पूंजीवाद संपत्ति पैदा करवाता है बड़े सहज ढंग से - ओशो

मैंने सुना है ख्रुश्चैव के बारे में एक मजाक। ख्रुश्चैव एक पार्टी मीटिंग में बोल रहा था।बोलते वक्त वह स्टालिन की निंदा कर रहा था। तो एक आदमी ने पीछे से खड़े होकर कहा कि महाशय ,स्टैलिन के जिन कामों की आप निंदा कर रहे हैं और कह रहे हैं कि लाखों लोगों की हत्या की ,साइबेरिया भेजा ,जेल में डाला सारे मुल्क को खून में डुबो दिया। जो ये बातें आप कह हे हैं,जब स्टालिन यह सब कर रहा था तब भी आप स्टालिन के साथ थे। तब आप कहां चले गए थे। ख्रुश्चैव एक मिनिट के लिए चुप हो गया। फिर उसने कहा ,जिन महाशय ने ये बात कही है ,कृपा करके अपना नाम और पता बता दें।लेकिन वह फिर नहीं उठा।फिर ख्रुश्चैव ने कहा ,कृपा करके उठकर अपनी शक्ल ही दिखा दें,लेकिन उस आदमी का कोई पता नहीं चला।फिर ख्रुश्चैव ने कहा जिस वजह से आप दोबारा नहीं उठ रहे हैं उसी वजह से मैं चुप रह गया था। जिंदा रहना था तो चुप रहना जरूरी था।
 
पूंजीवाद संपत्ति पैदा करवाता है बड़े सहज ढंग से । किसी के पीछे कोई कोड़ा नहीं है ,किसी के पीछे कोई बंदूक नहीं है। लेकिन व्यक्ति की अपनी छोटी सी दुनिया है,उसकी अपनी प्रेरणा है। अगर मेरी पत्नी बीमार है तो मैं रातभर काम कर सकता हूं। लोकिन कोई कहे कि मनुष्यता बीमार है तो सोचूंगा –होगी।मनुष्यता तो इतने दूर की बात हो जाती है कि उससे कोई संबंध नहीं बनता। उससे कोई प्रेरणा पैदा नहीं होती। अगर कोई मुझसे कहता है कि मेरे बेटे को पढ़ाना है तो मैं गड्ढा खोद सकता हूं भरी धूप में।,लेकिन कोई मुझे कहता है कि मनुष्यता को शिक्षित करना है तो बात धुएं में खो जाती है।कहीं मेरे ऊपर उसकी कोई चोट नहीं पहुंचती है। अगर कोई मुझसे कहता है कि एक घर बनाना है अपने लिए।अपने लिए छाया करनी है और बगिया बनानी है जिसमें फूल खिलेंगे तो समझ में आती है बात। जब कोई राष्ट्र के बगीचे की बात करने लगता है तब बात खो जाती है।
 
मनुष्य की चेतना का दायरा बहुत छोटा है ,वैसे ही जैसे दिये का प्रकाश चार पांच फुट के आसपास पड़ता है। ऐसे ही आदमी की चेतना है । उसकी चेतना बहुत छोटे से घेरे पर पड़ती है। जिस घेरे पर पड़ती है उसी का नाम परिवार है। अभी आदमी  परिवार से ज्यादा बड़े घेरे के य़ोग्य नहीं है। परिवार के बाहर जैसा बड़ा घेरा होता जाता है वैसे ही आदमी सुस्त होता  चला जाता है,उसकी प्रेरणा खोती चली जाती है । राष्ट्र मनुष्यता,मनुष्य जाति ,विश्व इतने बड़े घेरे हैं कि मनुष्य की चेतना पर इनका कोई परिणाम नहीं होता। पूंजीवाद ने उसकी चेतना के आधार पर संपत्ति के सृजन की एक दौड पैदा की है और पूंजीवाद ने संपत्ति पैदा की है और ज्ञान पैदा किया है।
 
ईसा के मरने के अठारह सौ पचास वर्षों में जितना ज्ञान पैदा नहीं हुआ पूंजीवाद के डेढ सौ वर्षों में उतना ज्ञान पैदा हो गया। पिछले ड़ेढ सौ वर्षों में जितना ज्ञान पैदा हुआ इधर पंद्रह वर्षों में उतना ज्ञान पैदा हुआ।पिछले पंद्रह वर्षों में जितना ज्ञान पैदा हुआ है उतना इधर पांच वर्षों में ज्ञान पैदा हुआ है।पुरानी दुनिया जहां अठारह सौ पचास वर्षों में जितना काम करती थी वह पूंजीवाद की दुनिया पांच साल में पूरा कर रही है। एक चमत्कार है लेकिन हम पूंजीपति को गाली दिए चले जा रहे हैं बिना यह समझे कि वह मार्ग तैयार कर रहा है जहां से संपत्ति बरस जाएगी। वह मार्ग तैयार कर रहा है जहां वह प्रत्येक व्यक्ति को संपत्ति के सृजन में संलग्न कर देगा। वह मार्ग तैयार कर रहा है जहां से संपत्ति धीरे –धीरे अतिरेक में हो जाएगी और जिस दिन संपत्ति अतिरिक्त जाएगी उस दिन पूंजीवाद का बेटा सहज पैदा होगा।
 
- ओशो

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