सयाना हाथी

किसी भी राष्ट्र की उन्नति की दिशा में एक महान और आकर्षक कदम है, उसका गरीबी से समृद्धि और पारम्परिकता से आधुनिकता की ओर बढ़ना। 1991 के आर्थिक सुधारों के बाद भारत अभी हाल ही में सनसनीखेज रूप से मुक्त बाजार तंत्र के रूप में उभरा है और इसने विश्वव्यापी सूचना अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में खुद को बढ़ाना और फैलाना शुरू कर दिया है। औद्योगिक क्रान्ति को पिछले पचास वर्षों से निरंतर घुन की तरह चाटने वाला 'पुराना केन्द्रीय नौकरशाही शासन' अब धीमी गति से ही सही किन्तु निश्चित तौर पर अन्त की ओर बढ़ रहा है। साथ ही लोकतन्त्रीय शासन से निम्न जातियों का उत्थान भी धीरे-धीरे होने लगा है। आर्थिक और सामाजिक बदलाव का यही आयाम इस पुस्तक की विषय वस्तु है। कुल मानव समाज के छठे हिस्से का, प्रतिष्ठा तथा खुशहाली के लिए संघर्ष, मुझे एक बहुत ऊंची व्यवस्था का नाटक लगता है लेकिन सम्पूर्ण मानवता के सन्दर्भ में, संसार के भविष्य के लिए इसके परिणाम अच्छे भी हो सकते हैं, इसका अर्थ है कि विश्व में उदारतावाद के भविष्य पर नई रोशनी डालना।
 
जो कहानी मैं बताने जा रहा हूं वह एक सॉफ्ट प्ले है, जो भारतीय समाज के हृदय में शान्तिपूर्वक लेकिन गम्भीरता से चल रहा है। यह छोटी-छोटी किश्तों में प्रतिदिन हमारे सामने आता है जो कि नंगी आंखों से बमुश्किल दिख पाता है तथा हार्ड प्ले की अपेक्षा इसे अपनाना और भी मुश्किल है जो कि अधिक नाटकीय है। अधिकतर लोग भारत की आध्यात्मिकता और गरीबी को सहज ही स्वीकार कर लेते हैं किन्तु शान्त, सामाजिक और आर्थिक क्रान्ति का यह रूप उन्हें भ्रमित करता है। आंशिक रूप से यह परिवर्तन सामाजिक लोकतन्त्र के उदय पर आधारित है, किन्तु पिछले दो दशकों में भारत ने पांच से सात प्रतिशत की जो वार्षिक आर्थिक दर हासिल की है, उसे बनाए रखना भी जरूरी है। इसने मध्यवर्ग का आकार तिगुना कर दिया है, जिसके एक पीढ़ी की वृद्धि के साथ भारतीय जनसंख्या के आधे हिस्से के बराबर हो जाने की सम्भावना है। अंत में, यह शान्त क्रान्ति, उन राजनैतिक पार्टियों और राजनीतिज्ञों, जो भारतीयों का खून चूस रहे हैं, में लगातार हो रहे आकस्मिक परिवर्तनों की अपेक्षा ऐतिहासिक महत्व की है।
 
मैंने अनुकरण किया और पाया कि डिफो के 'मेमवार ऑफ एकैवेलियर' की जो पद्धति है, उसमें लेखक के महान राजनीतिक और सामाजिक घटनाओं के विवरण, एक व्यक्ति के निजी अनुभवों के रूप में व्यक्त किए हैं, हालांकि यह आत्मकथा नहीं है। मैंने निश्चय किया है कि मैं इस कहानी को प्रथम पुरुष में कहूंगा। मैं प्रथम पुरुष के अनुभवों पर विश्वास करता हूं क्योंकि उसके अनुभव ईमानदारी से प्राप्त किए हुए होते हैं, चाहे वह हाशिये में हो; वे न केवल अनूठे ही होते हैं बल्कि यही इतिहास के निश्चित आंकड़े भी होते हैं, जिन पर हम इंसान होने के नाते अधिकार रखते हैं। इसके अतिरिक्त मैं यह नहीं चाहता कि राष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा का यह विवरण शुष्क तथा उपदेशात्मक हो। मैं आर्थिक और सामाजिक विचारों के इस द्वन्द्व में अपने को झोंकना चाहता हूं।
 
जब मैं युवा था, तब हम लोग आधुनिक और नवीन भारत के जवाहरलाल नेहरू के सपने में गहरा विश्वास रखते थे। जैसे-जैसे समय बीतता गया- हमने पाया कि नेहरू द्वारा दिखाया गया आर्थिक रास्ता हमें एक अन्धे मोड़ की ओर ले जा रहा है, और हमारे सारे सपने हवा हो गए। जब हम समाजवाद की स्थापना करने निकले तो हमने पाया कि इसके स्थान पर राज्यवाद की स्थापना हो गई है। 1960 में जब मैं मैनेजर पद पर काम कर रहा था तब मैंने अपने आपको नौकरशाही नियंत्रण के घने जंगल में पाया। श्रीमती गांधी के निरंकुश शासन काल में, भ्रम से मुक्ति की हमारी समझ अपने चरम पर पहुंच गई। राजीव गांधी के प्रधानमन्त्री बनने पर आशा की हल्की-सी किरण दिखाई दी लेकिन वह भी अंधेरे में खो गई, जब हमने पाया कि उनमें वह सब नहीं था, जो चाहिए था। हमारी निराशाजनक मन:स्थिति का अन्त तब हुआ जब जुलाई 1991 में पी.वी. नरसिंह राव की अल्पमत सरकार ने स्पष्ट उदारीकरण की नीति की घोषणा की। यह एक प्रकार से हमारे लिए दूसरी स्वतन्त्रता थी, जिसमें हम लोग लोभी और निरंकुश शासन से आजाद होने जा रहे थे।
 
हालांकि 1991 के बाद के सुधार धीमे, अधूरे और हिचकिचाहट भरे थे, लेकिन फिर इन्होंने भारतीय समाज में कई आधारभूत और गम्भीर परिवर्तनों की प्रक्रिया को शुरू किया। यह भी उतना ही महत्वपूर्ण पड़ाव है, जितनी कि दिसम्बर 1978 में चीन में हुई डेंग की क्रान्ति। मतपेटियों की अर्द्धशताब्दी ने निम्न जातियों को भी समाज में बराबर के अधिकार प्रदान किए हैं, इसका अर्थ है कि सुधारों के फल को सबमें बराबर बांटा गया है। पिछले कुछ समय से विश्व औद्योगिक अर्थव्यवस्था से सूचना अर्थव्यवस्था में तब्दील हो गया है जो भारत के लाभ की दास्तान कहता है इसका पहला प्रमाण है सॉफ्टवेयर के क्षेत्र में हमारी अभूतपूर्व सफलता। लेकिन विडम्बना तो यह है कि अधिकतर भारतीय खासकर शासक वर्ग, इस बात को महसूस नहीं करते। अगर वे इसे महसूस करते हैं तो उन्हें शिक्षा के क्षेत्र में अधिक विनिवेश करना चाहिए और सुधारों को तेजी से क्रियान्वित किया जाना चाहिए।
 
इतिहास का कौतूहल पैदा करने वाला प्रश्न यह है कि हम औद्योगिक क्रान्ति लाने में असफल क्यो रहे? मार्क्स ने भविष्यवाणी की थी कि भारत और अन्य देशों में रेल औद्योगिक क्रान्ति को लाने में सहायक होगी। वास्तव में, पहले विश्व युद्ध के बाद बहुत से विचारों को हम छोड़ने को तैयार हो गए। 1914 के बाद भारतीय रेल व्यवस्था विश्व में तीसरे स्थान पर थी, विश्व में सबसे अधिक जूट उत्पादक देश भारत था, सूती कपड़ा उद्योग में यह चौथे स्थान पर था, सबसे बड़ी नहर प्रणाली यहां थी और विश्व व्यापार में इसकी ढाई प्रतिशत की भागीदारी थी। इससे व्यापारी वर्ग, उद्योगपति बनने के लिए तैयार था। युद्ध के बाद औद्योगीकरण, वास्तव में काफी तेजी के साथ हुआ। प्रथम विश्व युद्ध के दौरान जी.डी. बिड़ला, कस्तूरभाई लालभाई और अन्य उद्यमियों ने व्यापार में बहुत मुनाफा कमाया जिसे उन्होंने नए उद्योगों में लगा दिया। 1913-38 के बीच हमारी कुल उत्पादन क्षमता बढ़कर 5.6 प्रतिशत वार्षिक हो गई थी जो कि विश्व के 3.3 प्रतिशत के औसत से काफी अधिक थी। 1947 तक उद्योग का हिस्सा 3.4 प्रतिशत से 7.5 प्रतिशत हो गया था। यह हमारे कृषि समाज में विस्तृत बदलाव लाने के लिए पर्याप्त नहीं था। आधुनिक उद्योग पैंतीस करोड़ की जनसंख्या में से केवल पच्चीस लाख लोगों को ही रोजगार उपलब्ध करवा सके। हमारी मुख्य समस्या कृषि थी जो स्थिर रही, जबकि कृषि बचत और पर्याप्त खाद्य संसाधनों को तेजी से बढ़ती हुई शहरी जनसंख्या के लिए उपलब्ध कराए बिना औद्योगिक क्रान्ति सम्भव ही नहीं है।
 
आजादी हासिल करने के बाद जवाहरलाल नेहरू और उनके सहयोगियों ने राज्य रूपी एजेंसी द्वारा औद्योगिक क्रान्ति लाने का प्रयास किया। उन्हें निजी उद्यमियों पर विश्वास नहीं था, इसलिए उन्होंने राय को अपना उद्यमी बनाया। कोई आश्चर्य की बात नहीं थी कि वे असफल हुए और भारत आज उनके किए की सजा भुगत रहा है।
 
जब मैं कालेज में था, तब हम भारत के बारे में इस प्रकार की बातें किया करते थे जैसे कि वह कोई हवाज जहाज हो, और यह आश्चर्य करते थे कि यह विकास के क्षेत्र में कब उड़ान भरेगा। किसी ने भी नहीं पूछा कि क्या यह कभी उड़ भी पाएगा; बार-बार एक ही प्रश्न उभरकर सामने आता था 'कब'? अर्थशास्त्रियों ने बताया कि उड़ान भरने के दौरान राष्ट्रीय निवेश दस से बारह प्रतिशत बढ़ जाएगा। खुशकिस्मती से, भारत में हमारी निवेश दर पिछले दो दशकों में बीस प्रतिशत से कहीं अधिक है, और अभी तक हमने अपने समाज में कोई परिवर्तन नहीं किया है। क्यों? भारत के मन्त्र में कम-से-कम छह चीजों में गलतियां हैं। पहली, इसने अन्तर्मुखी आयात का रास्ता अपनाया, बनिस्बत इसके कि बहिर्मुखी निर्यात बढ़ाने वाले मार्ग के; इस प्रकार से इसने स्वयं ही विश्व व्यापार में स्वयं का हिस्सा अस्वीकारा यानी सफलता या सौभाग्य जो युद्ध के बाद का युग अपने साथ लाया था। दूसरा, इसने ठोस, अयोग्य तथा एकाधिकार रखने वाले सार्वजनिक क्षेत्र की स्थापना की, जिसने इसके स्वतंत्र रूप से कार्य करने की स्वायत्तता अस्वीकार की। इसलिए, हमारे निवेश बुद्धिमानी वाले नहीं थे और हमारे पूंजी-उपज सम्बन्ध अनुपजाऊ रहे। तीसरा, इसने निजी व्यवसायों को सबसे अधिक बुरे तरीके से नियन्त्रित किया, जिससे बाजार में प्रतियोगिता घट गई। इसके अतिरिक्त हमारे वाणिक-व्यापारी भी फुटकर नहीं थे और नया परिवर्तन लाने में बहुत धीमे थे। चौथा, इसने विदेशी पूंजी को हतोत्साहित किया तथा स्वयं के लिए प्रौद्योगिकी के फायदों तथा विश्व-स्तर की प्रतियोगिता को अस्वीकार किया। पांचवां, इसने अपने श्रमिक वर्ग को उस बिन्दु तक पूर्ण रूप से सन्तुष्ट किया जहां हमारी उत्पादकता बहुत धीमी है। छठा और शायद सबसे महत्वपूर्ण, इसने अपने आधे बच्चों की शिक्षा की उपेक्षा की है, खासकर लड़कियों की।
 
यह कहानी उस विश्वासघात की है जो भारतीय शासकों ने पिछली दो पीढ़ियों के साथ किया। वे हठपूर्वक विकास के गलत ढांचे के साथ डटे रहे और उन्होंने लोगों के विकास और नौकरी के अवसरों को दबा दिया तथा उन्हें गरीबी से उबरने के अवसरों से वंचित रखा। खासकर 1970 के बाद जबकि इसका स्पष्ट प्रमाण था कि यह रास्ता कहीं नहीं जाता। यह विडम्बना है कि जिन स्त्रियों और पुरुषों ने इस व्यवस्था की स्थापना की और उनकी बेतहाशा प्रशंसा भी हुई। इस सबके बाद वे लोकतन्त्र को संस्थागत करने में सफल हुए। दूसरी विडम्बना यह कि गरीबों के नाम पर इन मूर्खों ने अपना रास्ता बदलने से इनकार किया। भारतीय समाजवाद की सबसे बुरी बात यह रही कि इसने गरीबों के लिए बहुत कम काम किया जबकि पूर्वी एशिया के बाकी देशों ने इससे कहीं बेहतर काम किया। यहां तक कि चीन ने भी पिछले पचास साल की सब खलबलियों के बावजूद अपने लोगों की जिन्दगी को बेहतर बनाने के लिए कहीं ज्यादा अच्छे काम किए। हमारी असफलता का कारण खराब व्यवस्था अधिक रही है और विचारधारा कम।
 
 
- 'इंडिया अनबाऊंड' के लेखक गुरचरण दास के लेख 'सयाना हाथी' की भूमिका से उद्धृत
पूर्व प्रकाशितः 28 जनवरी, 2010
गुरचरण दास

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