शेर की सूरत और कलेजा चूहे का

नरेंद्र मोदी के फैंस चाहते हैं कि वह गुजरात का विकास मॉडल पूरे देश में लागू करें। उन्हें लगता है कि सख्त दिखने का जोखिम उठा सकने वाले मोदी ऐसे फैसले लेने में कोई कोताही नहीं बरतेंगे, जो फौरी तौर पर भले तकलीफदेह लगें, लेकिन आगे चलकर अच्छे नतीजे देंगे। उन्हें भरोसा है कि चुनाव प्रचार के दौरान किए गए वादों के मुताबिक वह हिंदुस्तानियों को खैरात पर पलने वाली जमात नहीं बल्कि तेज आर्थिक विकास से उपजे अवसरों का आकांक्षी समुदाय मानकर चलेंगे। लेकिन अफसोस कि पिछले हफ्ते लिए गए मोदी के तमाम फैसले इतने पॉप्युलिस्ट, रीढ़विहीन और घबराहट भरे साबित हुए कि उनके सामने मनमोहन सिंह भी पानी भरें।
 
बैक गियर में रेल
फरवरी में मनमोहन सिंह ने रेल किरायों में 14.2 फीसदी और माल भाड़े में 6.5 फीसदी बढ़ोतरी का प्रस्ताव किया था। इसके अलावा उन्होंने लोकल मंथली पास की कीमत 15 यात्राओं से बढ़ाकर 30 यात्राओं के बराबर करने का भी प्रस्ताव किया था। चुनाव आयोग ने लोकसभा चुनावों के मद्देनजर इन प्रस्तावों पर अमल को स्थगित करवा दिया था। नई सरकार ने इन कांग्रेस-प्रस्तावित दरों पर 25 जून से अमल करने का आदेश दिया, लेकिन विरोध शुरू होने पर पीछे हट गई। एक्सपर्ट्स के मुताबिक घाटे से उबरने के लिए यात्री किराये 50 फीसदी बढ़ाए जाने चाहिए। सप्ताह में 6 दिन काम करने वाले कस्बाई यात्री अमूमन एक महीने में 56 यात्राएं करते हैं, लेकिन मंथली पास में पैसा सिर्फ 15 यात्राओं का देते हैं।
 
पॉप्युलिस्ट रेल मंत्री दशकों से यात्रियों को सब्सिडी देने के लिए माल भाड़े को अतिरिक्त रूप से महंगा करते जा रहे हैं। इससे उद्योगों की लागत कृत्रिम तौर पर बढ़ती गई और निर्यात में हमारी कॉम्पिटीटिवनेस पर बुरा असर पड़ा। अपने चुनाव प्रचार अभियान में मोदी ने महंगी बुलेट ट्रेन लाने के साथ-साथ रेलवे का जबर्दस्त विस्तार करने का भी वादा किया था। चीन के सालाना 90 अरब डॉलर (5,40,000 करोड़ रुपए) के रेल बजट के मुकाबले में आने के लिए भारत को रेलवे पर अपना निवेश लगभग दस गुना बढ़ाने की जरूरत है। इसके लिए रेलवे को एक कमर्शल बिजनेस की तरह चलाना जरूरी है।
 
उम्मीद के मुताबिक जब यात्रियों ने विरोध शुरू किया तो मोदी को उन्हें बताना चाहिए था कि बढ़ोतरी न केवल जरूरी है बल्कि वर्ल्ड क्लास रेल सिस्टम बनाने के लिहाज से यह अभी काफी कम है। लेकिन ऐसा करने के बजाय उन्होंने लड़े बिना ही हथियार डाल दिए। सेकंड क्लास के यात्रियों की 80 किलोमीटर तक की यात्रा अब इस बढ़ोतरी से मुक्त रहेग। मंथली पास की कीमत भी 30 यात्राओं के बराबर न होकर पहले की तरह 15 यात्राओं के बराबर ही रहेगी। क्यों? इसलिए कि मोदी आगामी महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों में मुंबई के रेल यात्रियों के वोट खरीदना चाहते हैं। उनका यह कदम कांग्रेसी सरकारों जितना ही कायराना है।
 
भारत का चीनी उद्योग लंबे समय से गड़बड़झाले का शिकार रहा है। वजह यह कि राज्य सरकारें शुगर मिलों की लागत या उनके अर्थशास्त्र का ध्यान रखे बगैर मनमाने ढंग से गन्ना मूल्य निर्धारित करती रही हैं। उनका मकसद सिर्फ गन्ना किसानों के वोट हथियाने का रहा है। नतीजा यह कि चीनी मिलें जबर्दस्त घाटे में आ गईं। वे किसानों को भुगतान नहीं कर सकीं और धीरे-धीरे किसानों के दसियों हजार करोड़ रुपए मिलों पर बकाया रह गए। यह पागलपन जल्द से जल्द बंद होना चाहिए। मगर, मोदी सरकार ने पिछले हफ्ते चीनी निर्यात पर सब्सिडी बढ़ा दी, चीनी के आयात पर शुल्क बढ़ा दिया और पेट्रोल में मिलाए जाने वाले एथनॉल की मात्रा 5 फीसदी से बढ़ा कर 10 फीसदी कर दी। इस पूरी कवायद का मकसद यह है कि चीनी मिलें किसी तरह गन्ना किसानों को बकाये का भुगतान कर सकें। यानी मूर्खताओं के आधार पर चल रहे एक सिस्टम को सुधारने के बदले मोदी ने अतिरिक्त मूर्खताओं के जरिए उसे चलाते रहने की कोशिश की है। क्यों? इसलिए कि महाराष्ट्र एक बड़ा गन्ना उत्पादक राज्य है और मोदी यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि आने वाले विधानसभा चुनाव में वहां के किसान उन्हें ही वोट दें।
 
गैस का भी वही हाल
कांग्रेस सरकार ने इतनी हिम्मत जुटाकर प्राकृतिक गैसों की कीमत 1 अप्रैल से दोगुनी करने का फैसला किया था, ताकि ये वैश्विक कीमतों के करीब आ जाएं। इससे ओएनजीसी जैसी कंपनियों के लिए गहरे समुद्र में स्थित भंडारों से भी गैस निकालने का खर्चीला काम हाथ में लेना संभव हो जाता। इस फैसले पर अमल पहले चुनाव आयोग ने स्थगित किया और अब मोदी सरकार ने इसे सितंबर तक के लिए टाल दिया है। मनमोहन सिंह ने हिम्मत दिखाई थी, पर मोदी नहीं दिखा पाए। बेशक, मोदी का मूल्यांकन महज एक सप्ताह के बेरीढ़ फैसलों के आधार पर नहीं होना चाहिए। हमें उन्हें और वक्त देना होगा ताकि वे यह साबित कर सकें कि कठिन फैसलों के जरिए वे हिंदुस्तान की हालत सुधार सकते हैं। मगर, इसके लिए कथनी और करनी में तालमेल जरूरी है। इसके बजाय अगर वे बड़ी-बड़ी बातें करके वापस पॉप्युलिज्म के खोल में छिप जाना जारी रखते हैं तो उन पर यह मुहावरा फिट बैठेगा- 'शेर की सूरत और कलेजा चूहे का।'
 
 
- स्वामीनाथन एस अंकलेसरिया अय्यर
साभारः नवभारत टाइम्स