे परिसरों में संचालित होते हैं और थोड़े से शुल्क में गुणवत्तायुक्त शिक्षा प्रदान करते हैं। बजट स्कूल वर्ग में 100 रूपए से लेकर 700-800 रुपए तक फीस वसूलने वाले स्कूलों को शामिल किया गया है। दरअसल, आरटीई में भवनों के आकार, प्लेग्राउंड की अनिवार्यता, अध्यापकों को न्यूनतम वेतन प्रदान करने जैसे कुछ ऐसे प्रावधान किए गए हैं जिनको छोटे स्कूल पूरा नहीं कर सकते। सरकार द्वारा यह स्पष्ट कर दिया गया है कि यदि निश्चित समय के भीत उक्त प्रावधानों का पालन नहीं किया जाता है तो ऐसे स्कूलों की मान्यता रद्द कर दी जाएगी। मान्यता रद्द होने से ये स्कूल जहां बंद हो जाएंगे वहीं लाखों छात्रों के समक्ष भी समस्या उत्पन्न हो जाएगी।

लेकिन इन प्रावधानों को मानने में परेशानी क्या है?

आर.सी. जैनः आरटीई के प्रावधानों को यदि देखा जाए तो यह स्पष्ट है कि नीतियों के निर्धारण के समय व्यवहारिक बातों की पूरी तरह से अनदेखी की गई है। देश की जनता सिर्फ योजनाबद्ध तरीके से बनी कॉलोनियों में ही नहीं रहती बल्कि गैर नियोजित और अनधिकृत कॉलोनियों में भी आबादी का बड़ा तबका निवास करता है। उन कॉलोनियों में सरकारी स्कूल नहीं होते और आर्थिक स्थिति के मद्देनजर वहां के छात्र ज्यादा फीस भी नहीं दे सकते। यदि इक्का दुक्का सरकारी स्कूल आस पड़ोस के इलाके में हो भी तो वहां के शिक्षा के स्तर को देखते हुए परिजन पैसा खर्च कर भी अपने बच्चों को निजी स्कूलों में भेजते हैं। ये स्कूल अपने दम पर छोटे छोटे परिसरों में चलते हैं और उन्हें सरकारी सहायता भी नहीं मिलती। ऐसे स्कूलों को डीडीए भी जमीन नहीं देती है और घनी बस्तियों में होने के कारण स्कूलों के पास विस्तार का विकल्प भी नहीं होता। अब यदि स्कूल प्ले ग्राउंड बना पाने में असमर्थ हैं या कम फीस वसूलने के कारण अध्यापकों को सरकारी स्कूलों के बराबर वेतन देने में सक्षम नहीं हैं तो उनपर बंदी का खतरा मंडराने लगा है। इसके साथ ही लाखों बच्चों का भविष्य भी अंधकारमय हो गया है। हमारी एक आपत्ति यह भी है कि सभी स्कूलों में ईडब्लूएस कोटे के तहत 25 प्रतिशत सीटें आरक्षित करने के प्रावधान के भविष्य में राजनैतिक उपकरण के तौर पर विकसित होने का खतरा उत्पन्न हो गया है। क्या गारंटी है कि आने वाली सरकारें वोटबैंक की नीति के तहत इस 25 प्रतिशत आरक्षण को बढ़ाकर 50 प्रतिशत या 60 प्रतिशत नहीं करेंगी।

इन परिस्थितियों से निबटने के लिए आप लोग क्या कदम उठा रहे हैं?

आर.सी. जैनः इन परिस्थितयों से निबटने और सरकार तक अपनी बात पहुंचाने के लिए देशभर के हजारों स्कूल प्रबंधकों और स्कूल एसोसिएशनों ने एकजुटता का परिचय देते हुए महागठबंधन बनाया है और कार्यशालाओं और चर्चा परिचर्चा के माध्यम से अपनी बात सरकार तक पहुंचा रहे हैं। एकजुटता का एक लाभ यह है कि सरकार अब हमारी बातों को गंभीरता से सुनने लगी है और कम से कम समाधान का आश्वासन भी देने लगी है।

(जारी है...)
- अविनाश चंद्र