बेतुके कानूनों की कहानी

लगातार कई बछिया देने के बाद आपकी गाय ने बछड़ा दिया है। आप खुश हैं कि चलो अब आपकी खेती की मुश्किलें दूर होंगी। आप चाहते हैं कि बछड़ा बड़ा होकर बैल बने और खेत जोतने के काम आए। लेकिन संभव है कि कोई सरकारी अधिकारी आपके पास आए और आपको बताए कि आप बछड़े को बैल नहीं बना सकते और आपको उसे सांड बनाना पड़ेगा। आपके कारण पूछने पर वह इसे प्रशासन द्वारा क्षेत्र के हित में लिया गया फैसला बता सकता है। इतना ही नहीं यदि आपने उसकी बात नहीं मानी तो यह भी संभव है कि वह उसे जब्त कर ले, या आप पर जुर्माना ठोंक दे। जी हां, दिल्ली में सन् 1940 में बना द मद्रास लाइवस्टॉक इम्प्रूवमेंट एक्ट कानून लागू होता है जिसके मुताबिक राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में रहने वाले गाय पालकों को बछड़ा पैदा होने की दशा में प्रशासन को इसकी लिखित सूचना एक नियत समय के भीतर देने और संबंधित अधिकारी से बछड़े को सांड या बैल बनाने की अनुमति के लिए आवेदन करने का प्रावधान है। आवेदन प्राप्त होने पर अधिकारी के आपके घर आने व आसपास के माहौल व आवश्यकता के निरीक्षण के पश्चात बछड़े के बैल अथवा सांड बनाने की अनुमति जारी करने का अधिकार है। अर्थात् आप यह फैसला नहीं कर सकते कि बछड़ा बैल बनेगा या सांड, बल्कि उक्त अधिकारी करेगा। यह अलग बात है कि दिल्ली के शहरीकृत इलाकों में न अब पशुपालक हैं, न ही गायें और न ही ऐसा विभाग ही अब अस्तित्व में है। इसके बावजूद कानून की किताब में यह कानून अब भी मौजूद है।

क्या आपको लगता है कि जब हम मंगल ग्रह पर जा चुके हों और देश में बुलेट ट्रेन को चलाने की कवायद चल रही हो वहां ऐसा भी कानून हो सकता है जहां बैल को पालने के लिए लाइसेंस लेना पड़े। ये कानून एक बानगी भर हैं। हमारे देश में कानूनों की किताबों में ऐसे हजारों कानून भरे पडे हैं जो अब गैरजरूरी और अप्रसांगिक हो गए हैं। ऐसा ही एक और कानून है, जो सौ साल पुराना है। 'पंजाब मिलिट्री ट्रांसपोर्ट एक्ट 1916'। इस कानून के तहत सेना परिवहन के मकसद से दिल्ली के लोगों के जानवर, वाहन, नाव व अन्य को कब्जे में ले सकती है। बदलते वक्त के साथ क्या अब सेना को दिल्ली के जानवरों की जरूरत है, यह अपने आप में शायद सभी को हास्यास्पद लगेगा। अब तो दिल्ली में तांगे भी नहीं चलते, जानवरों की सवारी तो दूर की बात है। 

भारत में सन 1834 से लेकर अब तक 6612 कानून वजूद में आ चुके हैं इसमें से 2781 अब भी केन्द्रीय सूची में मौजूद हैं।1834 से लेकर 26 जनवरी 1950 हमारे संविधान के लागू होने तक 2911 कानून केन्द्रीय सूची में मौजूद थे। 26 जनवरी 1950 से अभी तक 66 सालों में 3701 कानून केन्द्रीय सूची में शामिल हो चुके हैं। दिक्कत ये है कि हमारे यहां नया कानून तो बन जाता है लेकिन पुराने कानून को वैसे ही छोड़ दिया जाता है। जिससे लाल फीताशाही को बढ़ावा मिलता है और अधिकारियों को भ्रष्टाचार करने व बचने का चोर रास्ता भी। उदाहरण के लिए आजादी पूर्व का भारत का इंडियन फॉरेस्ट एक्ट 1927। इस एक्ट में बांस को पेड़ के तौर पर वर्गीकृत किया गया है और इसकी कटाई पर सर्वथा रोक है। वन्य उत्पाद होने के नाते जंगलों में इसकी कटाई तो प्रतिबंधित है ही आसपास की निजी जमीन पर भी इसे उगाने, काटने और बाजार में बेचने पर प्रतिबंध है। हालांकि वैज्ञानिक अध्ययनों से यह साबित हो चुका है कि बांस पेड़ नहीं घास की एक प्रजाति है। दुनिया के तमाम देशों ने बांस को घास के तौर पर वर्गीकृत करते हुए इसकी कटाई और व्यावसायिक उत्पादन पर से रोक हटा ली है। तमाम देशों ने बांस के व्यापक प्रयोग के मद्देनजर अनेकानेक तकनीकि भी विकसित कर ली है और अपनी अर्थव्यवस्था को बढ़ाने व रोजगार पैदा करने में सफलता भी प्राप्त कर ली है। बांस के महत्व, उपयोगिता, पर्यावरण हित आदि को देखते हुए हमारे देश में भी वर्ष 2006 में फॉरेस्ट राइट एक्ट पास किया गया। इस कानून में बांस को नॉन टिंबर के तौर पर वर्गीकृत करते हुए इसकी कटाई से रोक हटा ली गई। किंतु नया कानून लागू होने के बावजूद पुराने कानून को समाप्त नहीं किया गया। फलस्वरूप तमाम राज्य व वहां के नौकरशाह अपनी सुविधा के अनुसार पुराने कानून को लागू करते हुए बांस के उत्पादन, कटाई आदि पर अपना नियंत्रण रखे हुए हैं। इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि लकड़ी की आवश्यकता को पूरा करने के लिए अब भी हम पेड़ों की कटाई पर ही निर्भर हैं वहीं अगरबत्ती से लेकर अन्य छोटी छोटी वस्तुओं के उत्पादन के लिए भी हमें चीन से आयातीत बांस पर निर्भर रहना पड़ता है। यदि नया कानून बनाने के साथ साथ उससे संबंधित पुराने कानून को तुरंत खत्म कर दिया जाए तो संशय वहीं खत्म हो जाए। 

मई 2014 में प्रधानमंत्री की शपथ लेने के बाद नरेन्द्र मोदी ने कहा था कि उनकी सरकार कामकाज में रुकावट डालने वाले पुराने कानूनों की पहचान कर उन्हें समाप्त करेगी। हालांकि ऐसा पहली बार नहीं हुआ जब पुराने कानूनों को समाप्त करने की बात चली हो। इससे पहले अटल बिहारी वाजयेपी की अगुवाई में एनडीए सरकार ने पीसी जैन कमेटी बनाई जिसने 1382 कानूनों को रद्द करने की सिफारिश की। उसमें से 315 कानून सन 2004 तक समाप्त कर दिए गए। 

बाकी अप्रसांगिक कानूनों को खत्म करने के लिए प्रधानमंत्री मोदी ने अगस्त 2014 में सचिव आर रामानुजम की अगुवाई में एक कमेटी बनाई। इस कमेटी ने 287 ऐसे कानूनों की पहचान की जो मौजूदा समय में अप्रांसगिक हैं उनमे से 72 को तुरंत खत्म की जरूरत बताई गई। इस तरह अब तक 415 पुराने कानूनों को कई किश्तों में अब तक समाप्त किया जा चुका है लेकिन अभी भी सैंकडों ऐसे कानून हैं जो वक्त के साथ पुराने पड़ चुके हैं। ऐसे ही करीब 25 पुराने कानूनों को सेंटर फॉर सिविल सोसायटी ने आई जस्टिस के साथ मिलकर खोज निकाला है जो कानूनों की किताबों में तो मौजूद हैं लेकिन जिनकी अब 21वीं सदी में कोई जरूरत नहीं रह गई है। इसकी वजह ये है कि बदलते वक्त के साथ पुराने पड़ चुके हैं या फिर उनकी जगह किसी नए कानून ने ले ली है। इन कानूनों को खत्म करने के लिए सेंटर फॉर सिविल सोसायटी की टीम ने लॉ कमिशन ऑफ इंडिया के सदस्यों से मुलाकात की और उन्हें बताया कि कैसे ये कानून मौजूदा समय में अवांछनीय और अप्रासंगिक रह गए हैं। अगर मौजूदा सरकार इन कानूनों को खत्म कर देती है तो इससे गफलत की स्थिति से तो बचा ही जा सकेगा साथ ही बेहतर रूल ऑफ लॉ को भी लागू करने में मदद मिलेगी। 

- नवीन पाल (लेखक टीवी पत्रकार व स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

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