इस तरह आंध्रप्रदेश ने सफाया किया माओवादियों का

Andhra.jpg

आंध्रप्रदेश सरकार माओवादी हिंसा पर प्रभावी ढंग से काबू पाने के लिए अपनी पीठ थपथपा सकती है। वैसे सारे देश को ही उसकी पीठ थपथपानी चाहिए। पिछले तीस वर्षों के दौरान वर्ष 2011 पहला मौका है जब राज्य में माओवादी हिंसा में  भारी कमी आई है। इस साल माओवादी हिंसा के केवल 41 मामले दर्ज हुए, छह लोगों की जानें गईं और कोई भी पुलिसवाला हिंसा का शिकार नहीं बना। यह आंकंड़े बताते है  कि माओवादी हिंसा से सबसे ज्यादा त्रस्त इस राज्य ने पिछले तीन दशकों में माओवादी हिंसा से लगातार संघर्ष करने के बाद उसपर प्रभावी तरीके से नियंत्रण पाने में महत्वपूर्ण सफलता पाई है। ऐसे समय जब हाल ही में कई राज्यों में नक्सली हिंसा की वारदातों में तेजी आई है और राज्य सरकारे उस पर काबू पाने में नाकाम रही हैं। यही नहीं केंद्रीय सरकार और राज्य सरकारों द्वारा चलाया गया आपरेशन ग्रीन हंट ठंड़ा पड़ चुका है तब माओवादी आतंक के अंधेरे में रोशनदान की तरह है आंध्रप्रदेश।

माओवादी पशुपति से तिरुपति तक आजाद लाल क्षेत्र बनाने का सपना भले ही पाले हों लेकिन उनका  यह सपना अब पूरा होता नजर नहीं आता क्योंकि दूसरे सिरे यानी तिरुपति वाले राज्य में उनकी हालत बेहद कमजोर हो चुकी है। ऐसे समय जब देश के कई राज्यों में माओवादी आतंक गंभीर खतरा बन कर उभरा है और प्रधानमंत्री मनमोहनसिंह ने कहा कि देश की आतंरिक सुरक्षा के लिए माओवाद सबसे बड़ा खतरा है। ऐसे माहौल में आंध्रप्रदेश एक अपवाद बनकर उभरा है जहां पूर्व मुख्यमंत्री राजशेखर रेड्डी के नेतृत्व में सरकार माओवादी हिंसा के फन कुचलने में कामयाब रही। बाद की सरकारों ने भी रेड्डी की रणनीति पर कठोरतापूर्वक अमल किया जिसके नतीजे अब सामने आ रहे हैं।

रेड्डी की सरकार ने नक्सलियों से निपटने के लिए जो ग्रे हाउंड नामक आधुनिक हथियारों और ट्रेनिंग से सुसज्जित सुरक्षा बल बनाया था वह माओवादियों के लिए आतंक बन गया जिसके कारण माओवादी रणबांकुरे रणछोड़ बन गए और आज आलम यह है कि माओवादी आतंक के घुप्प अंधेरे में आंध्रप्रदेश एक रोशनदान की तरह है। केंद्र सरकार माओवाद प्रभावित राज्यों को सलाह दे रही है कि वे नक्सल समस्या से निपटने के लिए आंध्रप्रदेश के माडल को अपनाएं।

कभी आंध्रप्रदेश नक्सलियों या माओवादियों का सबसे अभेद्य दुर्ग हुआ करता था। 1980 में पीपुल्स वार ग्रुप नामक माओवादी संगठन की स्थापना हुई थी। उस वर्ष  माओवादी हिंसा की 38 घटनाएं दर्ज हुईं थी जिसमें छह हत्याएं भी शामिल थीं। यह हिंसा 1991 में अपने चरम पर पहुंच गई जब पुलिस ने माओवादी हिंसा की 953 घटनाएं दर्ज कीं और उसमें 178 नागरिक और 49 पुलिसवाले मारे गए। राज्य के 23 में से 21 जिले माओवादी हिंसा से प्रभावित थे। खासकर वर्ष 1990 (145 मौतें), 1991 (227 मौतें), 1992 (212मौतें) और 1993 (143 मौतें) माओवादी हिंसा की दृष्टि से सबसे खराब थे। आज की भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) का सबसे प्रमुख और शक्तिशाली घटक पीपुल्स वार ग्रुप इसी राज्य में सक्रिय था इसलिए माओवादियों का प्रभाव भले ही कई राज्यों में फैल गया हो लेकिन उसके प्रमुख नेता महासचिव गणपति या किशन जी आदि आंध्रप्रदेश के ही हैं। 2004 में पीपुल्स वार ग्रुप और एक अन्य माओवादी संगठन पीपुल्स कोर्डीनेशन कमेटी के विलय से वर्तमान भाकपा (माओवादी) का गठन हुआ था। इस विलय से माओवादियों की ताकत कई गुना बढ गई और वे झारखंड, बिहार, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र और ओडिशा में आतंक बन गए। ये राज्य माओवादी आतंक के सामने इतने असहाय बन गए लगते हैं। एक मोटा अनुमान है कि हर साल पांच सौ लोग नक्सली हिंसा का शिकार बन रहे हैं। लेकिन ये राज्य नक्सली चुनौती से निपट पाने में पूरी तरह नाकाम रहे हैं।

आतंकवाद विशेषज्ञ पीवी रमन के अध्ययन पत्र के मुताबिक आध्रप्रदेश कई दशकों से नक्सलवाद की चुनौती से जूझ रहा था। इस दौरान उसने इस चुनौती से निपटने के लिए एक तरीका विकसित किया। शुरूआत में नेतृत्व नक्सल चुनौती से निपटने को लेकर पर्याप्त रूप से संवेदनशील नहीं था। लेकिन हालात बदले। 1996-97 में राजनीतिक दलों में एक आमराय बनी कि नक्सली आतंक का हर हाल में मुकाबला करना है। इस तरह नेतृत्व द्वारा दिखाई गई राजनीतिक इच्छाशक्ति और प्रतिबद्धता ने राज्य में माओवादियों के मामले में रणनीति विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। आंध्रप्रदेश की माओवादी विरोधी अभियान की सफलता का राज केवल ग्रे हाऊण्ड कमांडों जैसा अधुनिक प्रशिक्षण और हथियारों से लैस सुरक्षा बल बनाने में ही नहीं है वरन इसमें राज्य पुलिस में लंबे समय तक निरंतर लड़ने की क्षमता विकसित करना, उनके सघन प्रशिक्षण का इंतजाम और खुफिया तंत्र को बला का चुस्तदुरुस्त बनाना आदि भी शामिल है। लेकिन इस सबका लाभ यह हुआ कि 2003 से अबतक 800 माओवादी मुठभेड़ों में मारे गए जिनमें उनके 50 नेता भी शामिल हैं। केवल 2003 में 300 माओवादी कार्यकर्ता मारो गए जिनमें चार उनके चोटी के नेता भी थे। इसके अलावा सैंकड़ो माओवादी या तो गिरफ्तार के गए या उन्होंने आत्मसमर्पण कर दिया। इसके बावजूद माओवादी 2008 में एक ऐसी बड़ी आतंकी बारदात करने में कामयाब रहे जिसमें 33 ग्रे हाऊंड कमांडो सहित 36 पुलिसवाले मारे गए।

आंध्रप्रदेश की चंद्रबाबू नायडू की सरकार माओवादियों के साथ हमेशा ही कठोरतापूर्वक पेश आती रही और माओवादियों ने भी उसके जवाब में अपनी गतिविधियां तेज कर दीं थीं। माओवादियों ने एक बार नायडू की हत्या करने की भी कोशिश की। लेकिन 2004 के चुनाव से पहले कांग्रेस ने घोषणा की कि वह यदि जीतती है तो टकराव का रास्ता छोड़कर माओवादियों के साथ बातचीत करेगी। कांग्रेस के विरोधियों का यह आरोप रहा है कि इस चुनाव में माओवादियों ने कांग्रेस की मदद की जिसके कारण ही कांग्रेस दोबारा सत्ता मे लौटने में कामयाब रही। सत्तारूढ होने के बाद कांग्रेस ने अपना बादा निभाया और माओवादियों के साथ बातचीत शुरू की। मगर माओवादी सशस्त्र संघर्ष का रास्ता छोडने के लिए राजी नहीं थे। वे बातचीत के दौरान अपनी ताकत को बढ़ाने और संगठित करने में लगे रहे और बातचीत टूटने के बाद उन्होंने अपनी गतिविधियां और तेज कर दीं।

तब राजशेखर रेढढी की सरकार को माओवादियों की चुनौती को गभीरता से लेने को मजबूर होना पड़ा और उसने ईंट का जवाब पत्थर से देना शुरू किया। राज्य में माओवादी चुनौती का सामना करने के लिए विशेष तौर पर बनाए गए सुरक्षा बल का आधुनिकीकरण करके उसे एक लडाका बल बनाया गया जो आतंक फैलानेवाले माओवादियों के लिए आतंक बन जाए। इसका नतीज यह हुआ कि राज्य में माओवादी वारदातों और उनका शिकार बननेवालों की संख्या में कमी आई। ग्रे हाउण्ड ने ऐसा कमाल दिखाया कि कई माओवादी मुठभेड़ों में मारे गए। नक्सली नेता अपने इलाके छोड़कर भागने पर मजबूर हो गए। कइयों को आत्मसमर्पण करने को बाध्य होना पड़ा। नतीजा यह हुआ है कि कभी माओवादियों के अभेद्य दुर्ग रहे आंध्रप्रदेश में नक्सली घुटने टेक चुके हैं। आतंक तो दूर वे अपनी जान बचाकर भागने लगे। हालांकि यह कहना सही नहीं होगा कि राज्य में माओवादियों का सफाया हो गया लेकिन यह तो हकीकत है कि राज्य की माओवादी वारदातों में भारी कमी आई है।

वैसे राज्य सरकार के इस माओवादी विरोधी अभियान में पुलिस, केंद्रीय रिजर्व पुलिस और राज्य के खुफिया तंत्र की भी महत्वपूर्ण भूमिका है। राज्य सरकार ने इन्हें भी चुस्त दुरुस्त और आधुनिक बनाने पर पूरा ध्यान दिया। इसके अलावा माओवादियों द्वारा आत्मसमर्पण को भी बढ़ावा दिया और समर्पण करनेवाले माओवादियों के विकास का पुख्ता इंतजाम भी किया। नक्सल हिंसा का शिकार बने लोगों और पुलिसवालों के पनर्वास के ले भी नीति बनाई। सबसे बड़ी बात रही कि सरकार ने माओवादी समस्या को केवल कानून–व्यवस्था की समस्या नहीं माना वरन माओवाद प्रभाविक इलाकों के त्वरित विकास के लिए कई विकास कार्यक्रम शुरू किए। इनमें सुदूर क्षेत्र विकास कार्यक्रम, अंदरूनी क्षेत्र विकास कार्यक्रम, जलयज्ञम और इंदिराम्मा आदि कार्यक्रम प्रमुख हैं। इन सबने माओवादी चुनौती से निपटने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। आंध्रप्रदेश इस बात की मिसाल है यदि सही सोच और सही रणनीति बनाई जाए तो माओवादी हिंसा से प्रभावी ढंग से निपटा जा सकता है।

 -सतीश पेड़णेकर