भारत के पक्ष में बन रहा माहौल

पहले ग्रीस का आर्थिक संकट और बाद में चीन में मंदी और अब ईरान पर से वैश्विक प्रतिबंधों का हटना। एक एक करके परिस्थितियां भारत के पक्ष में झुकती प्रतीत हो रही हैं। भले ही ग्रीस की अर्थव्यवस्था से भारतीय अर्थव्यवस्था का सीधा जुड़ाव नहीं है लेकिन चीन के बाजार में गिरावट का सीधा लाभ भारत को मिल सकता है। पिछले कुछ दशकों से दुनियाभर के निवेशकों के लिए चीन और भारत के बाजार आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं। हालांकि चीन के मुकाबले भारत को दूसरी वरीयता ही प्राप्त होती है। किंतु चीन के धड़ाम होते बाजार ने निवेशकों के मन में हलचल पैदा कर दी है। पिछले एक महीने से भी कम के समय में चीन के शेयर बाजार में 3.2 खरब डॉलर की रकम डूब चुकी है। निवेशकों ने तेजी अपना पैसा चीन के बाजार से निकालना शुरू कर दिया। लगभग 500 कंपनियों ने शंघाई और शेनझेन एक्सचेंजों में ट्रेडिंग बंद कर दी। कोढ़ में खाज का काम किया चीनी सरकार के उस फैसले ने जिसमें बड़े शेयर धारकों के शेयर बेचने पर छह माह के लिए प्रतिबंध लगा दिया गया है। चीनी सरकार का यह फैसला दीर्घकाल में निवेशकों के मन पर बुरा प्रभाव डाल सकता है। 
 
इधर भारतीय अर्थव्यवस्था ग्रीस और चीन की मंदी से अप्रभावित दिख रही है। शुरुआती हिचकोलों के बाद निवेशकों ने शेयर मार्केट में भरोसे कायम रखा है। भारतीय प्रधानमंत्री द्वारा मेक इन इंडिया, इज ऑफ डूईंग बिजनेस जैसे चलाए जा रहे अभियानों और विदेशी निवेशकों को निवेश के लिए आमंत्रित करने का असर भी देखने को मिल सकता है। इसके अलावा दुनियाभर की रेटिंग एजेंसियों के द्वारा भारतीय विकास दर के चीन से आगे निकल जाने के दावों से भी निवेशकों के रूख में तब्दीली आने की उम्मीद की जा रही है।
 
कुछ लोगों का मानना है कि चीन की मंदी भारत पर नकारात्मक प्रभाव डालेगी, हालांकि भारतीय अर्थव्यवस्था के निर्यात आधारित न होने के कारण इसकी संभावना अत्यंत कम है।
 
उधर, ईराक पर से वैश्विक प्रतिबंध समाप्त करने पर सहमति बन जाने के बाद भारतीय बाजार के आत्मविश्वास में वृद्धि देखने को मिल रही है। शुरुआती आशंकाओं के बावजूद मानसून के भी अबतक ठीक ठाक रहने से भी माहौल सकारात्मक बना है। उम्मीद है कि ईरान के साथ भारत के संबंधों में गर्मजोशी देखने को मिलेगी। ईरान के तेल निर्यात के बाजार में फिर से सक्रिय होने के कारण कच्चे तेल की कीमतों में भारी गिरावट दर्ज हो सकती है। इससे लगभग 70 फीसदी आयातित तेल पर निर्भर रहने वाले भारत को फायदा मिलेगा। प्रतिबंध के दौर में भी भारत ने सीमित मात्रा में ही सही ईरान से तेल का आयात जारी रखा था जिसके ऐवज में संभव है कि ईरान आपसी लेनदेन अमेरिकन डॉलर की बजाए भारतीय रूपए में करने को राजी हो जाए। लंबे समय से अटके गैस-तेल पाइप लाइन का प्रोजेक्ट भी शुरु हो सकता है जिससे तेल की कीमतों में और कमी हो सकेगी। इससे परिवहन व माल ढुलाई सस्ती हो सकेगी और महंगाई पर काबू पाने में सफलता मिलेगी।
 
हालांकि ईरान आईएईए में भारत द्वारा उसके खिलाफ किए गए मतदान को भी नहीं भूला होगा जिसकी भरपाई वह अपने देश निर्माण क्षेत्र के ठेकों को यूरोपिय देशों की कंपनियों को हस्तांतरित कर सकता है। भारतीय बासमती चावल के आयात पर वह पहले भी रोक लगा चुका है, अतः विश्वास निर्माण भी अत्यंत आवश्यक है।
 
इन सभी किंतु परंतु के बीच भारत को चाहिए कि वह अपने बाजार को विदेशी निवेश के अनुकूल बनाने के अभियान से जुड़ा रहे। सरकारी खर्चों और कल्याणकारी योजनाओं में कटौती करे तथा लाइसेंस परमिट प्रक्रिया और श्रम कानूनों आदि के क्षेत्र में सुधार के कार्यों को और तेज करे। पुराने और रद्दी कानूनों को कानून की पुस्तकों से निकाल फेंके और रिजर्व बैंक द्वारा मौद्रिक नीति को ब्याज दरों को कृत्रिम तरीके से नियंत्रित करने की प्रक्रिया पर रोक लगाए।
 
 
-    अविनाश चंद्र

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