मील का पत्थर साबित होगी कर्नाटक सरकार की यह पहल

पहली बार कर्नाटक सरकार ने एक प्रस्ताव दिया जिसका उद्देश्य था लोगोँ के लिए व्यक्तिगत स्तर पर स्कूल की शुरुआत करना और उसे चलाना आसान बनाना। प्रस्ताव के अनुसार, एक शैक्षिक संस्थान खोलने के लिए कोई भी प्राइवेट बॉडी लिमिटेड लायबिलिटी पार्टनरशिप (एलएलपी) रजिस्टर  कराकर काम कर सकती है, उसके लिए एक सोसायटी अथवा चैरिटेबल ट्रस्ट बनाकर कार्य करने की बाध्यता नहीं होगी। लेकिन इसकी शर्त यह होगी कि इनका प्राथमिक उद्देश्य शिक्षा ही होगा और संस्थान नॉन-प्रॉफिट शेयरिंग आधार पर ही चलेगा।

पहल से कम हुई शुरुआत की बाध्यता
यह एक ऐसी पहल है जो स्कूली शिक्षा के क्षेत्र में निजी भागीदारी बढ़ाने की ओर एक कदम है, क्योंकि इसके जरिए कानूनी बाध्यताएँ कम हो गई। सामान्य स्थिति में, नियम बेहद जटिल हैं, आवेदन के प्रक्रिया से लेकर जमीन आवंटन के लिए सोसायटी/ट्रस्ट के पंजीकरण हेतु तमाम तरह के लाइसेंस की जरूरत होती है (उदाहरण के तौर पर दिल्ली में अगर कोई प्राइवेट स्कूल खोलना चाहता है तो उसे तमाम चरणोँ से गुजरना होता है और तकरीबन 15 तरह के लाइसेंस हासिल करना होता है)। तमाम तरह के अनुमति पत्र और सर्टिफिकेट हासिल करने की बाध्यताएँ पूरी प्रक्रिया को बेहद जटिल और अधिक समय लेने वाली बना देती है। और ट्रस्ट में कोई भी फैसला बोर्ड ऑफ ट्रस्टी की सहमति से हो सकता है।

ये सारी औपचारिकताएँ कई बार गैर जरूरी, खर्चीली और बेमतलब होती हैं खासतौर से प्राइमरी और प्री-प्राइमरी स्तर पर। आज के दौर में भी ऐसे इलाके खोज पाना मुश्किल नहीं है जहाँ स्कूल और अन्य शैक्षणिक संस्थान जरूरत की तुलना में बेहद कम हैं। यह भी स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है कि एक सोसायटी का रजिस्ट्रेशनऔर मेंटेनेंस के लिए कितनी जटिल प्रक्रियाओँ से होकर गुजरना पड़ता है।

इसका मतलब है कि शिक्षकोँ को प्रशासनिक कार्योँ से सम्बंधित कागजी कार्यवाई में अधिक समय देना पड़ता होगा और शैक्षणिक गतिविधियोँ के लिए उनके पास कम समय बचता होगा। इतना ही नहीं शिक्षा सम्बंधी योग्यताएँ होने के बावजूद अगर किसी के पास प्राशासनिक अनुभव नहीं है तो वह स्कूल खोल ही नहीं सकता। अगर नियम कम होँ तो प्रशासनिक अधिकारियोँ की लाल फीताशाही का सामना भी कम करना पड़ता है। यह प्रस्ताव शिक्षा के क्षेत्र में प्राइवेट सेक्टर की सहभागिता की जरूरत की पहचान हो सकता है और इस क्षेत्र में प्राइवेट सेक्टर की एंट्री को आसान बना सकता है। यह प्रस्ताव शिक्षा क्षेत्र की बेहतरी हेतु सामाजिक सहभागिता में वृद्धि की एक उम्मीद भी है।

प्रतिस्पर्धा, पोषकोँ की जवाबदेही और नवीनता
अब किसी भी क्षेत्र में अधिक से अधिक लोगोँ की भागीदारी के फायदे सर्वविदित हैं। जैसा कि तमाम इंडस्ट्रीज के उदाहरण जैसे कि मीडिया व टेलीकॉम आदि में देखने को मिले हैं, जहाँ अधिक से अधिक भागीदारी ने प्रतिस्पर्धा को जन्म दिया है और प्रतिस्पर्धा में बने रहने हेतु सतत नवीनता भी देखने को मिल रही है। शिक्षा के क्षेत्र में भी अधिक विकल्प होने की वजह से न सिर्फ छात्रोँ को बेहतर शिक्षा का अवसर मिलता है बल्कि शिक्षकोँ को रोजगार के बेहतरीन अवसर मिलते हैं और शिक्षा क्षेत्र से सम्बंधित अन्य उद्योगोँ का विकास भी होता है। कुछ हिस्सोँ में यह हर किसी के लिए यह शिक्षा का बेहतर और आसान रास्ता उपलब्ध कराने का साधन भी बन सकता है। 

निजी भागीदारी का नहीं है विकल्प: आंकड़े कर रहे हैं बयान
वर्ष 2011 की जनगणना के आंकड़े बताते हैं कि स्कूल से बाहर रहने वाले बच्चोँ के आंकड़े 2005-06 के 1.3 मिलियन के मुकाबले 2009-10 में बढ़कर 8.1 मिलियन हो गए। इससे साफ पता लगता है कि अब भी मांग और आपूर्ति के बीच भारी गैप है। विकास के स्तर को देखेँ तो चुनौतियोँ पर खरा उतरने के मामले में सरकारी स्कूल पूरी तरह से फेल दिखाई देते हैं। इसका नमूना दाखिले के समय दिखाइ देने वाले तनाव के रूप में हर साल सामने आता है, जब अभिभावक प्राइवेट स्कूलोँ के बाहर घंटोँ लाइन में खड़े रहते हैं।

इसकी एक वजह लोगोँ की यह सोच भी है कि प्राइवेट स्कूल पब्लिक स्कूलोँ की तुलना में बेहतर होते हैं, यही वजह है कि लोगोँ की प्राथमिकता प्राइवेट स्कूल ही होते हैं। “प्राइवेट स्कूलिंग फेनामनन इन इंडिया’ नामक एक रिसर्च पेपर जो कि लेखक द्वारा रॉ डिस्ट्रिक्ट इंफॉर्मेशन सिस्टम फॉर एजुकेशन (डीआईएसई) के डाटा एनालिसिस पर आधारित है। लेखक ने वर्ष 2010-11से 2014-15 के बीच 20 प्रमुख राज्योँ के डाटा का आंकलन किया। इसके मुताबिक, इस समय अंतराल में सरकारी स्कूलोँ में दाखिलोँ की संख्या में 11.1 मिलियन यानी 1 करोड़ 11 लाख की गिरावट आई। दूसरी तरफ प्राइवेट स्कूलोँ में होने वाले दाखिलोँ की संख्या में इस दौरान 16 मिलियन यानी 1 करोड़ 60 लाख की वृद्धि हुई। चौंकाने वाली बात यह है कि ऐसा उस स्थिति में हुआ जब इन चार वर्षोँ में सरकारी स्कूलोँ की संख्या में 16,376 की वृद्धि हुई। गीता गांधी किंग्डम की स्टडी के मुताबिक प्राइवेट स्कूलोँ में 71,360 स्कूलोँ की वृद्धि हुई। लेकिन पहली बार प्रथम एनजीओ की एनुअल स्टेटस ऑफ एजुकेशन रिपोर्ट (एएसईआर), जो कि ग्रामीण भारत पर आधारित है में कहा गया कि देश भर में प्राइवेट स्कूलोँ में 6-14 साल की उम्र के बच्चोँ के दाखिलोँ की संख्या में कोई बदलाव नहीं आया है। वर्ष 2014 में यह संख्या 30.8% थी जो कि 2016 में 30.5% हो गई, जबकि देशभर में प्राइवेट स्कूलोँ की संख्या में लगातार वृद्धि हुई है। उधर किंग्डम का रिसर्च पेपर सरकारी प्राइमरी स्कूलोँ के साइज में औसतन 10% की गिरावट बताई गई है। रिपोर्ट के मुताबिक, वर्ष 2010 से 2015 के बीच सरकारी स्कूलोँ के औसत साइज में 12% तक की गिरावट आई है जबकि प्राइवेट स्कूलोँ के साइज में 3 फीसदी की वृद्धि देखी गई है, जबकि प्राइवेट स्कूलोँ की संख्या काफी वृद्धि हुई है।

ये आंकड़े साफ बता रहे हैं कि सरकारी शिक्षा पर से लोगोँ का भरोसा हट रहा है। तमाम रिपोर्ट यह पुष्टि करते हैं कि अभिभावक अपने बच्चोँ को प्राइवेट स्कूल में ही भेजना चाहते हैं, क्योंकि उन्हे ऐसा लगता है कि इन स्कूलोँ का अकादमिक स्तर सरकारी स्कूलोँ से बेहतर है और यहाँ पढ़ाई के लिए बेहतर माहौल मिलता है। एक नैशनल सैम्पल सर्वे रिपोर्ट (एनएसएसओ) के मुताबिक सरकारी के बजाय प्राइवेट स्कूलोँ को प्राथमिकता देने के पीछे कई कारण हैं, जैसे कि कुछ लोग मानते हैं कि वहाँ सीखने के लिए बेहतर माहौल मिलेगा, कुछ लोगोँ का मानना है कि सरकारी स्कूलोँ की शिक्षा का स्तर संतोषजनक नहीं है, तो कुछ लोग इसलिए प्राइवेट स्कूल को प्राथमिकता देते हैं क्योंकि यहाँ शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी है। प्रजा फाउंडेशन द्वारा अप्रैल-जून 2016 में पूरी दिल्ली में कराए गए एक सर्वे में पाया गया कि एमसीडी स्कूलोँ को अभिभावकोँ द्वारा पसंद न करने की 3 प्रमुख वजहेँ हैं। 67% अभिभावकोँ का मानना है कि एमसीडी स्कूल में पढ़करभविष्य के लिए बेहतर विकल्प नहीं मिलेंगे। 59% ने माना कि यहाँ शिक्षा की गुणवत्ता संतोषजनक नहीं है और 58% ने कहा कि यहाँ के शिक्षक उतने अच्छे नहीं हैं। इसी प्रकार से राज्य सरकार द्वारा चलाए जा रहे स्कूलोँ के सम्बंध में भी अभिभावकोँ ने अपने विचार रखे। 58% ने कहा कि भविष्य के लिए स्कोप कम हैं, 52% ने कहा शिक्षा की गुणवत्ता ठीक नहीं है और 46% ने कहा कि छात्रोँ को उपलब्ध सुविधाएँ अच्छी नहीं हैं।

हालांकि, यह बताना बेहद जरूरी है कि एएसईआर 2016 की रिपोर्ट के अनुसार दो राज्योँ के सरकारी स्कूलोँ में दाखिलोँ की संख्या में 2014 के मुकाबले वृद्धि देखी गई है। ये राज्य हैं केरल व गुजरात। इस रिपोर्ट के अनुसार देश भर के सरकारी स्कूलोँ के बच्चोँ की रीडिंग की क्षमता (खासतौर से शुरुआती कक्षाओँ में) में सुधार देखा गया है, वहीँ प्राइमरी ग्रेड्स के बच्चोँ में गणित सम्बंधी क्षमताओँ में सुधार आया है।

एक छोटी शुरुआत भर है प्रस्ताव
कर्नाटक सरकार का प्रस्ताव कोई सिल्वर बुलेट नहीं है। शुरुआत की राह आसान बना देना सिर्फ एक मामूली राहत भर है क्योंकि स्कूल चलाने के लिए तय प्रशासनिक झमेलोँ का दायरा बहुत वृहद है। लाइसेंस राज के कष्टकारी झमेले शिक्षा के क्षेत्र में उतरने के लिए तैयार इंवेस्टरोँ को डराने के लिए काफी हैं। अगर ऐसी पॉलिसी बनाई जाए जिसके जरिए सिंगल विंडो क्लियरेंस की व्यवस्था हो तब कुछ बेहतर होगा। प्राइवेट शैक्षिक संस्थानोँ के तेज प्रसार के मामले में एक रुकावट इनवेस्टर मिलने में कठिनाई भी है, क्योंकि को भी ऐसे क्षेत्र में पैसा क्योँ लगाना चाहेगा जहाँ से लाभ कमाने की उम्मीद नहीं कर सकते। स्कूली शिक्षा के क्षेत्र में निजी क्षेत्र की भागीदारी को प्रोत्साहन देने हेतु दिए गए सुझावोँ के तहत 2014 फेडरेशन ऑफ इंडियन चैम्बर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (फिक्की) ने अपनी रिपोर्ट में सुझाव दिया था कि इनपुट पर आधारित नियमोँ को कम किया जाए और आउटकम यानी परिणाम आधारित सिस्टम बनाया जाए। हालांकि कर्नाटक सरकार क प्रस्ताव राज्य में सर्व शिक्षा को गति देने की दिशा में एक सराहनीय कदम है। यह बड़ेबदलाओँ की ओर बढ़ते कदम की एक उम्मीद साबित हो सकता है जो राज्य की शिक्षा पर काफी असर डालेगा।

- मिहिका बसु (लेखिका फ्रीलांस जर्नलिस्ट हैं।)

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