वास्तविक उपभोक्ताओं तक पहुंचने में कारगर है डायरेक्ट कैश ट्रांसफर स्कीम

नोबेल पुरस्कार विजेता प्रसिद्ध अमेरिकी अर्थशास्त्री मिल्टन फ्रीडमैन ने सन् 1980 में लिखी अपनी पुस्तक 'फ्री टू चूज़' में धन खर्च किए जाने की प्रक्रिया को अध्ययन की सरलता के लिए चार हिस्सों में वर्गीकृत किया था। पहला, आप अपना धन स्वयं पर खर्च करते हैं। दूसरा, आप अपना धन किसी और पर खर्च करते हैं, तीसरा आप किसी और का धन स्वयं पर खर्च करते हैं और चौथा, आप किसी और का धन किसी और पर खर्च करते हैं। उदाहरणों के माध्यम से फ्रीडमैन ने स्पष्ट किया था कि धन खर्च करने का पहला तरीका सबसे ज्यादा किफायती और सर्वाधिक उपयोगिता प्रदान करने वाला होता है। धन खर्च करने का दूसरा तरीका किफायती होता है लेकिन उपयोगिता को लेकर संशय होता है। तीसरा तरीका किफायती नहीं होता लेकिन सर्वाधिक उपयोगिता प्रदान करता है और चौथा तरीका न तो किफायती होता है और न ही सर्वाधिक उपयोगिता वाला होता है। 

इसे उदाहरण के माध्यम से समझते हैं। यदि मुझे अपने लिए एक शर्ट खरीदनी है तो मेरा प्रयास किफायती दाम में श्रेष्ठ उपगोगिता वाला शर्ट खरीदना होगा, किंतु यदि मुझे किसी और के लिए अपने पैसे से शर्ट खरीदना है तो मेरा प्रयास किफायती शर्ट खरीदने का होगा भले ही वह दूसरे के लिए श्रेष्ठ उपयोगिता वाली हो अथवा नहीं। इसी प्रकार, यदि मेरी शर्ट का पैसा कोई और चुका रहा है तो मेरा प्रयास कीमत की परवाह न करते हुए श्रेष्ठ उपयोगिता वाला शर्ट खरीदने का होगा जबकि यदि किसी और के पैसे से मुझे किसी और के लिए शर्ट खरीदना होगा तो उसके किफायती और श्रेष्ठ उपयोगिता दोनों होने की प्राययिकता न्यूनतम होगी।

अब सरकार के खर्च करने के व्यवहार को उपरोक्त चार तरीकों के आधार पर वर्गीकृत करें तो किसी (टैक्सपेयर्स) और से एकत्रित धन को किसी और पर खर्चने का यह तरीका चौथे अर्थात् गैरकिफायती, गैरउपयोगी तरीके में आता है। अतः यदि कल्याणकारी सरकार वास्तव में जनता का कल्याण करना चाहती है तो उसे चाहिए कि वह जरूरतमंद को उसकी जरूरत की वस्तु स्वयं खरीदने का मौका उपलब्ध कराए। हालांकि इससे पहले उसे असल जरूरतमंद को पहचान कर अलग करना होगा। दरअसल, सरकारें और नीति निर्धारक आमतौर पर जरूरतमंदों को अधिकतम सहायता प्रदान करने की बजाए वस्तुओं की कीमत नियंत्रित (सब्सिडी) कर सबको वह सुविधा उपलब्ध कराने के प्रयास में लग जाती हैं। जिससे न केवल उक्त सेवा के दुरुपयोग की संभावना बढ़ जाती है बल्कि पात्र व्यक्ति को उक्त सेवा उपलब्ध कराने की राह में भी तमाम चुनौतियां उत्पन्न हो जाती हैं।

इसे सरकारों द्वारा गरीबों के नाम पर बिजली बिल पर दी जाने वाली सब्सिडी के एक और उदाहरण से समझ सकते हैं। जब बिजली कम कीमत पर प्रदान की जाती है तो कुछ लोगों की क्रयशक्ति के बराबर आ जाती है और वे उससे अपनी जरूरतें पूरी कर पाने में सक्षम हो जाते हैं किंतु अधिकांश लोगों के लिए यह अत्यंत सस्ती हो जाती है और वे उसको लापरवाही से खर्च करना शुरू कर देते हैं। इससे बिजली की किल्लत बनी रहती है और सरकार सबकी जरूरतें पूरी करने में असफल हो जाती है। पर्याप्त बिजली उत्पादन करने के प्रयास में पर्यावरण की अनदेखी भी शुरू हो जाती है। ठीक इसी प्रकार सब्सिडाइज्ड रेट पर उपलब्ध पेयजल के कारण एक तरफ जहां लोग उसी पेयजल से कारें व पार्किंग धोना शुरू कर देते हैं वहीं वास्तविक जरूरतमंद तक आवश्यक मात्रा में पानी ही उपलब्ध नहीं हो पाता।

अब यदि सरकार जरूरतमंद लोगों की पहचान कर सिर्फ उन्हें रियायती बिजली प्रदान करे और अन्य लोगों को यह साधारण दर पर उपलब्ध कराए तो न केवल बिजली के दुरुपयोग को रोका जा सकेगा बल्कि पर्यावरण को ज्यादा हानि भी नहीं पहुंचेगी। ठीक इसी प्रकार, आर्थिक रूप से सक्षम लोगों से पेयजल का वास्तविक मूल्य वसूला जाए और सिर्फ जरूरतमंद को कम दर पर यह सेवा दी जाए तो पानी की बचत के साथ साथ जरूरतमंदों को यह पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध भी हो सकेगा।

अब प्रश्न यह है कि ऐसा किया कैसे जाए? कुछ वर्ष पूर्व बिहार सरकार ने स्कूली छात्राओं को साइकिल प्रदान करने की योजना के तहत उन्हें साइकिल की कीमत के बराबर नगद धनराशि प्रदान की। यह योजना इतनी सफल रही कि देश के कुछ गिनी चुनी सफल योजनाओं में शुमार हो गई। यदि सरकार स्वयं साइकिल खरीदने और उन्हें बांटने का काम करती तो भ्रष्टाचार, कमीशनखोरी, खराब गुणवत्ता जैसी तमाम समस्याएं सामने आई होतीं किंतु जब लोगों ने स्वयं साइकिल खरीदना शुरू किया तो उन्होंने न केवल जांच परख कर अच्छी और टिकाऊ साइकिल खरीदी बल्कि अपनी उपयोगिता के हिसाब से बड़ी, मध्यम अथवा छोटे साइज और स्टाइल की खरीदीं। कुछ लोगों ने अपने पास से अतिरिक्त पैसे लगाकर और बेहतर साइकिलें भी खरीदीं।

कुछ इसी प्रकार का कार्य वर्तमान केंद्र सरकार लोगों को गैस सब्सिडी के पैसे डायरेक्ट उनके खाते में उपलब्ध कराकर कर रही है। इसके लिए गैस कनेक्शन धारकों को महीने में एक निश्चित संख्या में गैस सिलेंडरों पर दी जाने वाली सब्सिडी के बराबर की राशि उनके खाते में पहुंचाई जा रही है। इसकी मॉनिटरिंग के लिए गैस खातों को आधार कार्ड व बैंक खातों से जोड़ा गया है। इस योजना से जहां गैस सिलेंडरों का घरेलू उपयोग की बजाए व्यवसायिक अथवा अन्य कामों में इस्तेमाल पर रोक लगी वहीं लोगों को सस्ती मिलने वाली गैस के बचत के लिए भी प्रोत्साहन मिलने लगा। साथ ही गैस एजेंसियों व डिलीवरी मैनों के द्वारा कालाबाजारी पर भी रोक लगाने में सफलता मिली।

पहले होता यह था कि एक व्यक्ति सरकारी मशीनरी की मिलीभगत से एक से अधिक राशन कार्ड, मतदाता पहचान पत्र, गैस कनेक्शन इत्यादि प्राप्त कर लेता था और न केवल मार्केट में वस्तुओं की कृत्रिम कमी पैदा कर देता था बल्कि सब्सिडी का भी जमकर दुरूपयोग करता था। उधर, जरूरतमंदों के लिए वस्तुएं या तो उपलब्ध नहीं हो पाती थी या मजबूरीवश इसके लिए उन्हें ज्यादा मूल्य चुकाना पड़ता था। अब मौजूदा व्यवस्था में चूंकि सभी बैंक अकाउंट, मतदाता पहचान पत्र, राशन कार्ड इत्यादि को फिंगर प्रिंट, आंखों की पुतलियों के बायोमेट्रिक पहचान आदि वाले आधार नंबर से जोड़ा जा रहा है इसलिए एक व्यक्ति के द्वारा सरकारी लाभ के दुहराव पर रोक लगाने में सफलता मिली है।

ध्यान रहे कि डायरेक्ट कैश ट्रांसफर स्कीम के कारण वर्ष 2016 में सरकार ने लगभग 50 हजार करोड़ रूपए बचाए हैं। यह वह धनराशि है जो विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं को अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाने के क्रम में जाया हो जाया करते थे। यही कारण हैं कि इस स्कीम की सफलता से उत्साहित हो सरकार द्वारा इसे राशन वितरण प्रणाली (पीडीएस), उर्वरक सब्सिडी, बीमा योजना सहित सैकड़ों अन्य क्षेत्रों में लागू किए जाने के प्रयास जारी हैं। इस योजना की खास बात यह है कि सब्सिडी का पैसा उक्त सेवा के इस्तेमाल के बदले में मिल रही है जो कि वास्तविक लाभार्थी द्वारा उक्त सेवा के इस्तेमाल करने की पुष्टि करती है। न कि अंब्रेला सब्सिडी की भांति जहां किसी एक सेवा हासिल करने के लिए उपलब्ध धन को दूसरी जगह इस्तेमाल किए जाने की सदैव आशंका बनी रहती है।

- अविनाश चंद्र (श्यामा प्रसाद मुकर्जी रिसर्च फाउंडेशन द्वारा प्रकाशित 'परिवर्तन की ओर' पुस्तक से साभार)