व्यापारिक भूतकाल, मौजूदा कूटनीति

बांग्लादेश के साथ हुआ समझौता ऐतिहासिक है। इससे कश्मीर जितना ही पुराना विवाद तो हल हुआ ही, उपमहाद्वीप को साझा बाजार की ओर बढ़ने में भी मदद मिली है। व्यापार और निवेश पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अथक कूटनीति का ताजगीदायक फोकस है। सत्ता में आने के बाद से ही हमारे पड़ोसियों की जरूरतों पर उन्होंने बहुत निकटता से गौर किया है, जिसका फल अब सामने आ रहा है। हालांकि, समझौते पर बरसों से काम हो रहा था, लेकिन इतिहास इसका श्रेय मोदी को देगा। अन्य किसी भारतीय नेता की तुलना में उनमें यह सहज समझ है कि सत्ता धान के कटोरे से आती है न कि बंदूक की नली से, जैसा कि माओ का विश्वास था। इस संदर्भ में वे प्राचीन परंपरा का ही अनुसरण कर रहे हैं, जिसने भारत को एक महान व्यापारिक राष्ट्र बना दिया था, जो अपने व्यापारिक जहाजों पर अपनी अद्‌भुत सॉफ्ट पावर विदेश ले जाता था।
 
हालांकि, भू-सीमा संबंधी समझौते के अलावा अन्य समझौते भी उतने ही महत्वपूर्ण थे। आज भारत के मालवाही पोत सिंगापुर होते हुए तीन हफ्ते में बांग्लादेश पहुंचते हैं, समझौते के बाद वे एक हफ्ते में ही पहुंच जाएंगे। भारतीय कंपनियां बिजली बेचेंगी और बांग्लादेश के विशेष आर्थिक क्षेत्र में उत्पादन करेंगी। इससे न सिर्फ बड़े पैमाने पर नौकरियां पैदा होंगी बल्कि बांग्लादेश के साथ व्यापार घाटा कम करने में भी मदद मिलेगी। इस समझौते से नेपाल, श्रीलंका और पाकिस्तान को संदेह की राजनीति से हटकर समृद्धि के अर्थशास्त्र की ओर बढ़ने के फायदे का इशारा मिला है। सबसे महत्वपूर्ण तो यह है कि यह ऐतिहासिक समझौता भारत के अद्‌भुत व्यापारिक भूतकाल पर आधारित है। भारतीय यह भूल गए हैं कि पांच हजार मील लंबी तटीय रेखा के साथ भारत का समृद्ध व्यापारिक इतिहास रहा है।
 
एक दौर तो ऐसा भी रहा जब विश्व व्यापार के चौथाई हिस्से (आज के दो फीसदी की तुलना में) पर इसका प्रभुत्व था। यदि आप दो हजार साल पहले केरल के प्रसिद्ध मुझिरिस बंदरगाह पर खड़े होते तो आपको सोने से लदे जहाज लौटते दिखाई देते। रोज एक जहाज रोमन साम्राज्य से दक्षिण भारत के तट पर आता और उस पर आला दर्जे का कपड़ा, मसाले और विलासिता की चीजें लादी जातीं। उधर, रोमन सीनेटर शिकायत करते कि साम्राज्य की महिलाएं विलासिता की भारतीय चीजें, मसाले और ऊंचे दर्जे का कपड़ा इतना इस्तेमाल करती हैं कि रोम का दो-तिहाई सोना-चांदी भारत चला जाता है। (खेद है कि तमिल संगम काव्य में जिसे मुसिरी कहा गया है, वह मुझिरिस 14वीं सदी की पेरियार बाढ़ में बह गया और उसकी जगह आधुनिक कोच्चि ने ली।
 
पंद्रह सौ साल बाद पुर्तगालियों की भी यही शिकायत थी : दक्षिण अमेरिका से कमाया उनका सोना-चांदी व्यापार में भारत चला जाता है। ब्रिटिश संसद में इसकी गूंज 17वीं सदी में सुनाई दी। भारतीय कपड़े और मसालों ने दुनिया भर में कपड़े पहनने व खाने-पीने की आदतें ही बदल दी थीं। यूरोप के लोगों ने 17वीं सदी में तब अंतर्वस्त्र पहनने शुरू किए जब उन्हें ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा लाए मुलायम व सस्ते भारतीय कपड़े का पता चला। मुल्तान में पंजाबी खत्री 16वीं से 19वीं सदी तक अपने सामानों का कारवां हिमालय के आर-पार ले जाया करते थे, जिससे फारस से लेकर रूस तक जीवन-शैली में काफी बदलाव आया।
 
एक फ्रांसीसी भिक्षुक ने ईरान के सफाविद साम्राज्य की तुलना दो दरवाजे वाली सराय से की थी। सोना-चांदी पश्चिमी दरवाजे से अंदर आते और पूर्वी दरवाजे से भारत की ओर निकल जाते। सोने के प्रति भारत का प्रेम ऐतिहासिक रूप से सकारात्मक व्यापार संतुलन पर आधारित रहा है। जब तक कि 19वीं सदी में इंग्लैंड की औद्योगिक क्रांति ने इसे बदल नहीं दिया और लंकाशायर की मिलों ने हमारे हथकरघा उद्योग को तकनीक के स्तर पर बेकार नहीं कर दिया। चूंकि भारत दुनिया में अग्रणी कपड़ा निर्यातक था, भारतीय बुनकरों को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचा। भारतीय राष्ट्रवादियों ने बुनकरों के हश्र का दोष व्यापार को दिया, जो गलत था, क्योंकि कारण तो नई टेक्नोलॉजी थी। स्वतंत्रता के बाद हमने अपना व्यापारिक भूतकाल भुला दिया। ‘इम्पोर्ट सब्स्टीट्यूशन’ के फर्जी विचार के नाम पर अपनी सीमाएं बंद कर लीं और अंतरराष्ट्रीय व्यापार की समृद्धि से खुद को वंचित कर लिया। हमने अपने दरवाजे 1991 में जाकर खोले। आज मोदी भूतकाल के इस नुकसान की भरपाई करने में लगे हैं। मगर उन्हें आरएसएस के स्वदेशी जागरण मंच जैसे संरक्षणवादियों के विरोध का सामना करना पड़ रहा है, जिन्हें यह नहीं समझ में आता कि व्यापार ऐसी गतिविधि है, जिसमें खरीदने व बेचने वाले दोनों को फायदा होता है।
 
भारत की शक्ति हमेशा से ही ‘सॉफ्ट’ रही है, जो सैन्य विजयों से नहीं बल्कि सामानों व विचारों के निर्यात में व्यक्त होती रही है। संस्कृत के महान विद्वान शेल्डन पोलॉक हमें याद दिलाते हैं कि चौथी और पांचवीं सदी में भारत का प्रभाव दक्षिण-पूर्व और मध्य एशिया में चारों तरफ फैल गया था। व्यापक क्षेत्र में संस्कृत दरबारों, सरकारों और साहित्य की भाषा बन गई थी। कुलीन वर्ग विभिन्न भाषाएं बोलता था, लेकिन सीमा पार संपर्क के लिए संस्कृत का प्रयोग करता था। यह तो पक्का पता नहीं कि भारतीय संस्कृति विदेशों में कैसे पहुंची पर प्रबल संभावना यही है कि ऐसा व्यापार के जरिये ही हुआ होगा। तमिल साहित्य में ऐसे वर्णन बहुत हैं, जिसमें समुद्री व्यापारी सोने की तलाश में जावा जैसे सुदूरवर्ती क्षेत्रों में जाते थे। ये लंबी समुद्री यात्राएं हुआ करती थीं और व्यापारी अपने साथ ब्राह्वणों व बौद्ध भिक्षुओं को ले जाते थे ताकि विदेशी भूमि पर भी उनके नाविक अपनी धार्मिक रीति-रिवाजों को पूरा कर सकें। इतिहासकार माइकल वुड ने कहा है, ‘इतिहास तलवारों के बल पर साम्राज्य खड़े करने के उदाहरणों से भरा पड़ा है पर भारत ऐसा अकेला देश है, जिसने संस्कृति व अध्यात्म का साम्राज्य निर्मित किया।’
 
स्वतंत्रता के इन 68 वर्षों में हमारे पड़ोसी हमें नापसंद करने लगे। हमारी विदेश सेवा के अधिकारी उनके साथ तिरस्कारपूर्ण व्यवहार करते। वे हम पर संदेह करते हैं और कहते कि वे ‘भारत के बहुत निकट और ईश्वर से बहुत दूर हैं।’ हालांकि, उनके प्रति मोदी का रवैया भिन्न रहा है और उनकी उत्साहपूर्ण कूटनीति ने बांग्लादेश समझौते के रूप में पहला इनाम हासिल किया है। इसने संभावनाओं के नए युग का द्वार खोला है। यदि वे इसी प्रकार जोर देते रहे और हमारा प्रशासन उसका फॉलो-अप लेता रहे तो पड़ोसियों के साथ भारत के रिश्ते बदलेंगे और हमारा देश फिर उस वर्णन का हकदार हो जाएगा, जो 7वीं सदी के चीनी यात्री ह्वेनसांग ने किया था : ‘दूर के स्थानों और विविध परंपराओं के लोग आमतौर पर उसी भूमि का उल्लेख करते हैं, जिसकी वे इंडिया कहकर सराहना करते हैं।’
 
साभारः गुरचरण दास (स्तंभकार एवं लेखक)
 
गुरचरण दास

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