राष्ट्रीय शिक्षा नीति को लेकर गंभीर नहीं हरियाणा सरकारः एफपीएसए

स्कूली शिक्षा को लेकर हरियाणा सरकार के मन में सम्मान की भावना बिल्कुल नहीं है, और ना ही यह नई शिक्षा नीति को लेकर गंभीर है। निजी स्कूलों की फेडरेशन लगभग दो महीने से शिक्षा का अधिकार (आरटीई) व 134ए की गलत नीतियों के खिलाफ जिला स्तर पर धरना प्रदर्शन और हड़ताल कर रही है किंतु राज्य सरकार को इससे कोई फर्क नहीं पड़ रहा है। ऐसा सुनने में आ रहा है कि नई शिक्षा नीति के बाबत विभिन्न राज्यों द्वारा प्राप्त अनुशंसाओं को लेकर आगामी 31 अक्टूबर को उत्तर भारतीय राज्यों की एक बैठक बुलाई गई है। किंतु हमें खेद के साथ कहना पड़ रहा है कि इस नई शिक्षा नीति के बाबत हरियाणा सरकार ने अबतक फेडरेशन से विचार नहीं मंगाए हैं। हमारे परामर्श के बगैर बनाई गई कोई भी शिक्षा नीति निर्रथक होगी और न तो हम इसे स्वीकार करेंगे और ना ही इसे लागू करेंगे।

 

हमारी फेडरेशन निजी स्कूलों में पढ़ने वाले छात्रों के प्रति सरकार की भेदभाव पूर्ण नीतियों के खिलाफ है। हमारी मांग है कि गरीब, अमीर, उच्च अथवा दलित सभी वर्ग के छात्रों के लिए समान व्यवहार होना चाहिए और इसके लिए देश में 15सौ रूपए प्रति छात्र शिक्षा वाऊचर देने की मांग करते हैं। वर्तमान में सरकार, सरकारी स्कूलों में प्रति छात्र 3हजार रूपए खर्च करती है। यह सरकारी कर्मचारियों और अल्पसंख्यकों के बच्चों के ट्यूशन फीस की प्रतिपूर्ति भी करती है। इसके अतिरिक्त यह निजी स्कूलों के 25 प्रतिशत छात्रों के अलग अलग फीस की प्रतिपूर्ति करती है। किंतु यह निजी स्कूलों में पढ़ने वाले अन्य गरीब छात्रों के उपर एक पैसा भी खर्च नहीं करती है। यह बिल्कुल गलत है और इसका परिणाम यह है कि आरटीई लागू होने के पांच वर्ष बाद भी लाखों बच्चे स्कूली व्यवस्था के बाहर हैं। यदि सभी छात्रों को स्कूल वाउचर प्रदान किए जाए तो एक वर्ष के भीतर देश में सभी बच्चे साक्षर हो सकेंगे और छात्रों के पास अपने पसंद के स्कूलों में दाखिला लेने की आजादी भी होगी।

 

सत्ता धारी दल व अन्य दल निजी स्कूलों के स्कूल बसों को अपनी रैलियों में भेजने का दबाव डालते हैं। यह गैरकानूनी है क्योंकि स्कूल बसों को अपनी तयशुदा रास्तों के इतर जाना पड़ता है। यदि स्कूल बस के साथ कोई हादसा हो जाता है तो इसके लिए इंश्योरेंस क्लेम नहीं किया जा सकता है और किसी के घायल होने अथवा मौत होने की दशा में जेल भी जाना पड़ता है।

 

यहां तक कि प्रधानमंत्री को भी अध्यापकों और स्कूली छात्रों से कोई लेना देना नहीं है। अध्यापक दिवस के दिन उन्होंने अध्यापकों की अनदेखी की और छात्रों को संबोधित किया। अब बाल दिवस के दिन उनके पास छात्रों के लिए समय नहीं है। हरियाणा सरकार की योजना इस दिन अध्यापक पात्रता परीक्षा (एचटीईटी) का आयोजन कराने की है ताकि निजी स्कूल बाल दिवस का आयोजन न कर सकें। सरकार के इस व्यवहार की हम कड़ी निंदा करते हैं।

 

हरियाणा सरकार ने खुलेआम कहा है कि निजी स्कूल शिक्षा की दुकानें हैं जबकि यह सरकार ही है जो निजी स्कूलों के साथ व्यावसायिक उद्यम के जैसा व्यवहार करतीं हैं। सरकार स्कूलों से व्यवसायिक दर से बिजली, पानी और संपत्ति कर वसूल करती है। सरकार को यह निर्णय कर लेना चाहिए कि निजी स्कूल व्यावसायिक गतिविधियों के तहत आते हैं अथवा सेवा उपक्रम के तहत। हम हरियाणा सरकार के द्वारा निजी स्कूलों के खिलाफ अपनायी जाने वाली नकारात्मक भावना की कड़ी निंदा करते हैं।

 

- कुलभूषण शर्मा, राष्ट्रीय उपाध्यक्ष, निसा

 

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